शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध उन्नीसवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन

सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः 
सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् |
भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं 
य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ||८||
भारतेऽपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्य आकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञान
वैराग्यैश्वर्योपशमोपरमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्चरति ||९||

देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य—कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसल-वासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे’ ॥ ८ ॥ भारतवर्ष में भी भगवान्‌ दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषोंपर अनुग्रह करनेके लिये अव्यक्तरूप से कल्प के अन्त तक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरति की उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्त में आत्मस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है ॥९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹🩷🥀जय नर रूप हरि प्रभु श्रीराम 🙏
    श्रीराम जय राम जय जय राम

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