बुधवार, 15 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

अहं हरे तव पादैकमूल 
     दासानुदासो भवितास्मि भूयः । 
मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते 
     गृणीत वाक्कर्म करोतु कायः ॥ २४ ॥
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं 
     न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । 
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा 
     समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्‌क्षे ॥ २५ ॥
अजातपक्षा इव मातरं खगाः 
     स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः । 
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा 
     मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥ २६ ॥
ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं 
     संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः । 
त्वन्माययात्मात्मजदारगेहे
     ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात् ॥ २७ ॥

(भगवान्‌ को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए वृत्रासुरने प्रार्थना की—) ‘प्रभो ! आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्यभावसे आपके चरणकमलोंके आश्रित सेवकोंकी सेवा करनेका अवसर मुझे अगले जन्ममें भी प्राप्त हो। प्राणवल्लभ ! मेरा मन आपके मङ्गलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हींका गान करे और शरीर आपकी सेवामें ही संलग्न रहे ॥ २४ ॥ सर्वसौभाग्यनिधे ! मैं आप को छोडक़र स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकछत्र राज्य, योगकी सिद्धियाँ—यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं चाहता ॥ २५ ॥ जैसे पक्षियों के पंखहीन बच्चे अपनी माकी बाट जोहते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी मा का दूध पीने के लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम से मिलने के लिये उत्कण्ठित रहती है—वैसे ही कमलनयन ! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है ॥ २६ ॥ प्रभो ! मैं मुक्ति नहीं चाहता। मेरे कर्मों के फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकना पड़े, इसकी परवा नहीं। परन्तु मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, जिस-जिस योनि में जन्मूँ, वहाँ-वहाँ भगवान्‌ के प्यारे भक्तजनों से मेरी प्रेम-मैत्री बनी रहे। स्वामिन् ! मैं केवल यही चाहता हूँ कि जो लोग आपकी माया से देह-गेह और स्त्री-पुत्र आदि में आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा कभी किसी प्रकार का भी सम्बन्ध न हो’ ॥ २७ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां 
षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम एकादशोऽध्या‍यः ॥ ११ ॥ 

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा 
     हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः । 
तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो 
     यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ॥ २० ॥
अहं समाधाय मनो यथाऽऽह 
     नः सङ्‌कर्षणस्तच्चरणारविन्दे । 
त्वद्वज्ररंहोलुलितग्राम्यपाशो 
     गतिं मुनेर्याम्यपविद्धलोकः ॥ २१ ॥
पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानां 
     याः सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम् । 
न राति यद् द्वेष उद्वेग आधिः 
     मदः कलिर्व्यसनं सम्प्रयासः ॥ २२ ॥
त्रैवर्गिकायासविघातमस्मत् 
     पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र । 
ततोऽनुमेयो भगवत्प्रसादो 
     यो दुर्लभोऽकिञ्चनगोचरोऽन्यैः ॥ २३ ॥

इन्द्र ! तेरा यह वज्र श्रीहरि के तेज और दधीचि ऋषि की तपस्या से शक्तिमान् हो रहा है। विष्णुभगवान्‌ ने मुझे मारने के लिये तुझे आज्ञा भी दी है। इसलिये अब तू उसी वज्रसे मुझे मार डाल। क्योंकि जिस पक्षमें भगवान्‌ श्रीहरि हैं, उधर ही विजय, लक्ष्मी और सारे गुण निवास करते हैं ॥ २० ॥ देवराज ! भगवान्‌ सङ्कर्षणके आज्ञानुसार मैं अपने मनको उनके चरणकमलों में लीन कर दूँगा। तेरे वज्रका वेग मुझे नहीं, मेरे विषयभोगरूप फंदे को काट डालेगा और मैं शरीर त्यागकर मुनिजनोचित गति प्राप्त करूँगा ॥ २१ ॥ जो पुरुष भगवान्‌ से अनन्य प्रेम करते हैं—उनके निजजन हैं—उन्हें वे स्वर्ग, पृथ्वी अथवा रसातल की सम्पत्तियाँ नहीं देते। क्योंकि उनसे परमानन्द की उपलब्धि तो होती ही नहीं; उल्टे द्वेष, उद्वेग, अभिमान, मानसिक पीड़ा, कलह, दु:ख और परिश्रम ही हाथ लगते हैं ॥ २२ ॥ इन्द्र ! हमारे स्वामी अपने भक्तके अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी प्रयासको व्यर्थ कर दिया करते हैं और सच पूछो तो इसीसे भगवान्‌ की कृपाका अनुमान होता है। क्योंकि उनका ऐसा कृपा-प्रसाद अकिञ्चन भक्तोंके लिये ही अनुभवगम्य है, दूसरोंके लिये तो अत्यन्त दुर्लभ ही है ॥ २३ ॥

