रविवार, 21 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

 

बद्ध, मुक्त और भक्तजनों  के लक्षण

 

श्रीभगवानुवाच

बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः

गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम् १

शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया

स्वप्नो यथात्मनः ख्यातिः संसृतिर्न तु वास्तवी २

विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम्

मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ३

एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते

बन्धोऽस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतरः ४

अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते

विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ५

सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ

यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे

एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न-

मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ६

आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा-

नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः

योऽविद्यया युक्स तु नित्यबद्धो

विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ७

देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान्स्वप्नाद्यथोत्थितः

अदेहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग्यथा ८

इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च

गृह्यमाणेष्वहं कुर्यान्न विद्वान्यस्त्वविक्रियः ९

दैवाधीने शरीरेऽस्मिन्गुणभाव्येन कर्मणा

वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबध्यते १०

एवं विरक्तः शयन आसनाटनमज्जने

दर्शनस्पर्शनघ्राण भोजनश्रवणादिषु

न तथा बध्यते विद्वान्तत्र तत्रादयन्गुणान् ११

प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिलः

वैशारद्येक्षयासङ्ग शितया छिन्नसंशयः

प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद्विनिवर्तते १२

यस्य स्युर्वीतसङ्कल्पाः प्राणेन्द्रि यर्ननोधियाम्

वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणैः १४

यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किञ्चिद्यदृच्छया

अर्च्यते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः १५

न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा

वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः १६

न कुर्यान्न वदेत्किञ्चिन्न ध्यायेत्साध्वसाधु वा

आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः १७

शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि

श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः १८

गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां

देहं पराधीनमसत्प्रजां च

वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं

हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी १९

यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म

स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य

लीलावतारेप्सितजन्म वा स्या-

द्वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः २०

एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि

उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे २१

यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम्

मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर २२

श्रद्धालुर्मत्कथाः शृण्वन्सुभद्रा लोकपावनीः

गायन्ननुस्मरन्कर्म जन्म चाभिनयन्मुहुः २३

मदर्थे धर्मकामार्थानाचरन्मदपाश्रयः

लभते निश्चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने २४

सत्सङ्गलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता

स वै मे दर्शितं सद्भिरञ्जसा विन्दते पदम् २५

 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण  ने कहा—प्यारे उद्धव ! आत्मा बद्ध है या मुक्त है, इस प्रकारकी व्याख्या या व्यवहार मेरे अधीन रहनेवाले सत्त्वादि गुणोंकी उपाधि से ही होता है। वस्तुत:—तत्त्वदृष्टिसे नहीं। सभी गुण मायामूलक हैं—इन्द्रजाल हैं—जादू के खेल के समान हैं। इसलिये न मेरा मोक्ष है, न तो मेरा बन्धन ही है ॥ १ ॥ जैसे स्वप्न बुद्धि का विवर्त है—उसमें बिना हुए ही भासता है—मिथ्या है, वैसे ही शोक-मोह, सुख-दु:ख, शरीरकी उत्पत्ति और मृत्यु—यह सब संसार का बखेड़ा माया (अविद्या) के कारण प्रतीत होनेपर भी वास्तविक नहीं है ॥ २ ॥ उद्धव ! शरीरधारियों को मुक्ति का अनुभव करानेवाली आत्मविद्या और बन्धनका अनुभव करानेवाली अविद्या—ये दोनों ही मेरी अनादि शक्तियाँ हैं। मेरी मायासे ही इनकी रचना हुई है। इनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है ॥ ३ ॥ भाई ! तुम तो स्वयं बड़े बुद्धिमान् हो, विचार करो—जीव तो एक ही है। वह व्यवहारके लिये ही मेरे अंशके रूपमें कल्पित हुआ है, वस्तुत: मेरा स्वरूप ही है। आत्मज्ञानसे सम्पन्न होनेपर उसे मुक्त कहते हैं और आत्माका ज्ञान न होनेसे बद्ध। और यह अज्ञान अनादि होनेसे बन्धन भी अनादि कहलाता है ॥ ४ ॥ इस प्रकार मुझ एक ही धर्मीमें रहनेपर भी जो शोक और आनन्दरूप विरुद्ध धर्मवाले जान पड़ते हैं, उन बद्ध और मुक्त जीवका भेद मैं बतलाता हूँ ॥ ५ ॥ (वह भेद दो प्रकारका है—एक तो नित्यमुक्त ईश्वरसे जीवका भेद, और दूसरा मुक्त-बद्ध जीवका भेद। पहला सुनो)—जीव और ईश्वर बद्ध और मुक्तके भेदसे भिन्न-भिन्न होनेपर भी एक ही शरीरमें नियन्ता और नियन्त्रितके रूपसे स्थित हैं। ऐसा समझो कि शरीर एक वृक्ष है, इसमें हृदयका घोंसला बनाकर जीव और ईश्वर नामके दो पक्षी रहते हैं। वे दोनों चेतन होनेके कारण समान हैं और कभी न बिछुडऩेके कारण सखा हैं। इनके निवास करनेका कारण केवल लीला ही है। इतनी समानता होनेपर भी जीव तो शरीररूप वृक्षके फल सुख-दु:ख आदि भोगता है, परन्तु ईश्वर उन्हें न भोगकर कर्मफल सुख-दु:ख आदिसे असङ्ग और उनका साक्षीमात्र रहता है। अभोक्ता होनेपर भी ईश्वरकी यह विलक्षणता है कि वह ज्ञान, ऐश्वर्य, आनन्द और सामथ्र्य आदिमें भोक्ता जीवसे बढक़र है ॥ ६ ॥ साथ ही एक यह भी विलक्षणता है कि अभोक्ता ईश्वर तो अपने वास्तविक स्वरूप और इसके अतिरिक्त जगत् को भी जानता है, परन्तु भोक्ता जीव न अपने वास्तविक रूपको जानता है और न अपनेसे अतिरिक्त को ! इन दोनोंमें जीव तो अविद्यासे युक्त होनेके कारण नित्यबद्ध है और ईश्वर विद्यास्वरूप होनेके कारण नित्यमुक्त है ॥ ७ ॥ प्यारे उद्धव ! ज्ञानसम्पन्न पुरुष भी मुक्त ही है; जैसे स्वप्न टूट जानेपर जगा हुआ पुरुष स्वप्नके स्मर्यमाण शरीरसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सूक्ष्म और स्थूलशरीरमें रहनेपर भी उनसे किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रखता, परन्तु अज्ञानी पुरुष वास्तवमें शरीरसे कोई सम्बन्ध न रखनेपर भी अज्ञानके कारण शरीरमें ही स्थित रहता है, जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वाप्निक शरीरमें बँध जाता है ॥ ८ ॥ व्यवहारादिमें इन्द्रियाँ शब्द-स्पर्शादि विषयोंको ग्रहण करती हैं; क्योंकि यह तो नियम ही है कि गुण ही गुणको ग्रहण करते हैं, आत्मा नहीं। इसलिये जिसने अपने निर्विकार आत्मस्वरूपको समझ लिया है, वह उन विषयोंके ग्रहण-त्यागमें किसी प्रकारका अभिमान नहीं करता ॥ ९ ॥ यह शरीर प्रारब्धके अधीन है। इससे शारीरिक और मानसिक जितने भी कर्म होते हैं, सब गुणोंकी प्रेरणासे ही होते हैं। अज्ञानी पुरुष झूठमूठ अपनेको उन ग्रहण-त्याग आदि कर्मोंका कर्ता मान बैठता है और इसी अभिमानके कारण वह बँध जाता है ॥ १० ॥

प्यारे उद्धव ! पूर्वोक्त पद्धतिसे विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयोंसे विरक्त रहता है और सोने-बैठने, घूमने-फिरने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओंमें अपनेको कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है। गुण ही सभी कर्मोंके कर्ता-भोक्ता हैं—ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलोंसे नहीं बँधते। वे प्रकृतिमें रहकर भी वैसे ही असङ्ग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदिसे आकाश, जलकी आद्र्रता आदिसे सूर्य और गन्ध आदिसे वायु। उनकी विमल बुद्धिकी तलवार असङ्ग-भावनाकी सानसे और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय-सन्देहोंको काट-कूटकर फेंक देते हैं। जैसे कोई स्वप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धिके भ्रमसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ११—१३ ॥ जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी समस्त चेष्टाएँ बिना सङ्कल्पके होती हैं, वे देहमें स्थित रहकर भी उसके गुणोंसे मुक्त हैं ॥ १४ ॥ उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषोंके शरीरको चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोगसे पूजा करने लगे—वे न तो किसीके सतानेसे दुखी होते हैं और न पूजा करनेसे सुखी ॥ १५ ॥ जो समदर्शी महात्मा गुण और दोषकी भेददृष्टिसे ऊपर उठ गये हैं, वे न तो अच्छे काम करनेवालेकी स्तुति करते हैं और न बुरे काम करनेवालेकी निन्दा; न वे किसीकी अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते हैं और न बुरी बात सुनकर किसीको झिडक़ते ही हैं ॥ १६ ॥ जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा कहते हैं और न सोचते ही हैं। वे व्यवहारमें अपनी समान वृत्ति रखकर आत्मानन्दमें ही मग्र रहते हैं और जडके समान मानो कोई मूर्ख हो इस प्रकार विचरण करते रहते हैं ॥ १७ ॥

