बुधवार, 8 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - बारहवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

मैत्रेय उवाच -
निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययोः
     मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः ।
कृताभिषेकः कृतनित्यमङ्‌गलो
     मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत् ॥ २८ ॥
परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदौ अवभिवन्द्य च ।
इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्‌रूपं हिरण्मयम् ॥ २९ ॥
तदोत्तानपदः पुत्रो ददर्शान्तकमागतम् ।
मृत्योर्मूर्ध्नि पदं दत्त्वा आरुरोहाद्‌भुतं गृहम् ॥ ३० ॥
तदा दुन्दुभयो नेदुः मृदङ्‌गपणवादयः ।
गन्धर्वमुख्याः प्रजगुः पेतुः कुसुमवृष्टयः ॥ ३१ ॥
स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुवः ।
अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम् ॥ ३२ ॥
इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ ।
दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम् ॥ ३३ ॥
तत्र तत्र प्रशंसद्‌भिः पथि वैमानिकैः सुरैः ।
अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमैः क्रमशो ग्रहान् ॥ ३४ ॥
त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि ।
परस्ताद्यद्ध्रुवगतिः विष्णोः पदमथाभ्यगात् ॥ ३५ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्‌के प्रमुख पार्षदोंके ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुवजीने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो माङ्गलिक अलङ्कारादि धारण किये। बदरिकाश्रममें रहनेवाले मुनियोंको प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया ॥ २८ ॥ इसके बाद उस श्रेष्ठ विमानकी पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदोंको प्रणाम कर सुवर्णके समान कान्तिमान् दिव्य रूप धारण कर उसपर चढऩेको तैयार हुए ॥ २९ ॥ इतनेमें ही ध्रुवजीने देखा कि काल मूर्तिमान् होकर उनके सामने खड़ा है। तब वे मृत्युके सिरपर पैर रखकर उस समय अद्भुत विमानपर चढ़ गये ॥ ३० ॥ उस समय आकाशमें दुन्दुभि, मृदङ्ग और ढोल आदि बाजे बजने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे और फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३१ ॥
विमानपर बैठकर ध्रुवजी ज्यों-ही भगवान्‌के धामको जानेके लिये तैयार हुए, त्यों-ही उन्हें अपनी माता सुनीतिका स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, ‘क्या मैं बेचारी माताको छोडक़र अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधामको जाऊँगा ?’ ॥ ३२ ॥ नन्द और सुनन्दने ध्रुवके हृदयकी बात जानकर उन्हें दिखलाया कि देवी सुनीति आगे-आगे दूसरे विमानपर जा रही हैं ॥ ३३ ॥ उन्होंने क्रमश: सूर्य आदि सभी ग्रह देखे। मार्गमें जहाँ-तहाँ विमानोंपर बैठे हुए देवता उनकी प्रशंसा करते हुए फूलोंकी वर्षा करते जाते थे ॥ ३४ ॥ उस दिव्य विमानपर बैठकर ध्रुवजी त्रिलोकीको पारकर सप्तर्षिमण्डलसे भी ऊपर भगवान्‌ विष्णुके नित्यधाममें पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की ॥ ३५ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - बारहवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

सुनन्दनन्दावूचतुः -

भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः श्रृणु ।
यः पञ्चवर्षस्तपसा भवान् देवमतीतृपत् ॥ २३ ॥
तस्याखिलजगद्धातुः आवां देवस्य शार्ङ्‌गिणः ।
पार्षदौ इविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम् ॥ २४ ॥
सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया
     यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् ।
आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो
     ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम् ॥ २५ ॥
अनास्थितं ते पितृभिः अन्यैरप्यङ्‌ग कर्हिचित् ।
आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ २६ ॥
एतद्विमानप्रवरं उत्तमश्लोकमौलिना ।
उपस्थापितमायुष्मन् अधिरोढुं त्वमर्हसि ॥ २७ ॥