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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

अन्येऽनु ये त्वेह नृशंसमज्ञा 
     ये ह्युद्यतास्त्राः प्रहरन्ति मह्यम् । 
तैर्भूतनाथान् सगणान् निशात 
     त्रिशूलनिर्भिन्नगलैर्यजामि ॥ १७ ॥
अथो हरे मे कुलिशेन वीर 
     हर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह । 
तत्रानृणो भूतबलिं विधाय 
     मनस्विनां पादरजः प्रपत्स्ये ॥ १८ ॥
सुरेश कस्मान्न हिनोषि वज्रं 
     पुरः स्थिते वैरिणि मय्यमोघम् । 
मा संशयिष्ठा न गदेव वज्रः 
     स्यान्निष्फलः कृपणार्थेव याच्ञा ॥ १९ ॥

ये अज्ञानी देवता तेरे-जैसे नीच और क्रूर के अनुयायी बनकर मुझपर शस्त्रों से प्रहार कर रहे हैं। मैं अपने तीखे त्रिशूल से उनकी गरदन काट डालूँगा और उनके द्वारा गणों के सहित भैरवादि भूतनाथों को बलि चढ़ाऊँगा ॥ १७ ॥ वीर इन्द्र ! यह भी सम्भव है कि तू मेरी सेना को छिन्न-भिन्न करके अपने वज्र से मेरा सिर काट ले। तब तो मैं अपने शरीर की बलि पशु-पक्षियों को समर्पित करके, कर्मबन्धन से मुक्त हो महापुरुषों की चरण-रज का आश्रय ग्रहण करूँगा—जिस लोक में महापुरुष जाते हैं, वहाँ पहुँच जाऊँगा ॥ १८ ॥ देवराज ! मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, तेरा शत्रु हूँ; अब तू मुझ पर अपना अमोघ वज्र क्यों नहीं छोड़ता ? तू यह सन्देह न कर कि जैसे तेरी गदा निष्फल हो गयी, कृपण पुरुष से की हुई याचना के समान यह वज्र भी वैसे ही निष्फल हो जायगा ॥ १९ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

श्रीवृत्र उवाच

दिष्ट्या भवान् मे समवस्थितो रिपुः 
     यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृहा च । 
दिष्ट्यानृणोऽद्याहमसत्तम त्वया 
     मच्छूलनिर्भिन्न दृषद्‌धृदाचिरात् ॥ १४ ॥ 
यो नोऽग्रजस्यात्मविदो द्विजातेः 
     गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य । 
विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्चय् 
     पशोरिवाकरुणः स्वर्गकामः ॥ १५ ॥
ह्रीश्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां 
     स्वकर्मणा पुरुषादैश्च गर्ह्यम् । 
कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्नदेहं 
     अस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्राः ॥ १६ ॥