प्यारे उद्धव ! जो पुरुष वेदोंका तो पारगामी विद्वान् हो, परन्तु परब्रह्मके ज्ञानसे शून्य हो, उसके परिश्रमका कोई फल नहीं है वह तो वैसा ही है, जैसे बिना दूधकी गायका पालनेवाला ॥ १८ ॥ दूध न देनेवाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र, सत्पात्रके प्राप्त होनेपर भी दान न किया हुआ धन और मेरे गुणोंसे रहित वाणी व्यर्थ है। इन वस्तुओंकी रखवाली करनेवाला दु:ख- पर-दु:ख ही भोगता रहता है ॥ १९ ॥ इसलिये उद्धव ! जिस वाणीमें जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोक-पावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे ॥ २० ॥

प्रिय उद्धव ! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आत्मजिज्ञासा और विचारके द्वारा आत्मामें जो अनेकताका भ्रम है उसे दूर कर दे और मुझ सर्वव्यापी परमात्मामें अपना निर्मल मन लगा दे तथा संसारके व्यवहारोंसे उपराम हो जाय ॥ २१ ॥ यदि तुम अपना मन परब्रह्ममें स्थिर न कर सको, तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो ॥ २२ ॥ मेरी कथाएँ समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी हैं। श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहिये। बार-बार मेरे अवतार और लीलाओंका गान, स्मरण और अभिनय करना चाहिये ॥ २३ ॥ मेरे आश्रित रहकर मेरे ही लिये धर्म, काम और अर्थका सेवन करना चाहिये। प्रिय उद्धव ! जो ऐसा करता है, उसे मुझ अविनाशी पुरुषके प्रति अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ २४ ॥ भक्तिकी प्राप्ति सत्सङ्गसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है, वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्निध्य का अनुभव करता है। इस प्रकार जब उसका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतों के उपदेशों के अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको—वास्तविक स्वरूप को सहज ही में प्राप्त हो जाता है ॥ २५ ॥

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से

 



शनिवार, 20 मार्च 2021

श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

 

लौकिक तथा पारलौकिक भोगों की असारता का निरूपण

 

श्रुतं च दृष्टवद्दुष्टं स्पर्धासूयात्ययव्ययैः

बह्वन्तरायकामत्वात्कृषिवच्चापि निष्फलम् २१

अन्तरायैरविहितो यदि धर्मः स्वनुष्ठितः

तेनापि निर्जितं स्थानं यथा गच्छति तच्छृणु २२

इष्ट्वेह देवता यज्ञैः स्वर्लोकं याति याज्ञिकः

भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान्दिव्यान्निजार्जितान् २३

स्वपुण्योपचिते शुभ्रे विमान उपगीयते

गन्धर्वैर्विहरन्मध्ये देवीनां हृद्यवेषधृक् २४

स्त्रीभिः कामगयानेन किङ्किणीजालमालिना

क्रीडन्न वेदात्मपातं सुराक्रीडेषु निर्वृतः २५

तावत्स मोदते स्वर्गे यावत्पुण्यं समाप्यते

क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन्कालचालितः २६

यद्यधर्मरतः सङ्गादसतां वाजितेन्द्रियः

कामात्मा कृपणो लुब्धः स्त्रैणो भूतविहिंसकः २७

पशूनविधिनालभ्य प्रेतभूतगणान्यजन्

नरकानवशो जन्तुर्गत्वा यात्युल्बणं तमः २८

कर्माणि दुःखोदर्काणि कुर्वन्देहेन तैः पुनः

देहमाभजते तत्र किं सुखं मर्त्यधर्मिणः २९

लोकानां लोकपालानां मद्भयं कल्पजीविनाम्

ब्रह्मणोऽपि भयं मत्तो द्विपरार्धपरायुषः ३०

गुणाः सृजन्ति कर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान्

जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ ३१

यावत्स्याद्गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः

नानात्वमात्मनो यावत्पारतन्त्र्यं तदैव हि ३२

यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्

य एतत्समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिताः ३३

काल आत्मागमो लोकः स्वभावो धर्म एव च

इति मां बहुधा प्राहुर्गुणव्यतिकरे सति ३४

 

