॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
येन प्रसुप्तः पुरुषः स्वापं वेदात्मनस्तदा ।
सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम् ॥ ५५ ॥
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः ।
अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम् ॥ ५६ ॥
यदेतद् विस्मृतं पुंसो मद्भावं भिन्नमात्मनः ।
ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥
लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम् ।
आत्मानं यो न बुद्ध्येत न क्वचिन् शममाप्नुयात् ॥ ५८ ॥
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम् ।
अभयं चाप्यनीहायां सङ्कल्पाद् विरमेत्कविः ॥ ५९ ॥
सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रियाः ।
ततोऽनिवृत्तिः अप्राप्तिः दुखस्य च सुखस्य च ॥ ६० ॥
(श्रीभगवान् कहते हैं) सोया हुआ पुरुष जिसकी सहायता से अपनी निद्रा और उसके अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ; उसे तुम अपनी आत्मा समझो ॥ ५५ ॥ पुरुष निद्रा और जागृति—इन दोनों अवस्थाओं का अनुभव करनेवाला है। वह उन अवस्थाओं में अनुगत होनेपर भी वास्तवमें उनसे पृथक् है। वह सब अवस्थाओंमें रहनेवाला अखण्ड एकरस ज्ञान ही ब्रह्म है, वही परब्रह्म है ॥ ५६ ॥ जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पडऩा पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है ॥ ५७ ॥ यह मनुष्ययोनि ज्ञान और विज्ञानका मूल स्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मस्वरूप परमात्माको नहीं जान लेता, उसे कहीं किसी भी योनिमें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ५८ ॥ राजन् ! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है; और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दु:ख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है—यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे ॥ ५९ ॥ जगत् के सभी स्त्रीपुरुष इसलिये कर्म करते हैं कि उन्हें सुख मिले और उनका दु:खोंसे पिण्ड छूटे; परंतु उन कर्मोंसे न तो उनका दु:ख दूर होता है और न उन्हें सुखकी ही प्राप्ति होती है ॥ ६० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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