वृत्रासुर बोला—आज मेरे लिये बड़े सौभाग्य का दिन है कि तुम्हारे-जैसा शत्रु—जिसने विश्वरूप के रूपमें ब्राह्मण, अपने गुरु एवं मेरे भाईकी हत्या की है—मेरे सामने खड़ा है। अरे दुष्ट ! अब शीघ्र-से-शीघ्र मैं तेरे पत्थरके समान कठोर हृदयको अपने शूलसे विदीर्ण करके भाईसे उऋण होऊँगा। अहा ! यह मेरे लिये कैसे आनन्दकी बात होगी ॥ १४ ॥ इन्द्र ! तूने मेरे आत्मवेत्ता और निष्पाप बड़े भाईके, जो ब्राह्मण होनेके साथ ही यज्ञमें दीक्षित और तुम्हारा गुरु था, विश्वास दिलाकर तलवारसे तीनों सिर उतार लिये—ठीक वैसे ही जैसे स्वर्गकामी निर्दय मनुष्य यज्ञमें पशुका सिर काट डालता है ॥ १५ ॥ दया, लज्जा, लक्ष्मी और कीर्ति तुझे छोड़ चुकी है। तूने ऐसे-ऐसे नीच कर्म किये हैं, जिनकी निन्दा मनुष्योंकी तो बात ही क्या—राक्षसतक करते हैं। आज मेरे त्रिशूल से तेरा शरीर टूक-टूक हो जायगा। बड़े कष्ट से तेरी मृत्यु होगी। तेरे-जैसे पापी को आग भी नहीं जलायेगी, तुझे तो गीध नोंच-नोंच कर खायेंगे ॥ १६ ॥ 

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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

स इन्द्रशत्रुः कुपितो भृशं तया 
     महेन्द्रवाहं गदयोरुविक्रमः । 
जघान कुम्भस्थल उन्नदन् मृधे 
     तत्कर्म सर्वे समपूजयन् नृप ॥ १० ॥
ऐरावतो वृत्रगदाभिमृष्टो 
     विघूर्णितोऽद्रिः कुलिशाहतो यथा । 
अपासरद्‌ भिन्नमुखः सहेन्द्रो 
     मुञ्चन्नसृक् सप्तधनुर्भृशार्तः ॥ ११ ॥
न सन्नवाहाय विषण्णचेतसे 
     प्रायुङ्‌क्त भूयः स गदां महात्मा । 
इन्द्रोऽमृतस्यन्दिकराभिमर्श 
     वीतव्यथक्षतवाहोऽवतस्थे ॥ १२ ॥
स तं नृपेन्द्राहवकाम्यया रिपुं 
     वज्रायुधं भ्रातृहणं विलोक्य । 
स्मरंश्च तत्कर्म नृशंसमंहः 
     शोकेन मोहेन हसन् जगाद ॥ १३ ॥

राजन् ! परम पराक्रमी वृत्रासुरने क्रोधसे आग-बबूला होकर उसी गदासे इन्द्रके वाहन ऐरावतके सिरपर बड़े जोरसे गरजते हुए प्रहार किया। उसके इस कार्यकी सभी लोग बड़ी प्रशंसा करने लगे ॥ १० ॥ वृत्रासुरकी गदाके आघातसे ऐरावत हाथी वज्राहत पर्वतके समान तिलमिला उठा। सिर फट जानेसे वह अत्यन्त व्याकुल हो गया और खून उगलता हुआ इन्द्रको लिये हुए ही अट्ठाईस हाथ पीछे हट गया ॥ ११ ॥ देवराज इन्द्र अपने वाहन ऐरावतके मूर्च्छित हो जानेसे स्वयं भी विषादग्रस्त हो गये। यह देखकर युद्धधर्मके मर्मज्ञ वृत्रासुरने उनके ऊपर फिरसे गदा नहीं चलायी। तबतक इन्द्रने अपने अमृतस्रावी हाथके स्पर्शसे घायल ऐरावतकी व्यथा मिटा दी और वे फिर रणभूमिमें आ डटे ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ ! जब वृत्रासुरने देखा कि मेरे भाई विश्वरूपका वध करनेवाला शत्रु इन्द्र युद्धके लिये हाथमें वज्र लेकर फिर सामने आ गया है, तब उसे उनके उस क्रूर पापकर्मका स्मरण हो आया और वह शोक और मोहसे युक्त हो हँसता हुआ उनसे कहने लगा ॥ १३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति
एवं सुरगणान् क्रुद्धो भीषयन् वपुषा रिपून् । 
व्यनदत्सुमहाप्राणो येन लोका विचेतसः ॥ ६ ॥
तेन देवगणाः सर्वे वृत्रविस्फोटनेन वै । 
निपेतुर्मूर्च्छिता भूमौ यथैवाशनिना हताः ॥ ७ ॥
ममर्द पद्‍भ्यां सुरसैन्यमातुरं 
     निमीलिताक्षं रणरङ्‌गदुर्मदः । 
गां कम्पयन् उद्यतशूल ओजसा 
     नालं वनं यूथपतिर्यथोन्मदः ॥ ८ ॥
विलोक्य तं वज्रधरोऽत्यमर्षितः 
     स्वशत्रवेऽभिद्रवते महागदाम् । 
चिक्षेप तामापततीं सुदुःसहां 
     जग्राह वामेन करेण लीलया ॥ ९ ॥

