बुधवार, 15 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

अहं हरे तव पादैकमूल 
     दासानुदासो भवितास्मि भूयः । 
मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते 
     गृणीत वाक्कर्म करोतु कायः ॥ २४ ॥
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं 
     न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । 
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा 
     समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्‌क्षे ॥ २५ ॥
अजातपक्षा इव मातरं खगाः 
     स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः । 
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा 
     मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥ २६ ॥
ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं 
     संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः । 
त्वन्माययात्मात्मजदारगेहे
     ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात् ॥ २७ ॥

(भगवान्‌ को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए वृत्रासुरने प्रार्थना की—) ‘प्रभो ! आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्यभावसे आपके चरणकमलोंके आश्रित सेवकोंकी सेवा करनेका अवसर मुझे अगले जन्ममें भी प्राप्त हो। प्राणवल्लभ ! मेरा मन आपके मङ्गलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हींका गान करे और शरीर आपकी सेवामें ही संलग्न रहे ॥ २४ ॥ सर्वसौभाग्यनिधे ! मैं आप को छोडक़र स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकछत्र राज्य, योगकी सिद्धियाँ—यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं चाहता ॥ २५ ॥ जैसे पक्षियों के पंखहीन बच्चे अपनी माकी बाट जोहते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी मा का दूध पीने के लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम से मिलने के लिये उत्कण्ठित रहती है—वैसे ही कमलनयन ! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है ॥ २६ ॥ प्रभो ! मैं मुक्ति नहीं चाहता। मेरे कर्मों के फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकना पड़े, इसकी परवा नहीं। परन्तु मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, जिस-जिस योनि में जन्मूँ, वहाँ-वहाँ भगवान्‌ के प्यारे भक्तजनों से मेरी प्रेम-मैत्री बनी रहे। स्वामिन् ! मैं केवल यही चाहता हूँ कि जो लोग आपकी माया से देह-गेह और स्त्री-पुत्र आदि में आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा कभी किसी प्रकार का भी सम्बन्ध न हो’ ॥ २७ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां 
षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम एकादशोऽध्या‍यः ॥ ११ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७) वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति अहं हरे तव प...