सुनन्द और नन्द कहने लगे—राजन् ! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्षकी अवस्थामें ही तपस्या करके सर्वेश्वर भगवान्‌को प्रसन्न कर लिया था ॥ २३ ॥ हम उन्हीं निखिलजगन्नियन्ता शार्ङ्गपाणि भगवान्‌ विष्णु के सेवक हैं और आप को भगवान्‌ के धाम में ले जानेके लिये यहाँ आये हैं ॥ २४ ॥ आपने अपनी भक्ति के प्रभाव से विष्णुलोक का अधिकार प्राप्त किया है, जो औरों के लिये बड़ा दुर्लभ है परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँ तक नहीं पहुँच सके, वे नीचे से केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाममें निवास कीजिये ॥ २५ ॥ प्रियवर ! आजतक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पदपर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान्‌ विष्णुका वह परमधाम सारे संसारका वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों ॥ २६ ॥ आयुष्मन् ! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोकशिखामणि श्रीहरिने आपके लिये ही भेजा है, आप इसपर चढऩेयोग्य हैं ॥ २७ ॥

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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - बारहवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य
     बद्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः ।
स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्
     ध्यायन् तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ ॥ १७ ॥
भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्रम्
     आनन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः ।
विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्‌गो
     नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्‌गः ॥ १८ ॥
स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद् ध्रुवः ।
विभ्राजयद् दश दिशो राकापतिमिवोदितम् ॥ १९ ॥
तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ
     श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ ।
स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ
     किरीटहाराङ्‌गदचारुकुण्डलौ ॥ २० ॥
विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्‌करौ
     अभ्युत्थितः साध्वसविस्मृतक्रमः ।
ननाम नामानि गृणन्मधुद्विषः
     पार्षत्प्रधानौ इति संहताञ्जलिः ॥ २१ ॥
तं कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसं
     बद्धाञ्जलिं प्रश्रयनम्रकन्धरम् ।
सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितं
     प्रत्यूचतुः पुष्करनाभसम्मतौ ॥ २२ ॥

वहाँ (बदरिकाश्रम में) महात्मा ध्रुव ने पवित्र जल में स्नानकर इन्द्रियोंको विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसन से बैठकर प्राणायामद्वारा वायु को वश में किया। तदनन्तर मनके द्वारा इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनको भगवान्‌के स्थूल विराट्स्वरूपमें स्थिर कर दिया। उसी विराट् रूप का चिन्तन करते-करते वे अन्तमें ध्याता और ध्येयके भेदसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें लीन हो गये और उस अवस्थामें विराट्रूपका भी परित्याग कर दिया ॥ १७ ॥ इस प्रकार भगवान्‌ श्रीहरिके प्रति निरन्तर भक्तिभावका प्रवाह चलते रहनेसे उनके नेत्रोंमें बार-बार आनन्दाश्रुओंकी बाढ़-सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीरमें रोमाञ्च हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जानेसे उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही ॥ १८ ॥
इसी समय ध्रुवजीने आकाशसे एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाशसे दसों दिशाओंको आलोकित कर रहा था; मानो पूर्णिमाका चन्द्र ही उदय हुआ हो ॥ १९ ॥ उसमें दो श्रेष्ठ पार्षद गदाओंका सहारा लिये खड़े थे। उनके चार भुजाएँ थीं, सुन्दर श्याम शरीर था, किशोर अवस्था थी और अरुण कमलके समान नेत्र थे। वे सुन्दर वस्त्र, किरीट, हार, भुजबन्ध और अति मनोहर कुण्डल धारण किये हुए थे ॥ २० ॥ उन्हें पुण्यश्लोक श्रीहरिके सेवक जान ध्रुवजी हड़बड़ाहटमें पूजा आदिका क्रम भूलकर सहसा खड़े हो गये और ये भगवान्‌के पार्षदोंमें प्रधान हैं—ऐसा समझकर उन्होंने श्रीमधुसूदनके नामोंका कीर्तन करते हुए उन्हें हाथ जोडक़र प्रणाम किया ॥ २१ ॥ ध्रुवजीका मन भगवान्‌के चरणकमलोंमें तल्लीन हो गया और वे हाथ जोडक़र बड़ी नम्रतासे सिर नीचा किये खड़े रह गये। तब श्रीहरिके प्रिय पार्षद सुनन्द और नन्दने उनके पास जाकर मुसकराते हुए कहा ॥ २२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - बारहवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