परीक्षित्‌ ! वृत्रासुर बड़ा बली था। वह अपने डील-डौलसे ही शत्रु देवताओंको भयभीत करने लगा। उसने क्रोधमें भरकर इतने जोरका सिंहनाद किया कि बहुत-से लोग तो उसे सुनकर ही अचेत हो गये ॥ ६ ॥ वृत्रासुरकी भयानक गर्जनासे सब-के-सब देवता मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो उनपर बिजली गिर गयी हो ॥ ७ ॥ अब जैसे मदोन्मत्त गजराज नरकट का वन रौंद डालता है, वैसे ही रणबाँकुरा वृत्रासुर हाथमें त्रिशूल लेकर भयसे नेत्र बंद किये पड़ी हुई देवसेनाको पैरोंसे कुचलने लगा। उसके वेगसे धरती डगमगाने लगी ॥ ८ ॥ वज्रपाणि देवराज इन्द्र उसकी यह करतूत सह न सके। जब वह उनकी ओर झपटा, तब उन्होंने और भी चिढक़र अपने शत्रुपर एक बहुत बड़ी गदा चलायी। अभी वह असह्य गदा वृत्रासुरके पास पहुँची भी न थी कि उसने खेल-ही-खेलमें बायें हाथसे उसे पकड़ लिया ॥ ९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
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रविवार, 12 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

श्रीशुक उवाच - 

ते एवं शंसतो धर्मं वचः पत्युरचेतसः । 
नैवागृह्णन् भयत्रस्ताः पलायनपरा नृप ॥ १ ॥
विशीर्यमाणां पृतनां आसुरीं असुरर्षभः । 
कालानुकूलैः त्रिदशैः काल्यमानामनाथवत् ॥ २ ॥
दृष्ट्वातप्यत सङ्‌क्रुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्षितः । 
तान्निवार्यौजसा राजन् निर्भर्त्स्येदमुवाच ह ॥ ३ ॥
किं व उच्चरितैर्मातुः धावद्‌भिः पृष्ठतो हतैः । 
न हि भीतवधः श्लाघ्यो न स्वर्ग्यः शूरमानिनाम् ॥ ४ ॥
यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि । 
अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद्‍ग्राम्यसुखे स्पृहा ॥ ५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! असुरसेना भयभीत होकर भाग रही थी। उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामीके धर्मानुकूल वचनोंपर भी ध्यान न दिया ॥ १ ॥ वृत्रासुरने देखा कि समयकी अनुकूलताके कारण देवतालोग असुरोंकी सेनाको खदेड़ रहे हैं और वह इस प्रकार छिन्न-भिन्न हो रही है, मानो बिना नायककी हो ॥ २ ॥ राजन् ! यह देखकर वृत्रासुर असहिष्णुता और क्रोधके मारे तिलमिला उठा। उसने बलपूर्वक देवसेनाको आगे बढऩेसे रोक दिया और उन्हें डाँटकर ललकारते हुए कहा— ॥ ३ ॥ ‘क्षुद्र देवताओ! रणभूमिमें पीठ दिखानेवाले कायर असुरोंपर पीछेसे प्रहार करनेमें क्या लाभ है। ये लोग तो अपने मा-बापके मल-मूत्र हैं। परन्तु अपनेको शूरवीर माननेवाले तुम्हारे-जैसे पुरुषोंके लिये भी तो डरपोकोंको मारना कोई प्रशंसाकी बात नहीं है और न इससे तुम्हें स्वर्ग ही मिल सकता है ॥ ४ ॥ यदि तुम्हारे मनमें युद्ध करनेकी शक्ति और उत्साह है तथा अब जीवित रहकर विषय-सुख भोगनेकी लालसा नहीं है, तो क्षणभर मेरे सामने डट जाओ और युद्धका मजा चख लो’ ॥ ५ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

