बुधवार, 1 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

तत्रोपायसहस्राणामयं भगवतोदितः
यदीश्वरे भगवति यथा यैरञ्जसा रतिः ||२९||
गुरुशुश्रूषया भक्त्या सर्वलब्धार्पणेन च
सङ्गेन साधुभक्तानामीश्वराराधनेन च ||३०||
श्रद्धया तत्कथायां च कीर्तनैर्गुणकर्मणाम्
तत्पादाम्बुरुहध्यानात्तल्लिङ्गेक्षार्हणादिभिः ||३१||

यों तो इन त्रिगुणात्मक कर्मों की जड़ उखाड़ फेंकने के लिये अथवा बुद्धि-वृत्तियों का प्रवाह बंद कर देने के लिये सहस्रों साधन हैं; परंतु जिस उपाय से और जैसे सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ में स्वाभाविक निष्काम प्रेम हो जाय, वही उपाय सर्वश्रेष्ठ है । यह बात स्वयं भगवान्‌ ने कही है    ॥ २९ ॥ गुरु की प्रेमपूर्वक सेवा, अपने को जो कुछ मिले वह सब प्रेम से भगवान्‌- को समर्पित कर देना, भगवत्प्रेमी महात्माओं का सत्सङ्ग, भगवान्‌ की आराधना, उनकी कथा- वार्ता में श्रद्धा, उनके गुण और लीलाओं का कीर्तन, उनके चरणकमलों का ध्यान और उनके मन्दिर- मूर्ति आदि का दर्शन-पूजन आदि साधनों से भगवान्‌ में स्वाभाविक प्रेम हो जाता है ॥ ३०-३१ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः
ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ||२५||
एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः
स्वरूपमात्मनो बुध्येद्गन्धैर्वायुमिवान्वयात् ||२६||
एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः
अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवार्प्यते ||२७||
तस्माद्भवद्भिः कर्तव्यं कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्
बीजनिर्हरणं योगः प्रवाहोपरमो धियः ||२८||

जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं । इन वृत्तियों का जिसके द्वारा अनुभव होता है—वही सबसे अतीत, सबका साक्षी परमात्मा है ॥ २५ ॥ जैसे गन्ध से उसके आश्रय वायु का ज्ञान होता है, वैसे ही बुद्धि की इन कर्मजन्य एवं बदलनेवाली तीनों अवस्थाओं के द्वारा इनमें साक्षीरूप से अनुगत आत्मा को जाने ॥ २६ ॥ गुणों और कर्मों के कारण होनेवाला जन्म-मृत्यु का यह चक्र आत्मा को शरीर और प्रकृति से पृथक् न करने के कारण ही है। यह अज्ञानमूलक एवं मिथ्या है । फिर भी स्वप्न के समान जीव को इसकी प्रतीति हो रही है ॥ २७ ॥ इसलिये तुम लोगों को सब से पहले इन गुणों के अनुसार होने वाले कर्मों का बीज ही नष्ट कर देना चाहिये । इससे बुद्धि-वृत्तियों का प्रवाह निवृत्त हो जाता है। इसी को दूसरे शब्दों में योग या परमात्मा से मिलन कहते हैं ॥ २८ ॥ 

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मंगलवार, 30 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः
विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ||२२||
देहस्तु सर्वसङ्घातो जगत्तस्थुरिति द्विधा
अत्रैव मृग्यः पुरुषो नेति नेतीत्यतत्त्यजन् ||२३||
अन्वयव्यतिरेकेण विवेकेनोशतात्मना
स्वर्गस्थानसमाम्नायैर्विमृशद्भिरसत्वरैः ||२४||