मैत्रेय उवाच –

स राजराजेन वराय चोदितो
     ध्रुवो महाभागवतो महामतिः ।
हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया
     तरत्ययत्ने न दुरत्ययं तमः ॥ ८ ॥
तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः ।
पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत ॥ ९ ॥
अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम् ॥ १० ॥
सर्वात्मनि अच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् ।
ददर्शात्मनि भूतेषु तं एव अवस्थितं विभुम् ॥ ११ ॥
तमेवं शीलसम्पन्नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम् ।
गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजाः ॥ १२ ॥
षट्‌त्रिंशद् वर्षसाहस्रं शशास क्षितिमण्डलम् ।
भोगैः पुण्यक्षयं कुर्वन् अभोगैः अशुभक्षयम् ॥ १३ ॥
एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः ।
त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान् नृपासनम् ॥ १४ ॥
मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि ।
अविद्यारचितस्वप्न गन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥
आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोशम्
     अन्तःपुरं परिविहारभुवश्च रम्याः ।
भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य
     कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम् ॥ १६ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! यक्षराज कुबेरने जब इस प्रकार वर माँगनेके लिये आग्रह किया, तब महाभागवत महामति ध्रुवजीने उनसे यही माँगा कि मुझे श्रीहरिकी अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसारसागरको पार कर जाता है ॥ ८ ॥ इडविडाके पुत्र कुबेरजीने बड़े प्रसन्न मनसे उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुवजी भी अपनी राजधानीको लौट आये ॥ ९ ॥ वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे भगवान्‌ यज्ञपुरुषकी आराधना की; भगवान्‌ ही द्रव्य, क्रिया और देवता- सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफलके दाता भी हैं ॥ १० ॥ सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युतमें प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुवजी अपनेमें और समस्त प्राणियोंमें सर्वव्यापक श्रीहरिको ही विराजमान देखने लगे ॥ ११ ॥ ध्रुवजी बड़े ही शीलसम्पन्न, ब्राह्मणभक्त, दीनवत्सल और धर्ममर्यादाके रक्षक थे; उनकी प्रजा उन्हें साक्षात् पिताके समान मानती थी ॥ १२ ॥ इस प्रकार तरह-तरहके ऐश्वर्यभोगसे पुण्यका और भोगोंके त्यागपूर्वक यज्ञादि कर्मोंके अनुष्ठानसे पापका क्षय करते हुए उन्होंने छत्तीस हजार वर्षतक पृथ्वीका शासन किया ॥ १३ ॥ जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुवने इसी तरह अर्थ, धर्म और कामके सम्पादनमें बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंप दिया ॥ १४ ॥ इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगरके समान मायासे अपनेमें ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहारभूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य—ये सभी कालके गालमें पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रमको चले गये ॥ १५-१६ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - बारहवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

ध्रुवजी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

मैत्रेय उवाच –

ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसाद्
     अपेतमन्युं भगवान् धनेश्वरः ।
तत्रागतश्चारणयक्षकिन्नरैः
     संस्तूयमानो न्यवदत् कृताञ्जलिम् ॥ १ ॥