जातस्य मृत्युर्ध्रुव एव सर्वतः 
     प्रतिक्रिया यस्य न चेह कॢप्ता । 
लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं 
     को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥ ३२ ॥
द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौ 
     यद्‍ब्रह्मसन्धारणया जितासुः । 
कलेवरं योगरतो विजह्याद् 
     यदग्रणीर्वीरशयेऽनिवृत्तः ॥ ३३ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि जो पैदा हुआ है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना पड़ेगा। इस जगत्में विधाता ने मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं बताया है । ऐसी स्थिति में यदि मृत्युके द्वारा स्वर्गादि लोक और सुयश भी मिल रहा हो तो ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उस उत्तम मृत्यु को न अपनायेगा ॥ ३२ ॥ संसार में दो प्रकार की मृत्यु परम दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गयी है—एक तो योगी पुरुष का अपने प्राणों को वश में करके ब्रह्मचिन्तन के द्वारा शरीर का परित्याग और दूसरा युद्धभूमिमें सेनाके आगे रहकर बिना पीठ दिखाये जूझ मरना (तुमलोग भला, ऐसा शुभ अवसर क्यों खो रहे हो)’ ॥ ३३ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम दशमोऽध्या‍यः ॥ १० ॥ 

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शनिवार, 11 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

तानक्षतान् स्वस्तिमतो निशाम्य 
     शस्त्रास्त्रपूगैरथ वृत्रनाथाः । 
द्रुमैर्दृषद्‍भिर्विविधाद्रिश्रृङ्‌गैः 
     अविक्षतान् तत्रसुरिन्द्रसैनिकान् ॥ २७ ॥
सर्वे प्रयासा अभवन्विमोघाः 
     कृताः कृता देवगणेषु दैत्यैः । 
कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सु 
     क्षुद्रैः प्रयुक्ता ऊषती रूक्षवाचः ॥ २८ ॥
ते स्वप्रयासं वितथं निरीक्ष्य 
     हरावभक्ता हतयुद्धदर्पाः । 
पलायनायाजिमुखे विसृज्य 
     पतिं मनस्ते दधुरात्तसाराः ॥ २९ ॥
वृत्रोऽसुरान् तान् अनुगान् मनस्वी 
     प्रधावतः प्रेक्ष्य बभाष एतत् । 
पलायितं प्रेक्ष्य बलं च भग्नं 
     भयेन तीव्रेण विहस्य वीरः ॥ ३० ॥
कालोपपन्नां रुचिरां मनस्विनां 
     मुवाच वाचं पुरुषप्रवीरः । 
हे विप्रचित्ते नमुचे पुलोमन् 
     मयानर्वन्छम्बर मे श्रृणुध्वम् ॥ ३१ ॥

