गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

वृत्रासुरका वध

श्रीऋषिरुवाच - 

एवं जिहासुर्नृप देहमाजौ 
     मृत्युं वरं विजयान्मन्यमानः । 
शूलं प्रगृह्याभ्यपतत् सुरेन्द्रं 
     यथा महापुरुषं कैटभोऽप्सु ॥ १ ॥
ततो युगान्ताग्निकठोरजिह्वं 
     आविध्य शूलं तरसासुरेन्द्रः । 
क्षिप्त्वा महेन्द्राय विनद्य वीरो 
     हतोऽसि पापेति रुषा जगाद ॥ २ ॥
ख आपतत् तद् विचलद् ग्रहोल्कवद् 
     निरीक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमजातविक्लवः । 
वज्रेण वज्री शतपर्वणाच्छिनद् 
     भुजं च तस्योरगराजभोगम् ॥ ३ ॥
छिन्नैकबाहुः परिघेण वृत्रः 
     संरब्ध आसाद्य गृहीतवज्रम् । 
हनौ तताडेन्द्रमथामरेभं 
     वज्रं च हस्तान् न्यपतन् मघोनः ॥ ४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! वृत्रासुर रणभूमिमें अपना शरीर छोडऩा चाहता था, क्योंकि उसके विचारसे इन्द्रपर विजय प्राप्त करके स्वर्ग पानेकी अपेक्षा मरकर भगवान्‌को प्राप्त करना श्रेष्ठ था। इसलिये जैसे प्रलयकालीन जलमें कैटभासुर भगवान्‌ विष्णुपर चोट करनेके लिये दौड़ा था, वैसे ही वह भी त्रिशूल उठाकर इन्द्रपर टूट पड़ा ॥ १ ॥ वीर वृत्रासुरने प्रलयकालीन अग्रिकी लपटोंके समान तीखी नोकोंवाले त्रिशूलको घुमाकर बड़े वेगसे इन्द्रपर चलाया और अत्यन्त क्रोधसे सिंहनाद करके बोला—‘पापी इन्द्र ! अब तू बच नहीं सकता’ ॥ २ ॥ इन्द्रने यह देखकर कि वह भयङ्कर त्रिशूल ग्रह और उल्काके समान चक्कर काटता हुआ आकाशमें आ रहा है, किसी प्रकारकी अधीरता नहीं प्रकट की और उस त्रिशूलके साथ ही वासुकि नागके समान वृत्रासुरकी विशाल भुजा अपने सौ गाँठोंवाले वज्रसे काट डाली ॥ ३ ॥ एक बाँह कट जानेपर वृत्रासुरको बहुत क्रोध हुआ। उसने वज्रधारी इन्द्रके पास जाकर उनकी ठोड़ीमें और गजराज ऐरावतपर परिघ से ऐसा प्रहार किया कि उनके हाथसे वह वज्र गिर पड़ा ॥ ४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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