धनद उवाच –

भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ ।
यत्त्वं पितामहादेशाद् वैरं दुस्त्यजमत्यजः ॥ २ ॥
न भवान् अवधीद्यक्षान् न यक्षा भ्रातरं तव ।
काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयोः ॥ ३ ॥
अहं त्वमित्यपार्था धीः अज्ञानात् पुरुषस्य हि ।
स्वाप्नीवाभात्यतद्ध्यानाद् यया बन्धविपर्ययौ ॥ ४ ॥
तद्गपच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तं अधोक्षजम् ।
सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम् ॥ ५ ॥
भजस्व भजनीयाङ्‌घ्रिं अभवाय भवच्छिदम् ।
युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्यात्ममायया ॥ ॥ ६ ॥
वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं
     मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्‌कितः ।
वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयोः
     अनन्तरं त्वां वयमङ्‌ग शुश्रुम ॥ ७ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं—विदुरजी ! ध्रुव का क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षों के वध से निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान्‌ कुबेर वहाँ आये। उस समय यक्ष, चारण और किन्नरलोग उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुवजी हाथ जोडक़र खड़े हो गये। तब कुबेरने कहा ॥ १ ॥
श्रीकुबेरजी बोले—शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार ! तुमने अपने दादाके उपदेशसे ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया; इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २ ॥ वास्तवमें न तुमने यक्षोंको मारा है और न यक्षोंने तुम्हारे भाईको। समस्त जीवोंकी उत्पत्ति और विनाशका कारण तो एकमात्र काल ही है ॥ ३ ॥ यह मैं-तू आदि मिथ्याबुद्धि तो जीवको अज्ञानवश स्वप्नके समान शरीरादिको ही आत्मा माननेसे उत्पन्न होती है। इसीसे मनुष्यको बन्धन एवं दु:खादि विपरीत अवस्थाओंकी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥ ध्रुव ! अब तुम जाओ, भगवान्‌ तुम्हारा मङ्गल करें। तुम संसारपाशसे मुक्त होनेके लिये सब जीवोंमें समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान्‌ श्रीहरिका भजन करो। वे संसारपाशका छेदन करनेवाले हैं तथा संसारकी उत्पत्ति आदिके लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्तिसे युक्त होकर भी वास्तवमें उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करनेयोग्य हैं ॥ ५-६ ॥ प्रियवर ! हमने सुना है, तुम सर्वदा भगवान्‌ कमलनाभके चरणकमलोंके समीप रहनेवाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पानेयोग्य हो। ध्रुव ! तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो, मुझसे नि:सङ्कोच एवं नि:शङ्क होकर माँग लो ॥ ७ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

संयच्छ रोषं भद्रं ते प्रतीपं श्रेयसां परम् ।
श्रुतेन भूयसा राजन् अगदेन यथामयम् ॥ ३१ ॥
येनोपसृष्टात्पुरुषात् लोक उद्विजते भृशम् ।
न बुधस्तद्वशं गच्छेद् इच्छन् अभयमात्मनः ॥ ३२ ॥
हेलनं गिरिशभ्रातुः धनदस्य त्वया कृतम् ।
यज्जघ्निवान् पुण्यजनान् भ्रातृघ्नानित्यमर्षितः ॥ ३३ ॥
तं प्रसादय वत्साशु सन्नत्या प्रश्रयोक्तिभिः ।
न यावन्महतां तेजः कुलं नोऽभिभविष्यति ॥ ३४ ॥
एवं स्वायम्भुवः पौत्रं अनुशास्य मनुर्ध्रुवम् ।
तेनाभिवन्दितः साकं ऋषिभिः स्वपुरं ययौ ॥ ३५ ॥

(मनुजी ध्रुव से कह रहे हैं) राजन् ! जिस प्रकार ओषधिसे रोग शान्त किया जाता है—उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उसपर विचार करके अपने क्रोधको शान्त करो। क्रोध कल्याणमार्गका बड़ा ही विरोधी है। भगवान्‌ तुम्हारा मङ्गल करें ॥ ३१ ॥ क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषसे सभी लोगोंको बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणीको भय न हो और मुझे भी किसीसे भय न हो, उसे क्रोधके वशमें कभी न होना चाहिये ॥ ३२ ॥ तुमने जो यह समझकर कि ये मेरे भाईके मारनेवाले हैं, इतने यक्षोंका संहार किया है, इससे तुम्हारे द्वारा भगवान्‌ शङ्करके सखा कुबेरजीका बड़ा अपराध हुआ है ॥ ३३ ॥ इसलिये बेटा ! जबतक कि महापुरुषोंका तेज हमारे कुलको आक्रान्त नहीं कर लेता; इसके पहले ही विनम्र भाषण और विनयके द्वारा शीघ्र उन्हें प्रसन्न कर लो ॥ ३४ ॥
इस प्रकार स्वायम्भुव मनुने अपने पौत्र ध्रुवको शिक्षा दी। तब ध्रुवजीने उन्हें प्रणाम किया। इसके पश्चात् वे महर्षियोंके सहित अपने लोकको चले गये ॥ ३५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
चतुर्थस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 5 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट ०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