श्रीउद्धव उवाच

गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृतः

गुणैर्न बध्यते देही बध्यते वा कथं विभो ३५

कथं वर्तेत विहरेत्कैर्वा ज्ञायेत लक्षणैः

किं भुञ्जीतोत विसृजेच्छयीतासीत याति वा ३६

एतदच्युत मे ब्रूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर

नित्यबद्धो नित्यमुक्त एक एवेति मे भ्रमः ३७

 

प्यारे उद्धव ! लौकिक सुखके समान पारलौकिक सुख भी दोषयुक्त ही है; क्योंकि वहाँ भी बराबरीवालों से होड़ चलती है, अधिक सुख भोगनेवालों के प्रति असूया होती है—उनके गुणोंमें दोष निकाला जाता है और छोटोंसे घृणा होती है। प्रतिदिन पुण्य क्षीण होनेके साथ ही वहाँके सुख भी क्षय  के निकट पहुँचते रहते हैं और एक दिन नष्ट हो जाते हैं। वहाँकी कामना पूर्ण होनेमें भी यजमान, ऋत्विज् और कर्म आदिकी त्रुटियोंके कारण बड़े-बड़े विघ्नों की सम्भावना रहती है। जैसे हरी-भरी खेती भी अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदिके कारण नष्ट हो जाती है, वैसे ही स्वर्ग भी प्राप्त होते- होते विघ्नों के कारण नहीं मिल पाता ॥ २१ ॥ यदि यज्ञ-यागादि धर्म बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाय, तो उसके द्वारा जो स्वर्गादि लोक मिलते हैं, उनकी प्राप्तिका प्रकार मैं बतलाता हूँ, सुनो ॥ २२ ॥ यज्ञ करनेवाला पुरुष यज्ञोंके द्वारा देवताओंकी आराधना करके स्वर्गमें जाता है और वहाँ अपने पुण्यकर्मोंके द्वारा उपाॢजत दिव्य भोगोंको देवताओंके समान भोगता है ॥ २३ ॥ उसे उसके पुण्योंके अनुसार एक चमकीला विमान मिलता है और वह उसपर सवार होकर सुर- सुन्दरियोंके साथ विहार करता है। गन्धर्वगण उसके गुणोंका गान करते हैं और उसके रूप- लावण्यको देखकर दूसरोंका मन लुभा जाता है ॥ २४ ॥ उसका विमान वह जहाँ ले जाना चाहता है, वहीं चला जाता है और उसकी घंटियाँ घनघनाकर दिशाओंको गुञ्जारित करती हैं। वह अप्सराओंके साथ नन्दनवन आदि देवताओंकी विहार-स्थलियोंमें क्रीड़ाएँ करते-करते इतना बेसुध हो जाता है कि उसे इस बातका पता ही नहीं चलता कि अब मेरे पुण्य समाप्त हो जायँगे और मैं यहाँसे ढकेल दिया जाऊँगा ॥ २५ ॥ जबतक उसके पुण्य शेष रहते हैं, तबतक वह स्वर्गमें चैनकी वंशी बजाता रहता है; परन्तु पुण्य क्षीण होते ही इच्छा न रहनेपर भी उसे नीचे गिरना पड़ता है, क्योंकि कालकी चाल ही ऐसी है ॥ २६ ॥

