॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०३)
यम और यमदूतोंका संवाद
श्रीशुक उवाच
इति देवः स आपृष्टः प्रजासंयमनो यमः
प्रीतः स्वदूतान्प्रत्याह स्मरन्पादाम्बुजं हरेः ||११||
यम उवाच
परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च
ओतं प्रोतं पटवद्यत्र विश्वम्
यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा
नस्योतवद्यस्य वशे च लोकः ||१२||
यो नामभिर्वाचि जनं निजायां
बध्नाति तन्त्र्यामिव दामभिर्गाः
यस्मै बलिं त इमे नामकर्म-
निबन्धबद्धाश्चकिता वहन्ति ||१३||
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब दूतोंने इस प्रकार प्रश्न किया, तब देवशिरोमणि प्रजाके शासक भगवान् यमराजने प्रसन्न होकर श्रीहरिके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए उनसे कहा ॥ ११ ॥
यमराजने कहा—दूतो ! मेरे अतिरिक्त एक और ही चराचर जगत् के स्वामी हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् सूतमें वस्त्रके समान ओतप्रोत है। उन्हींके अंश ब्रह्मा, विष्णु और शङ्कर इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करते हैं। उन्हींने इस सारे जगत् को नथे हुए बैल के समान अपने अधीन कर रखा है ॥ १२ ॥ मेरे प्यारे दूतो ! जैसे किसान अपने बैलोंको पहले छोटी-छोटी रस्सियोंमें बाँधकर फिर उन रस्सियोंको एक बड़ी आड़ी रस्सीमें बाँध देते हैं, वैसे ही जगदीश्वर भगवान्ने भी ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्य आदि आश्रमरूप छोटी-छोटी नामकी रस्सियोंमें बाँधकर फिर सब नामोंको वेदवाणी रूप बड़ी रस्सीमें बाँध रखा है। इस प्रकार सारे जीव नाम एवं कर्मरूप बन्धनमें बँधे हुए भयभीत होकर उन्हें ही अपना सर्वस्व भेंट कर रहे हैं ॥ १३ ॥
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 💐💐💐💐💐🙏🙏🙏
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नारायण नारायण नारायण नारायण