न चैते पुत्रक भ्रातुः हन्तारो धनदानुगाः ।
विसर्गादानयोस्तात पुंसो दैवं हि कारणम् ॥ २४ ॥
स एव विश्वं सृजति स एवावति हन्ति च ।
अथापि ह्यनहङ्‌कारात् नाज्यते गुणकर्मभिः ॥ २५ ॥
एष भूतानि भूतात्मा भूतेशो भूतभावनः ।
स्वशक्त्या मायया युक्तः सृजत्यत्ति च पाति च ॥ २६ ॥
तमेव मृत्युममृतं तात दैवं
     सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम् ।
यस्मै बलिं विश्वसृजो हरन्ति
     गावो यथा वै नसि दामयन्त्रिताः ॥ २७ ॥
यः पञ्चवर्षो जननीं त्वं विहाय
     मातुः सपत्न्यां वचसा भिन्नमर्मा ।
वनं गतस्तपसा प्रत्यगक्षं
     आराध्य लेभे मूर्ध्नि पदं त्रिलोक्याः ॥ २८ ॥
तमेनमङ्‌गात्मनि मुक्तविग्रहे
     व्यपाश्रितं निर्गुणमेकमक्षरम् ।
आत्मानमन्विच्छ विमुक्तमात्मदृग्
     यस्मिन् इदं भेदमसत्प्रतीयते ॥ २९ ॥
त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त
     आनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तौ ।
भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या
     ग्रन्थिं विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम् ॥ ३० ॥

(मनुजी ध्रुव से कह रहे हैं) बेटा ! ये कुबेर के अनुचर तुम्हारे भाई को मारनेवाले नहीं हैं, क्योंकि मनुष्यके जन्म-मरणका वास्तविक कारण तो ईश्वर है ॥ २४ ॥ एकमात्र वही संसारको रचता, पालता और नष्ट करता है, किन्तु अहंकारशून्य होनेके कारण इसके गुण और कर्मोंसे वह सदा निर्लेप रहता है ॥ २५ ॥ वे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, नियन्ता और रक्षा करनेवाले प्रभु ही अपनी मायाशक्तिसे युक्त होकर समस्त जीवोंका सृजन, पालन और संहार करते हैं ॥ २६ ॥ जिस प्रकार नाक में नकेल पड़े हुए बैल अपने मालिक का बोझा ढोते रहते हैं, उसी प्रकार जगत् की  रचना करनेवाले ब्रह्मादि भी नामरूप डोरीसे बँधे हुए उन्हीं की आज्ञाका पालन करते हैं। वे अभक्तोंके लिये मृत्युरूप और भक्तोंके लिये अमृतरूप हैं तथा संसारके एकमात्र आश्रय हैं। तात ! तुम सब प्रकार उन्हीं परमात्माकी शरण लो ॥ २७ ॥ तुम पाँच वर्षकी ही अवस्थामें अपनी सौतेली माताके वाग्बाणोंसे मर्माहत होकर माँकी गोद छोडक़र वनको चले गये थे। वहाँ तपस्याद्वारा जिन हृषीकेश भगवान्‌की आराधना करके तुमने त्रिलोकीसे ऊपर ध्रुवपद प्राप्त किया है और जो तुम्हारे वैरभावहीन सरल हृदयमें वात्सल्यवश विशेषरूपसे विराजमान हुए थे, उन निर्गुण अद्वितीय अविनाशी और नित्यमुक्त परमात्माको अध्यात्मदृष्टिसे अपने अन्त:करणमें ढूँढ़ो। उनमें यह भेदभावमय प्रपञ्च न होनेपर भी प्रतीत हो रहा है ॥ २८-२९ ॥ ऐसा करनेसे सर्वशक्तिसम्पन्न परमानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी भगवान्‌ अनन्तमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति होगी और उसके प्रभावसे तुम मैं-मेरेपन के रूपमें दृढ़ हुई अविद्या की गाँठ को काट डालोगे ॥ ३० ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट ०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालो ऽनादिरादिकृदव्ययः ।
जनं जनेन जनयन् मारयन् मृत्युनान्तकम् ॥ १९ ॥
न वै स्वपक्षोऽस्य विपक्ष एव वा
     परस्य मृत्योर्विशतः समं प्रजाः ।
तं धावमानं अनुधावन्त्यनीशा
     यथा रजांस्यनिलं भूतसङ्‌घाः ॥ २० ॥
आयुषोऽपचयं जन्तोः तथैवोपचयं विभुः ।
उभाभ्यां रहितः स्वस्थो दुःस्थस्य विदधात्यसौ ॥ २१ ॥
केचित्कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप ।
एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ २२ ॥
अव्यक्तस्याप्रमेयस्य नानाशक्त्युदयस्य च ।
न वै चिकीर्षितं तात को वेदाथ स्वसम्भवम् ॥ २३ ॥