परीक्षित्‌ ! जब वृत्रासुर के अनुयायी असुरों ने देखा कि उनके असंख्य अस्त्र-शस्त्र भी देव- सेना का कुछ न बिगाड़ सके—यहाँ तक कि वृक्षों, चट्टानों और पहाड़ों के बड़े-बड़े शिखरों से भी उनके शरीर पर खरोंच तक नहीं आयी, सब-के-सब सकुशल हैं—तब तो वे बहुत डर गये। दैत्यलोग देवताओं को पराजित करनेके लिये जो-जो प्रयत्न करते, वे सब-के-सब निष्फल हो जाते—ठीक वैसे ही, जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित भक्तोंपर क्षुद्र मनुष्यों के कठोर और अमङ्गलमय दुर्वचनोंका कोई प्रभाव नहीं पड़ता ॥ २७-२८ ॥ भगवद्विमुख असुर अपना प्रयत्न व्यर्थ देखकर उत्साहरहित हो गये। उनका वीरताका घमंड जाता रहा। अब वे अपने सरदार वृत्रासुरको युद्धभूमिमें ही छोडक़र भाग खड़े हुए; क्योंकि देवताओं ने उनका सारा बल-पौरुष छीन लिया था ॥ २९ ॥ जब धीर-वीर वृत्रासुर ने देखा कि मेरे अनुयायी असुर भाग रहे हैं और अत्यन्त भयभीत होकर मेरी सेना भी तहस-नहस और तितर-बितर हो रही है, तब वह हँसकर कहने लगा ॥ ३० ॥ वीरशिरोमणि वृत्रासुरने समयानुसार वीरोचित वाणीसे विप्रचित्ति, नमुचि, पुलोमा, मय, अनर्वा, शम्बर आदि दैत्योंको सम्बोधित करके कहा—‘असुरो ! भागो मत, मेरी एक बात सुन लो ॥ ३१ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

अभ्यर्दयन् असम्भ्रान्ताः सिंहनादेन दुर्मदाः । 
गदाभिः परिघैर्बाणैः प्रासमुद्‍गरतोमरैः ॥ २२ ॥
शूलैः परश्वधैः खड्गैः शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभिः । 
सर्वतोऽवाकिरन्शस्त्रैः अस्त्रैश्च विबुधर्षभान् ॥ २३ ॥
न तेऽदृश्यन्त सञ्छन्नाः शरजालैः समन्ततः । 
पुङ्‌खानुपुङ्‌खपतितैः ज्योतींषीव नभोघनैः ॥ २४ ॥
न ते शस्त्रास्त्रवर्षौघा ह्यासेदुः सुरसैनिकान् । 
छिन्नाः सिद्धपथे देवैः लघुहस्तैः सहस्रधा ॥ २५ ॥
अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौघा गिरिश्रृङ्‌गद्रुमोपलैः । 
अभ्यवर्षन् सुरबलं चिच्छिदुस्तांश्च पूर्ववत् ॥ २६ ॥

वे घमंडी असुर सिंहनाद करते हुए बड़ी सावधानी से देवसेना पर प्रहार करने लगे। उन लोगों ने गदा, परिघ, बाण,प्रास, मुद्गर, तोमर, शूल, फरसे, तलवार,शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि आदि अस्त्र-शस्त्रों की बौछार से देवताओं को सब ओर से ढक दिया ॥ २२-२३ ॥ एक-पर-एक इतने बाण चारों ओर से आ रहे थे कि उनसे ढक जाने के कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे—जैसे बादलों से ढक जाने पर आकाश के तारे नहीं दिखायी देते ॥ २४ ॥ परीक्षित्‌ ! वह शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा देवसैनिकों को छू तक न सकी । उन्होंने अपने हस्तलाघव से आकाश में ही उनके हजार-हजार टुकड़े कर दिये ॥ २५ ॥ जब असुरों के अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वे देवताओं की सेना पर पर्वतों के शिखर, वृक्ष और पत्थर बरसाने लगे । परन्तु देवताओं ने उन्हें पहले-की ही भाँति काट गिराया ॥२६॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२) इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण इन्द्र उवाच स्त्रीभूद्...