आचार्यों ने मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ—इन आठ तत्त्वों को प्रकृति बतलाया है। उनके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम तथा उनके विकार हैं सोलह—दस इन्द्रियाँ, एक मन और पञ्चमहाभूत । इन सब में एक पुरुषतत्त्व अनुगत है ॥ २२ ॥ इन सब का समुदाय ही देह है । यह दो प्रकार का है—स्थावर और जङ्गम । इसी में अन्त:करण, इन्द्रिय आदि अनात्मवस्तुओं का ‘यह आत्मा नहीं है’—इस प्रकार बाध करते हुए आत्माको ढूँढऩा चाहिये ॥ २३ ॥ आत्मा सब में अनुगत है, परंतु है वह सब से पृथक्। इस प्रकार शुद्ध बुद्धि से धीरे-धीरे संसार की उत्पत्ति, स्थिति और उसके प्रलयपर विचार करना चाहिये। उतावली नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः
फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ||१८|
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्ध एकः क्षेत्रज्ञ आश्रयः
अविक्रियः स्वदृघेतुर्व्यापकोऽसङ्ग्यनावृतः ||१९||
एतैर्द्वादशभिर्विद्वानात्मनो लक्षणैः परैः
अहं ममेत्यसद्भावं देहादौ मोहजं त्यजेत् ||२०||
स्वर्णं यथा ग्रावसु हेमकारः क्षेत्रेषु योगैस्तदभिज्ञ आप्नुयात्
क्षेत्रेषु देहेषु तथात्मयोगैरध्यात्मविद्ब्रह्मगतिं लभेत ||२१||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) जैसे ईश्वरमूर्ति काल की प्रेरणा से वृक्षों के फल लगते,ठहरते,बढ़ते,पकते, क्षीण होते और नष्ट हो जाते हैं—वैसे ही जन्म, अस्तित्व की अनुभूति, वृद्धि, परिणाम, क्षय और विनाश—ये छ: भाव-विकार शरीर में ही देखे जाते हैं,आत्मा से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है ॥१८॥ आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, एक, क्षेत्रज्ञ, आश्रय, निर्विकार, स्वयं-प्रकाश, सब का कारण, व्यापक, असङ्ग तथा आवरणरहित है ॥ १९ ॥ ये बारह आत्मा के उत्कृष्ट लक्षण हैं। इनके द्वारा आत्मतत्त्व को जाननेवाले पुरुष को चाहिये कि शरीर आदि में अज्ञान के कारण जो ‘मैं’ और ‘मेरे’का झूठा भाव हो रहा है, उसे छोड़ दे ॥ २० ॥ जिस प्रकार सुवर्ण की खानों में पत्थर में मिले हुए सुवर्ण को उसके निकालने की विधि जानने वाला स्वर्णकार उन विधियों से उसे प्राप्त कर लेता है, वैसे ही अध्यात्मतत्त्व को जाननेवाला पुरुष आत्मप्राप्ति के उपायोंद्वारा अपने शरीररूप क्षेत्रमें ही ब्रह्मपदका साक्षात्कार कर लेता है ॥ २१ ॥

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सोमवार, 29 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