(मनुजी कह रहे हैं) ध्रुव ! वे कालस्वरूप अव्यय परमात्मा ही स्वयं अन्तरहित होकर भी जगत् का अन्त करनेवाले हैं तथा अनादि होकर भी सबके आदिकर्ता हैं। वे ही एक जीवसे दूसरे जीवको उत्पन्न कर संसारकी सृष्टि करते हैं तथा मृत्युके द्वारा मारनेवालेको भी मरवाकर उसका संहार करते हैं ॥ १९ ॥ वे कालभगवान्‌ सम्पूर्ण सृष्टिमें समानरूपसे अनुप्रविष्ट हैं। उनका न तो कोई मित्रपक्ष है और न शत्रुपक्ष। जैसे वायुके चलनेपर धूल उसके साथ-साथ उड़ती है, उसी प्रकार समस्त जीव अपने-अपने कर्मोंके अधीन होकर कालकी गतिका अनुसरण करते हैं—अपने-अपने कर्मानुसार सुख-दु:खादि फल भोगते हैं ॥ २० ॥ सर्वसमर्थ श्रीहरि कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवकी आयुकी वृद्धि और क्षयका विधान करते हैं, परन्तु वे स्वयं इन दोनोंसे रहित और अपने स्वरूपमें स्थित हैं ॥ २१ ॥ राजन् ! इन परमात्माको ही मीमांसकलोग कर्म, चार्वाक स्वभाव, वैशेषिक-मतावलम्बी काल, ज्योतिषी दैव और कामशास्त्री काम कहते हैं ॥ २२ ॥ वे किसी भी इन्द्रिय या प्रमाणके विषय नहीं हैं। महदादि अनेक शक्तियाँ भी उन्हींसे प्रकट हुई हैं। वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी संसारमें कोई नहीं जानता; फिर अपने मूल कारण उन प्रभुको तो जान ही कौन सकता है ॥ २३ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

सर्वभूतात्मभावेन भूतावासं हरिं भवान् ।
आराध्याप दुराराध्यं विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ ११ ॥
स त्वं हरेरनुध्यातः तत्पुंसामपि सम्मतः ।
कथं त्ववद्यं कृतवान् अनुशिक्षन्सतां व्रतम् ॥ १२ ॥
तितिक्षया करुणया मैत्र्या चाखिलजन्तुषु ।
समत्वेन च सर्वात्मा भगवान् सम्प्रसीदति ॥ १३ ॥
सम्प्रसन्ने भगवति पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः ।
विमुक्तो जीवनिर्मुक्तो ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥ १४ ॥
भूतैः पञ्चभिरारब्धैः योषित्पुरुष एव हि ।
तयोर्व्यवायात् सम्भूतिः योषित्पुरुषयोरिह ॥ १५ ॥
एवं प्रवर्तते सर्गः स्थितिः संयम एव च ।
गुणव्यतिकराद् राजन् मायया परमात्मनः ॥ १६ ॥
निमित्तमात्रं तत्रासीत् निर्गुणः पुरुषर्षभः ।
व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७ ॥
स खल्विदं भगवान्कालशक्त्या
     गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः ।
करोत्यकर्तैव निहन्त्यहन्ता
     चेष्टा विभूम्नः खलु दुर्विभाव्या ॥ १८ ॥