यदि कोई मनुष्य दुष्टोंकी संगतिमें पडक़र अधर्मपरायण हो जाय, अपनी इन्द्रियोंके वशमें होकर मनमानी करने लगे, लोभवश दाने-दानेमें कृपणता करने लगे, लम्पट हो जाय अथवा प्राणियोंको सताने लगे और विधि-विरुद्ध पशुओंकी बलि देकर भूत और प्रेतोंकी उपासनामें लग जाय, तब तो वह पशुओंसे भी गया-बीता हो जाता है और अवश्य ही नरकमें जाता है। उसे अन्तमें घोर अन्धकार, स्वार्थ और परमार्थसे रहित अज्ञानमें ही भटकना पड़ता है ॥ २७-२८ ॥ जितने भी सकाम और बहिर्मुख करनेवाले कर्म हैं, उनका फल दु:ख ही है। जो जीव शरीरमें अहंता-ममता करके उन्हींमें लग जाता है, उसे बार-बार जन्म-पर-जन्म और मत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती रहती है। ऐसी स्थितिमें मृत्युधर्मा जीवको क्या सुख हो सकता है ? ॥ २९ ॥ सारे लोक और लोकपालोंकी आयु भी केवल एक कल्प है, इसलिये मुझसे भयभीत रहते हैं। औरोंकी तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मा भी मुझसे भयभीत रहते हैं; क्योंकि उनकी आयु भी कालसे सीमित—केवल दो पराद्र्ध है ॥ ३० ॥ सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण इन्द्रियोंको उनके कर्मोंमें प्रेरित करते हैं और इन्द्रियाँ कर्म करती हैं। जीव अज्ञानवश सत्त्व, रज आदि गुणों और इन्द्रियोंको अपना स्वरूप मान बैठता है और उनके किये हुए कर्मोंका फल सुख-दु:ख भोगने लगता है ॥ ३१ ॥ जबतक गुणोंकी विषमता है अर्थात् शरीरादिमें मैं और मेरेपनका अभिमान है; तभीतक आत्माके एकत्वकी अनुभूति नहीं होती—वह अनेक जान पड़ता है; और जबतक आत्माकी अनेकता है, तबतक तो उन्हें काल अथवा कर्म किसीके अधीन रहना ही पड़ेगा ॥ ३२ ॥ जबतक परतन्त्रता है, तबतक ईश्वरसे भय बना ही रहता है। जो मैं और मेरेपनके भावसे ग्रस्त रहकर आत्माकी अनेकता, परतन्त्रता आदि मानते हैं और वैराग्य न ग्रहण करके बहिर्मुख करनेवाले कर्मोंका ही सेवन करते रहते हैं, उन्हें शोक और मोहकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥ प्यारे उद्धव ! जब मायाके गुणोंमें क्षोभ होता है, तब मुझ आत्माको ही काल, जीव, वेद, लोक, स्वभाव और धर्म आदि अनेक नामोंसे निरूपण करने लगते हैं। (ये सब मायामय हैं। वास्तविक सत्य मैं आत्मा ही हूँ) ॥ ३४ ॥

उद्धवजीने पूछा—भगवन् ! यह जीव देह आदि रूप गुणोंमें ही रह रहा है। फिर देहसे होनेवाले कर्मों या सुख-दु:ख आदि रूप फलोंमें क्यों नहीं बँधता है ? अथवा यह आत्मा गुणोंसे निॢलप्त है, देह आदिके सम्पर्कसे सर्वथा रहित है, फिर इसे बन्धनकी प्राप्ति कैसे होती है ? ॥ ३५ ॥ बद्ध अथवा मुक्त पुरुष कैसा बर्ताव करता है, वह कैसे विहार करता है, या वह किन लक्षणोंसे पहचाना जाता है, कैसे भोजन करता है ? और मल-त्याग आदि कैसे करता है ? कैसे सोता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है ? ॥ ३६ ॥ अच्युत ! प्रश्न का मर्म जाननेवालोंमें आप श्रेष्ठ हैं। इसलिये आप मेरे इस प्रश्रका उत्तर दीजिये—एक ही आत्मा अनादि गुणोंके संसर्गसे नित्यबद्ध भी मालूम पड़ता है और असङ्ग होनेके कारण नित्यमुक्त भी। इस बातको लेकर मुझे भ्रम हो रहा है ॥ ३७ ॥

 

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे

भगवदुद्धवसंवादे दशमोऽध्यायः

 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण एकादश स्कन्ध— दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 

श्रीमद्भागवतमहापुराण

एकादश स्कन्ध— दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

 

लौकिक तथा पारलौकिक भोगों की असारता का निरूपण

 