ततो मे मातरमृषिः समानीय निजाश्रमे
आश्वास्येहोष्यतां वत्से यावत्ते भर्तुरागमः ||१२||
तथेत्यवात्सीद्देवर्षेरन्तिके साकुतोभया
यावद्दैत्यपतिर्घोरात्तपसो न न्यवर्तत ||१३||
ऋषिं पर्यचरत्तत्र भक्त्या परमया सती
अन्तर्वत्नी स्वगर्भस्य क्षेमायेच्छाप्रसूतये ||१४||
ऋषिः कारुणिकस्तस्याः प्रादादुभयमीश्वरः
धर्मस्य तत्त्वं ज्ञानं च मामप्युद्दिश्य निर्मलम् ||१५||
तत्तु कालस्य दीर्घत्वात्स्त्रीत्वान्मातुस्तिरोदधे
ऋषिणानुगृहीतं मां नाधुनाप्यजहात्स्मृतिः ||१६||
भवतामपि भूयान्मे यदि श्रद्दधते वचः
वैशारदी धीः श्रद्धातः स्त्रीबालानां च मे यथा ||१७||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) इसके बाद देवर्षि नारदजी मेरी माता को अपने आश्रमपर लिवा गये और उसे समझा-बुझाकर कहा कि—‘बेटी ! जबतक तुम्हारा पति तपस्या करके लौटे, तबतक तुम यहीं रहो’ ॥ १२ ॥ ‘जो आज्ञा’ कहकर वह निर्भयता से देवर्षि नारद के आश्रमपर ही रहने लगी और तबतक रही, जबतक मेरे पिता घोर तपस्या से लौटकर नहीं आये ॥ १३ ॥ मेरी गर्भवती माता मुझ गर्भस्थ शिशु की मङ्गलकामना से और इच्छित समयपर (अर्थात् मेरे पिता के लौटने के बाद) सन्तान उत्पन्न करने की कामना से बड़े प्रेम तथा भक्ति के साथ नारदजी की सेवा-शुश्रूषा करती रही ॥ १४ ॥
देवर्षि नारदजी बड़े दयालु और सर्वसमर्थ हैं। उन्होंने मेरी माँ को भागवतधर्म का रहस्य और विशुद्ध ज्ञान—दोनों का उपदेश किया। उपदेश करते समय उनकी दृष्टि मुझपर भी थी ॥ १५ ॥ बहुत समय बीत जाने के कारण और स्त्री होने के कारण भी मेरी माता को तो अब उस ज्ञान की स्मृति नहीं रही, परंतु देवर्षि की विशेष कृपा होने के कारण मुझे उसकी विस्मृति नहीं हुई ॥१६॥ यदि तुमलोग मेरी इस बातपर श्रद्धा करो तो तुम्हें भी वह ज्ञान हो सकता है। क्योंकि श्रद्धा से स्त्री और बालकों की बुद्धि भी मेरे ही समान शुद्ध हो सकती है ॥ १७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

नीयमानां भयोद्विग्नां रुदतीं कुररीमिव
यदृच्छयागतस्तत्र देवर्षिर्ददृशे पथि ||७||
प्राह नैनां सुरपते नेतुमर्हस्यनागसम्
मुञ्च मुञ्च महाभाग सतीं परपरिग्रहम् ||८||

श्रीइन्द्र उवाच
आस्तेऽस्या जठरे वीर्यमविषह्यं सुरद्विषः
आस्यतां यावत्प्रसवं मोक्ष्येऽर्थपदवीं गतः ||९||

श्रीनारद उवाच
अयं निष्किल्बिषः साक्षान्महाभागवतो महान्
त्वया न प्राप्स्यते संस्थामनन्तानुचरो बली ||१०||
इत्युक्तस्तां विहायेन्द्रो देवर्षेर्मानयन्वचः
अनन्तप्रियभक्त्यैनां परिक्रम्य दिवं ययौ ||११||

(प्रह्लादजी कह रहे हैं) मेरी माँ भय से घबराकर कुररी पक्षी की भाँति रो रही थी और इन्द्र उसे बलात् लिये जा रहे थे । दैववश देवर्षि नारद उधर आ निकले और उन्होंने मार्ग में मेरी माँ को देख लिया ॥ ७ ॥ उन्होंने कहा—‘देवराज ! यह निरपराध है। इसे ले जाना उचित नहीं । महाभाग ! इस सती-साध्वी परनारी का तिरस्कार मत करो। इसे छोड़ दो, तुरंत छोड़ दो !’ ॥८॥
इन्द्रने कहा—इसके पेट में देवद्रोही हिरण्यकशिपु का अत्यन्त प्रभावशाली वीर्य है । प्रसवपर्यन्त यह मेरे पास रहे, बालक हो जानेपर उसे मारकर मैं इसे छोड़ दूँगा ॥ ९ ॥
नारदजी ने कहा—‘इसके गर्भ में भगवान्‌ का साक्षात् परम प्रेमी भक्त और सेवक,अत्यन्त बली और निष्पाप महात्मा है। तुम में उस को मारने की शक्ति नहीं है’ ॥ १० ॥ देवर्षि नारद की यह बात सुनकर उसका सम्मान करते हुए इन्द्र ने मेरी माता को छोड़ दिया । और फिर इसके गर्भ में भगवद्भक्त है, इस भाव से उन्होंने मेरी माता की प्रदक्षिणा की तथा अपने लोक में चले गये ॥११॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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रविवार, 28 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