(मनुजी ध्रुव से कह रहे हैं) प्रभुकी आराधना करना बड़ा कठिन है, परन्तु तुमने तो लडक़पनमें ही सम्पूर्ण भूतों के आश्रयस्थान श्रीहरिकी सर्वभूतात्मभाव से आराधना करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया है ॥ ११ ॥ तुम्हें तो प्रभु भी अपना प्रिय भक्त समझते हैं तथा भक्तजन भी तुम्हारा आदर करते हैं। तुम साधुजनों के पथप्रदर्शक हो; फिर भी तुमने ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे किया? ॥ १२ ॥ सर्वात्मा श्री हरि तो अपने से बड़े पुरुषों के प्रति सहनशीलता, छोटों के प्रति दया, बराबरवालों के साथ मित्रता और समस्त जीवोंके साथ समताका बर्ताव करनेसे ही प्रसन्न होते हंप ॥ १३ ॥ और प्रभुके प्रसन्न हो जानेपर पुरुष प्राकृत गुण एवं उनके कार्यरूप लिङ्गशरीरसे छूटकर परमानन्दस्वरूप ब्रह्मपद प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥
बेटा ध्रुव ! देहादिके रूपमें परिणत हुए पञ्चभूतोंसे ही स्त्री-पुरुषका आविर्भाव होता है और फिर उनके पारस्परिक समागमसे दूसरे स्त्री-पुरुष उत्पन्न होते हैं ॥ १५ ॥ ध्रुव ! इस प्रकार भगवान्‌की मायासे सत्त्वादि गुणोंमें न्यूनाधिकभाव होनेसे ही जैसे भूतोंद्वारा शरीरोंकी रचना होती है, वैसे ही उनकी स्थिति और प्रलय भी होते हैं ॥ १६ ॥ पुरुषश्रेष्ठ ! निर्गुण परमात्मा तो इनमें केवल निमित्तमात्र है; उसके आश्रयसे यह कार्य-कारणात्मक जगत् उसी प्रकार भ्रमता रहता है, जैसे चुम्बकके आश्रयसे लोहा ॥ १७ ॥ काल-शक्तिके द्वारा क्रमश: सत्त्वादि गुणोंमें क्षोभ होनेसे लीलामय भगवान्‌की शक्ति भी सृष्टि आदिके रूपमें विभक्त हो जाती है; अत: भगवान्‌ अकर्ता होकर भी जगत् की रचना करते हैं और संहार करनेवाले न होकर भी इसका संहार करते हैं। सचमुच उन अनन्त प्रभुकी लीला सर्वथा अचिन्तनीय है ॥ १८ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - ग्यारहवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

स्वायम्भुव मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

मैत्रेय उवाच -
निशम्य गदतामेवं ऋषीणां धनुषि ध्रुवः ।
सन्दधेऽस्त्रमुपस्पृश्य यन्नारायणनिर्मितम् ॥ १ ॥
सन्धीयमान एतस्मिन् माया गुह्यकनिर्मिताः ।
क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा ॥ २ ॥
तस्यार्षास्त्रं धनुषि प्रयुञ्जतः
     सुवर्णपुङ्‌खाः कलहंसवाससः ।
विनिःसृता आविविशुर्द्विषद्बञलं
     यथा वनं भीमरवाः शिखण्डिनः ॥ ३ ॥
तैस्तिग्मधारैः प्रधने शिलीमुखैः
     इतस्ततः पुण्यजना उपद्रुताः ।
तमभ्यधावन् कुपिता उदायुधाः
     सुपर्णं उन्नद्धफणा इवाहयः ॥ ४ ॥
स तान् पृषत्कैरभिधावतो मृधे
     निकृत्तबाहूरुशिरोधरोदरान् ।
निनाय लोकं परमर्कमण्डलं
     व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ॥ ५ ॥
तान् हन्यमानानभिवीक्ष्य गुह्यकान्
     अनागसश्चित्ररथेन भूरिशः ।
औत्तानपादिं कृपया पितामहो
     मनुर्जगादोपगतः सहर्षिभिः ॥ ६ ॥