मयोदितेष्ववहितः स्वधर्मेषु मदाश्रयः

वर्णाश्रमकुलाचारमकामात्मा समाचरेत् १

अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्

गुणेषु तत्त्वध्यानेन सर्वारम्भविपर्ययम् २

सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथः

नानात्मकत्वाद्विफलस्तथा भेदात्मधीर्गुणैः ३

निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत्

जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत्कर्मचोदनाम् ४

यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान्मत्परः क्वचित्

मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ५

अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः

असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ६

जायापत्यगृहक्षेत्र स्वजनद्रविणादिषु

उदासीनः समं पश्यन्सर्वेष्वर्थमिवात्मनः ७

विलक्षणः स्थूलसूक्ष्माद्देहादात्मेक्षिता स्वदृक्

यथाग्निर्दारुणो दाह्याद्दाहकोऽन्यः प्रकाशकः ८

निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान्गुणान्

अन्तः प्रविष्ट आधत्त एवं देहगुणान्परः ९

योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि

संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसो विद्याच्छिदात्मनः १०

तस्माज्जिज्ञासयात्मानमात्मस्थं केवलं परम्

सङ्गम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम् ११

आचार्योऽरणिराद्यः स्यादन्तेवास्युत्तरारणिः

तत्सन्धानं प्रवचनं विद्यासन्धिः सुखावहः १२

वैशारदी सातिविशुद्धबुद्धि-

र्धुनोति मायां गुणसम्प्रसूताम्

गुणांश्च सन्दह्य यदात्ममेत-

त्स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाग्निः १३

अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः

नानात्वमथ नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम् १४

मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी यथा

तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः १५

एवमप्यङ्ग सर्वेषां देहिनां देहयोगतः

कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् १६

तत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते

भोक्तुश्च दुःखसुखयोः को न्वर्थो विवशं भजेत् १७

न देहिनां सुखं किञ्चिद्विद्यते विदुषामपि

तथा च दुःखं मूढानां वृथाहङ्करणं परम् १८

यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः

तेऽप्यद्धा न विदुर्योगं मृत्युर्न प्रभवेद्यथा १९

कोऽन्वर्थः सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके

आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिदः २०

 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं—प्यारे उद्धव ! साधक को चाहिये कि सब तरह से मेरी शरण  में रहकर (गीता-पाञ्चरात्र आदिमें) मेरे द्वारा उपदिष्ट अपने धर्मोंका सावधानीसे पालन करे। साथ ही जहाँ  तक उनसे विरोध न हो वहाँतक निष्कामभावसे अपने वर्ण, आश्रम और कुल के अनुसार सदाचारका भी अनुष्ठान करे ॥ १ ॥ निष्काम होनेका उपाय यह है कि स्वधर्मोंका पालन करनेसे शुद्ध हुए अपने चित्तमें यह विचार करे कि जगत्के विषयी प्राणी शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयोंको सत्य समझकर उनकी प्राप्तिके लिये जो प्रयत्न करते हैं, उसमें उनका उद्देश्य तो यह होता है कि सुख मिले, परन्तु मिलता है दु:ख ॥ २ ॥ इसके सम्बन्धमें ऐसा विचार करना चाहिये कि स्वप्न-अवस्थामें और मनोरथ करते समय जाग्रत्-अवस्थामें भी मनुष्य मन-ही-मन अनेकों प्रकारके विषयोंका अनुभव करता है, परन्तु उसकी वह सारी कल्पना वस्तुशून्य होनेके कारण व्यर्थ है। वैसे ही इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली भेदबुद्धि भी व्यर्थ ही है, क्योंकि यह भी इन्द्रियजन्य और नाना वस्तुविषयक होनेके कारण पूर्ववत् असत्य ही है ॥ ३ ॥ जो पुरुष मेरी शरणमें है, उसे अन्तर्मुख करनेवाले निष्काम अथवा नित्यकर्म ही करने चाहिये। उन कर्मोंका बिलकुल परित्याग कर देना चाहिये, जो बहिर्मुख बनानेवाले अथवा सकाम हों। जब आत्मज्ञानकी उत्कट इच्छा जाग उठे, तब तो कर्मसम्बन्धी विधि-विधानोंका भी आदर नहीं करना चाहिये ॥ ४ ॥ अहिंसा आदि यमोंका तो आदरपूर्वक सेवन करना चाहिये, परन्तु शौच (पवित्रता) आदि नियमोंका पालन शक्तिके अनुसार और आत्मज्ञानके विरोधी न होनेपर ही करना चाहिये। जिज्ञासु पुरुषके लिये यम और नियमोंके पालनसे भी बढक़र आवश्यक बात यह है कि वह अपने गुरुकी, जो मेरे स्वरूपको जाननेवाले और शान्त हों, मेरा ही स्वरूप समझकर सेवा करे ॥ ५ ॥ शिष्य को अभिमान न करना चाहिये। वह कभी किसीसे डाह न करे—किसीका बुरा न सोचे। वह प्रत्येक कार्यमें कुशल हो—उसे आलस्य छू न जाय। उसे कहीं भी ममता न हो, गुरुके चरणोंमें दृढ़ अनुराग हो। कोई काम हड़बड़ाकर न करे—उसे सावधानीसे पूरा करे। सदा परमार्थके सम्बन्धमें ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा बनाये रखे। किसीके गुणोंमें दोष न निकाले और व्यर्थकी बात न करे ॥ ६ ॥ जिज्ञासुका परम धन है आत्मा; इसलिये वह स्त्री-पुत्र, घर-खेत, स्वजन और धन आदि सम्पूर्ण पदार्थोंमें एक सम आत्माको देखे और किसीमें कुछ विशेषताका आरोप करके उससे ममता न करे, उदासीन रहे ॥ ७ ॥ उद्धव ! जैसे जलनेवाली लकड़ीसे उसे जलाने और प्रकाशित करनेवाली आग सर्वथा अलग है। ठीक वैसे ही विचार करनेपर जान पड़ता है कि पञ्चभूतोंका बना स्थूलशरीर और मन-बुद्धि आदि सत्रह तत्त्वोंका बना सूक्ष्मशरीर दोनों ही दृश्य और जड हैं। तथा उनको जानने और प्रकाशित करनेवाला आत्मा साक्षी एवं स्वयंप्रकाश है। शरीर अनित्य, अनेक एवं जड हैं। आत्मा नित्य, एक एवं चेतन है। इस प्रकार देहकी अपेक्षा आत्मामें महान् विलक्षणता है। अतएव देहसे आत्मा भिन्न है ॥ ८ ॥ जब आग लकड़ीमें प्रज्वलित होती है, तब लकड़ीके उत्पत्ति-विनाश, बड़ाई-छोटाई और अनेकता आदि सभी गुण वह स्वयं ग्रहण कर लेती है। परन्तु सच पूछो, तो लकड़ीके उन गुणोंसे आगका कोई सम्बन्ध नहीं है। वैसे ही जब आत्मा अपनेको शरीर मान लेता है, तब वह देहके जडता, अनित्यता, स्थूलता, अनेकता आदि गुणोंसे सर्वथा रहित होनेपर भी उनसे युक्त जान पड़ता है ॥ ९ ॥ ईश्वरके द्वारा नियन्त्रित मायाके गुणोंने ही सूक्ष्म और स्थूलशरीरका निर्माण किया है। जीवको शरीर और शरीरको जीव समझ लेनेके कारण ही स्थूलशरीरके जन्म-मरण और सूक्ष्मशरीरके आवागमनका आत्मापर आरोप किया जाता है। जीवको जन्म-मृत्युरूप संसार इसी भ्रम अथवा अध्यासके कारण प्राप्त होता है। आत्माके स्वरूपका ज्ञान होनेपर उसकी जड़ कट जाती है ॥ १० ॥ प्यारे उद्धव ! इस जन्म-मृत्युरूप संसारका कोई दूसरा कारण नहीं, केवल अज्ञान ही मूल कारण है। इसलिये अपने वास्तविक स्वरूपको, आत्माको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। अपना यह वास्तविक स्वरूप समस्त प्रकृति और प्राकृत जगत्से अतीत, द्वैतकी गन्धसे रहित एवं अपने-आपमें ही स्थित है। उसका और कोई आधार नहीं है। उसे जानकर धीरे-धीरे स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर आदिमें जो सत्यत्वबुद्धि हो रही है, उसे क्रमश: मिटा देना चाहिये ॥ ११ ॥ (यज्ञमें जब अरणिमन्थन करके अग्नि उत्पन्न करते हैं, तो उसमें नीचे-ऊपर दो लकडिय़ाँ रहती हैं और बीचमें मन्थनकाष्ठ रहता है; वैसे ही) विद्यारूप अग्नि की उत्पत्तिके लिये आचार्य और शिष्य तो नीचे-ऊपरकी अरणियाँ हैं तथा उपदेश मन्थनकाष्ठ है। इनसे जो ज्ञानाग्रि प्रज्वलित होती है, वह विलक्षण सुख देनेवाली है। इस यज्ञमें बुद्धिमान् शिष्य सद्गुरुके द्वारा जो अत्यन्त विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करता है, वह गुणोंसे बनी हुई विषयोंकी मायाको भस्म कर देता है। तत्पश्चात् वे गुण भी भस्म हो जाते हैं, जिनसे कि यह संसार बना हुआ है। इस प्रकार सबके भस्म हो जानेपर जब आत्माके अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती, तब वह ज्ञानाग्रि भी ठीक वैसे ही अपने वास्तविक स्वरूपमें शान्त हो जाती है, जैसे समिधा न रहनेपर आग बुझ जाती है [*] ॥ १२-१३ ॥