श्रीनारद उवाच
एवं दैत्यसुतैः पृष्टो महाभागवतोऽसुरः
उवाच तान्स्मयमानः स्मरन्मदनुभाषितम् ||१||

श्रीप्रह्लाद उवाच
पितरि प्रस्थितेऽस्माकं तपसे मन्दराचलम्
युद्धोद्यमं परं चक्रुर्विबुधा दानवान्प्रति ||२||
पिपीलिकैरहिरिव दिष्ट्या लोकोपतापनः
पापेन पापोऽभक्षीति वदन्तो वासवादयः ||३||
तेषामतिबलोद्योगं निशम्यासुरयूथपाः
वध्यमानाः सुरैर्भीता दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ||४||
कलत्रपुत्रवित्ताप्तान्गृहान्पशुपरिच्छदान्
नावेक्ष्यमाणास्त्वरिताः सर्वे प्राणपरीप्सवः ||५||
व्यलुम्पन्राजशिबिरममरा जयकाङ्क्षिणः
इन्द्रस्तु राजमहिषीं मातरं मम चाग्रहीत् ||६||

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब दैत्यबालकों ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान्‌ के परम प्रेमी भक्त प्रह्लाद जी को मेरी बात का स्मरण हो आया । कुछ मुसकराते हुए उन्होंने उनसे कहा ॥ १ ॥
प्रह्लादजी ने कहा—जब हमारे पिता जी तपस्या करने के लिये मन्दराचलपर चले गये, तब इन्द्रादि देवताओं ने दानवों से युद्ध करने का बहुत बड़ा उद्योग किया ॥ २ ॥ वे इस प्रकार कहने लगे कि जैसे चींटियाँ साँप को चाट जाती हैं, वैसे ही लोगों को सताने वाले पापी हिरण्यकशिपु को उसका पाप ही खा गया ॥ ३ ॥ जब दैत्य सेनापतियों को देवताओं की भारी तैयारी का पता चला, तब उनका साहस जाता रहा । वे उनका सामना नहीं कर सके। मार खाकर स्त्री, पुत्र,मित्र, गुरुजन,महल,पशु और साज-सामान की कुछ भी चिन्ता न करके वे अपने प्राण बचाने के लिये बड़ी जल्दी में सब-के-सब इधर-उधर भाग गये ॥ ४-५ ॥ अपनी जीत चाहने वाले देवताओं ने राजमहल में लूट-खसोट मचा दी। यहाँतक कि इन्द्र ने राजरानी मेरी माता कयाधू को भी बन्दी बना लिया ॥ ६ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०९)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

श्रीदैत्यपुत्रा ऊचुः 

प्रह्लाद त्वं वयं चापि नर्तेऽन्यं विद्महे गुरुम् । 
एताभ्यां गुरुपुत्राभ्यां बालानामपि हीश्वरौ ॥ २९ ॥ 
बालस्यान्तःपुरस्थस्य महत्सङ्‌गो दुरन्वयः । 
छिन्धि नः संशयं सौम्य स्यात् चेत् विश्रम्भकारणम् ॥ ३० ॥ 

प्रह्लादजी के सहपाठियों ने पूछा—प्रह्लादजी ! इन दोनों गुरुपुत्रों को छोडक़र और किसी गुरु को तो न तुम जानते हो और न हम । ये ही हम सब बालकों के शासक हैं ॥ २९ ॥ तुम एक तो अभी छोटी अवस्था के हो और दूसरे जन्म से ही महल में अपनी माँ के पास रहे हो । तुम्हारा महात्मा नारदजी से मिलना कुछ असङ्गत-सा जान पड़ता है । प्रियवर ! यदि इस विषय में  विश्वास दिलाने वाली कोई बात हो तो तुम उसे कहकर हमारी शङ्का मिटा दो ॥ ३० ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे प्रह्लादचरिते षष्ठोऽध्यायः॥६॥ 

