॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
पंचम स्कन्ध – छब्बीसवाँ अध्याय..(पोस्ट१४)
नरकोंकी विभिन्न गतियोंका वर्णन
यस्त्विह वा आढ्याभिमतिरहङ्कृतिस्तिर्यक्- प्रेक्षणः सर्वतोऽभिविशङ्की अर्थव्ययनाशचिन्तया
परिशुष्यमाणहृदयवदनो निर्वृतिमनवगतो ग्रह इवार्थमभिरक्षति स चापि प्रेत्य तदुत्पादनोत्कर्षण- संरक्षणशमलग्रहः सूचीमुखे नरके निपतति यत्र ह वित्तग्रहं पापपुरुषं धर्मराजपुरुषा वायका इव सर्वतोऽङ्गेषु सूत्रैः परिवयन्ति ॥ ३६ ॥
एवंविधा नरका यमालये सन्ति शतशःसहस्रशस्तेषु सर्वेषु च सर्व एवाधर्मवर्तिनो ये
केचिदिहोदिता अनुदिताश्चावनिपते पर्यायेण विशन्ति तथैव धर्मानुवर्तिन इतरत्र इह तु पुनर्भवे
त उभयशेषाभ्यां निविशन्ति ॥ ३७ ॥
इस लोकमें जो व्यक्ति अपनेको बड़ा धनवान् समझकर अभिमानवश सबको टेढ़ी नजरसे देखता है और सभीपर सन्देह रखता है, धनके व्यय और नाशकी चिन्तासे जिसके हृदय और मुँह सूखे रहते हैं, अत: तनिक भी चैन न मानकर जो यक्षके समान धनकी रक्षामें ही लगा रहता है तथा पैसा पैदा करने, बढ़ाने और बचानेमें जो तरह-तरहके पाप करता रहता है, वह नराधम मरनेपर सूचीमुख नरकमें गिरता है। वहाँ उस अर्थपिशाच पापात्मा के सारे अङ्गों को यमराज के दूत दर्जियों के समान सूई-धागेसे सीते हैं ॥ ३६ ॥
राजन् ! यमलोकमें इसी प्रकारके सैंकड़ों-हजारों नरक हैं। उनमें जिनका यहाँ उल्लेख हुआ है और जिनके विषयमें कुछ नहीं कहा गया, उन सभीमें सब अधर्मपरायण जीव अपने कर्मोंके अनुसार बारी-बारीसे जाते हैं। इसी प्रकार धर्मात्मा पुरुष स्वर्गादिमें जाते हैं। इस प्रकार नरक और स्वर्गके भोगसे जब इनके अधिकांश पाप और पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब बाकी बचे हुए पुण्यपापरूप कर्मोंको लेकर ये फिर इसी लोकमें जन्म लेनेके लिये लौट आते हैं ॥ ३७ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
💖श्रीराधेकृष्णाभ्याम् नमः🙏
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नारायण नारायण नारायण नारायण