प्यारे उद्धव ! यदि तुम कदाचित् कर्मोंके कर्ता और सुख-दुखोंके भोक्ता जीवोंको अनेक तथा जगत्, काल, वेद और आत्माओंको नित्य मानते हो; साथ ही समस्त पदार्थोंकी स्थिति प्रवाहसे नित्य और यथार्थ स्वीकार करते हो तथा यह समझते हो कि घट-पट आदि बाह्य आकृतियोंके भेदसे उनके अनुसार ज्ञान ही उत्पन्न होता और बदलता रहता है; तो ऐसे मतके माननेसे बड़ा अनर्थ हो जायगा। (क्योंकि इस प्रकार जगत्के कर्ता आत्माकी नित्य सत्ता और जन्म-मृत्युके चक्करसे मुक्ति भी सिद्ध न हो सकेगी।) यदि कदाचित् ऐसा स्वीकार भी कर लिया जाय तो देह और संवत्सरादि कालावयवोंके सम्बन्धसे होनेवाली जीवोंकी जन्म-मरण आदि अवस्थाएँ भी नित्य होनेके कारण दूर न हो सकेंगी; क्योंकि तुम देहादि पदार्थ और कालकी नित्यता स्वीकार करते हो। इसके सिवा, यहाँ भी कर्मोंका कर्ता तथा सुख-दु:खका भोक्ता जीव परतन्त्र ही दिखायी देता है; यदि वह स्वतन्त्र हो तो दु:खका फल क्यों भोगना चाहेगा ? इस प्रकार सुख-भोगकी समस्या सुलझ जानेपर भी दु:ख- भोगकी समस्या तो उलझी ही रहेगी। अत: इस मतके अनुसार जीवको कभी मुक्ति या स्वतन्त्रता प्राप्त न हो सकेगी । जब जीव स्वरूपत: परतन्त्र है, विवश है, तब तो स्वार्थ या परमार्थ कोई भी उसका सेवन न करेगा। अर्थात् वह स्वार्थ और परमार्थ दोनोंसे ही वञ्चित रह जायगा ॥ १४—१७ ॥ (यदि यह कहा जाय कि जो भलीभाँति कर्म करना जानते हैं, वे सुखी रहते हैं, और जो नहीं जानते उन्हें दु:ख भोगना पड़ता है तो यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि) ऐसा देखा जाता है कि बड़े-बड़े कर्मकुशल विद्वानोंको भी कुछ सुख नहीं मिलता और मूढ़ोंका भी कभी दु:खसे पाला नहीं पड़ता। इसलिये जो लोग अपनी बुद्धि या कर्मसे सुख पानेका घमंड करते हैं, उनका वह अभिमान व्यर्थ है ॥ १८ ॥ यदि यह स्वीकार कर लिया जाय कि वे लोग सुखकी प्राप्ति और दु:खके नाशका ठीक-ठीक उपाय जानते हैं, तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्हें भी ऐसे उपायका पता नहीं है, जिससे मृत्यु उनके ऊपर कोई प्रभाव न डाल सके और वे कभी मरें ही नहीं ॥ १९ ॥ जब मृत्यु उनके सिरपर नाच रही है, तब ऐसी कौन-सी भोग-सामग्री या भोग-कामना है जो उन्हें सुखी कर सके ? भला, जिस मनुष्यको फाँसीपर लटकानेके लिये वधस्थानपर ले जाया जा रहा है, उसे क्या फूल-चन्दन-स्त्री आदि पदार्थ सन्तुष्ट कर सकते हैं ? कदापि नहीं। (अत: पूर्वोक्त मत माननेवालोंकी दृष्टिसे न सुख ही सिद्ध होगा और न जीवका कुछ पुरुषार्थ ही रहेगा) ॥ २० ॥

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[*] यहाँतक यह बात स्पष्ट हो गयी कि स्वयंप्रकाश ज्ञानस्वरूप नित्य एक ही आत्मा है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म देहके कारण हैं। आत्माके अतिरिक्त जो कुछ है, सब अनित्य और मायामय है; इसलिये आत्मज्ञान होते ही समस्त विपत्तियोंसे मुक्ति मिल जाती है।

 

शेष आगामी पोस्ट में --

गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



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