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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शनिवार, 27 जून 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०८)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

धर्मार्थकाम इति योऽभिहितस्त्रिवर्ग 
     ईक्षा त्रयी नयदमौ विविधा च वार्ता ।
मन्ये तदेतदखिलं निगमस्य सत्यं 
     स्वात्मार्पणं स्वसुहृदः परमस्य पुंसः ॥ २६ ॥ 
ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाह 
     नारायणो नरसखः किल नारदाय ।
एकान्तिनां भगवतः तदकिञ्चनानां 
     पादारविन्द रजसाऽऽप्लुतदेहिनां स्यात् ॥ २७ ॥ 
श्रुतं एतन्मया पूर्वं ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् । 
धर्मं भागवतं शुद्धं नारदाद् देवदर्शनात् ॥ २८ ॥ 

यों शास्त्रों में धर्म,अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थों का भी वर्णन है । आत्मविद्या,कर्मकाण्ड, न्याय (तर्कशास्त्र), दण्डनीति और जीविका के विविध साधन—ये सभी वेदों के प्रतिपाद्य विषय हैं; परन्तु यदि ये अपने परम हितैषी, परम पुरुष भगवान्‌ श्रीहरि को आत्मसमर्पण करने में सहायक हैं, तभी मैं इन्हें सत्य (सार्थक) मानता हूँ । अन्यथा ये सब-के-सब निरर्थक हैं ॥ २६ ॥ यह निर्मल ज्ञान जो मैंने तुम लोगोंको बतलाया है, बड़ा ही दुर्लभ है। इसे पहले नर- नारायण ने नारदजी को उपदेश किया था और यह ज्ञान उन सब लोगों को प्राप्त हो सकता है, जिन्होंने भगवान्‌ के अनन्यप्रेमी एवं अकिञ्चन भक्तों के चरणकमलों की धूलि से अपने शरीर को नहला लिया है ॥ २७ ॥ यह विज्ञानसहित ज्ञान विशुद्ध भागवतधर्म है। इसे मैंने भगवान्‌ का दर्शन कराने वाले देवर्षि नारदजी के मुँहसे ही पहले-पहल सुना था ॥ २८ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - छठा अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०७)

प्रह्लादजी का असुर-बालकों को उपदेश

केवलानुभवानन्द स्वरूपः परमेश्वरः । 
माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २३ ॥ 
तस्मात्सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् । 
आसुरं भावमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ २४ ॥ 
तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये 
     किं तैर्गुणव्यतिकरादिह ये स्वसिद्धाः ।
धर्मादयः किमगुणेन च काङ्‌क्षितेन 
     सारंजुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥ २५ ॥ 

वे (भगवान) केवल अनुभवस्वरूप, आनन्दस्वरूप एकमात्र परमेश्वर ही हैं। गुणमयी सृष्टि करनेवाली माया के द्वारा ही उनका ऐश्वर्य छिप रहा है। इसके निवृत्त होते ही उनके दर्शन हो जाते हैं ॥ २३ ॥ इसलिये तुमलोग अपने दैत्यपने का, आसुरी सम्पत्ति का त्याग करके समस्त प्राणियों पर दया करो। प्रेमसे उनकी भलाई करो। इसी से भगवान्‌ प्रसन्न होते हैं ॥ २४ ॥ आदिनारायण अनन्त भगवान्‌ के प्रसन्न हो जाने पर ऐसी कौन-सी वस्तु है,जो नहीं मिल जाती ? लोक और परलोक के लिये जिन धर्म, अर्थ आदि की आवश्यकता बतलायी जाती है—वे तो गुणों के परिणाम से बिना प्रयास के स्वयं ही मिलनेवाले हैं । जब हम श्रीभगवान्‌ के चरणामृत का सेवन करने और उनके नाम-गुणों का कीर्तन करने में लगे हैं, तब हमें मोक्ष की भी क्या आवश्यकता है ॥ २५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट१७) गृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन यूयं नृलोके बत ...