मनुरुवाच -
अलं वत्सातिरोषेण तमोद्वारेण पाप्मना ।
येन पुण्यजनानेतान् अवधीस्त्वं अनागसः ॥ ७ ॥
नास्मत्कुलोचितं तात कर्मैतत् सद्विगर्हितम् ।
वधो यदुपदेवानां आरब्धस्तेऽकृतैनसाम् ॥ ८ ॥
नन्वेकस्यापराधेन प्रसङ्‌गाद् बहवो हताः ।
भ्रातुर्वधाभितप्तेन त्वयाङ्‌ग भ्रातृवत्सल ॥ ९ ॥
नायं मार्गो हि साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम् ।
यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद्‌भूतवैशसम् ॥ १० ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी ! ऋषियोंका ऐसा कथन सुनकर महराज ध्रुवने आचमन कर श्रीनारायणके बनाये हुए नारायणास्त्रको अपने धनुषपर चढ़ाया ॥ १ ॥ उस बाणके चढ़ाते ही यक्षोंद्वारा रची हुई नाना प्रकारकी माया उसी क्षण नष्ट हो गयी, जिस प्रकार ज्ञानका उदय होनेपर अविद्यादि क्लेश नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ॥ ऋषिवर नारायणके द्वारा आविष्कृत उस अस्त्रको धनुषपर चढ़ाते ही उससे राजहंसके-से पक्ष और सोनेके फलवाले बड़े तीखे बाण निकले और जिस प्रकार मयूर केकारव करते वनमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार भयानक साँय-साँय शब्द करते हुए वे शत्रुकी सेनामें घुस गये ॥ ३ ॥ उन तीखी धारवाले बाणोंने शत्रुओंको बेचैन कर दिया। तब उस रणाङ्गणमें अनेकों यक्षोंने अत्यन्त कुपित होकर अपने अस्त्र-शस्त्र सँभाले और जिस प्रकार गरुडके छेडऩेसे बड़े-बड़े सर्प फन उठाकर उनकी ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार वे इधर-उधरसे ध्रुवजीपर टूट पड़े ॥ ४ ॥ उन्हें सामने आते देख ध्रुवजीने अपने बाणोंद्वारा उनकी भुजाएँ, जाँघें, कंधे और उदर आदि अङ्ग-प्रत्यङ्गोंको छिन्न-भिन्न कर उन्हें उस सर्वश्रेष्ठ लोक (सत्यलोक) में भेज दिया, जिसमें ऊर्ध्वरेता मुनिगण सूर्यमण्डलका भेदन करके जाते हैं ॥ ५ ॥ अब उनके पितामह स्वायम्भुव मनुने देखा कि विचित्र रथपर चढ़े हुए ध्रुव अनेकों निरपराध यक्षोंको मार रहे हैं, तो उन्हें उनपर बहुत दया आयी। वे बहुत-से ऋषियोंको साथ लेकर वहाँ आये और अपने पौत्र ध्रुवको समझाने लगे ॥ ६ ॥
मनुजीने कहा—बेटा ! बस, बस ! अधिक क्रोध करना ठीक नहीं। यह पापी नरकका द्वार है। इसीके वशीभूत होकर तुमने इन निरपराध यक्षोंका वध किया है ॥ ७ ॥ तात ! तुम जो निर्दोष यक्षोंके संहारपर उतर रहे हो, यह हमारे कुलके योग्य कर्म नहीं है; साधु पुरुष इसकी बड़ी निन्दा करते हैं ॥ ८ ॥ बेटा ! तुम्हारा अपने भाईपर बड़ा अनुराग था, यह तो ठीक है; परन्तु देखो, उसके वधसे सन्तप्त होकर तुमने एक यक्षके अपराध करनेपर प्रसङ्गवश कितनोंकी हत्या कर डाली ॥ ९ ॥ इस जड शरीरको ही आत्मा मानकर इसके लिये पशुओंकी भाँति प्राणियोंकी हिंसा करना यह भगवत्सेवी साधुजनोंका मार्ग नहीं है ॥ १० ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध अठारहवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  पंचम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९) भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन करोति विश्वस्थितिसंयमोदय...