रविवार, 1 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०४)

यम और यमदूतोंका संवाद

अहं महेन्द्रो निर्ऋतिः प्रचेताः 
सोमोऽग्निरीशः पवनो विरिञ्चिः
आदित्यविश्वे वसवोऽथ साध्या 
मरुद्गणा रुद्रगणाः ससिद्धाः ||१४||
अन्ये च ये विश्वसृजोऽमरेशा 
भृग्वादयोऽस्पृष्टरजस्तमस्काः
यस्येहितं न विदुः स्पृष्टमायाः 
सत्त्वप्रधाना अपि किं ततोऽन्ये ||१५||
यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा 
हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते
आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां 
चक्षुर्यथैवाकृतयस्ततः परम् ||१६||
तस्यात्मतन्त्रस्य हरेरधीशितुः 
परस्य मायाधिपतेर्महात्मनः
प्रायेण दूता इह वै मनोहरा-
श्चरन्ति तद्रूपगुणस्वभावाः ||१७||
भूतानि विष्णोः सुरपूजितानि 
दुर्दर्शलिङ्गानि महाद्भुतानि
रक्षन्ति तद्भक्तिमतः परेभ्यो 
मत्तश्च मर्त्यानथ सर्वतश्च ||१८||

(यमराज कह रहे हैं) दूतो ! मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शङ्कर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रुद्र, रजोगुण एवं तमोगुणसे रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता—सब-के-सब सत्त्वप्रधान होनेपर भी उनकी माया के अधीन हैं तथा भगवान्‌ कब क्या किस रूपमें करना चाहते हैं—इस बातको नहीं जानते। तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है ॥ १४-१५ ॥ दूतो ! जिस प्रकार घट, पट आदि रूपवान् पदार्थ अपने प्रकाशक नेत्रको नहीं देख सकते—वैसे ही अन्त:करणमें अपने साक्षीरूपसे स्थित परमात्माको कोई भी प्राणी इन्द्रिय, मन, प्राण, हृदय या वाणी आदि किसी भी साधनके द्वारा नहीं जान सकता ॥ १६ ॥ वे प्रभु सबके स्वामी और स्वयं परम स्वतन्त्र हैं। उन्हीं मायापति पुरुषोत्तम के दूत उन्हींके समान परम मनोहर रूप, गुण और स्वभावसे सम्पन्न होकर इस लोक में प्राय: विचरण किया करते हैं ॥ १७ ॥ विष्णुभगवान्‌के सुरपूजित एवं परम अलौकिक पार्षदोंका दर्शन बड़ा दुर्लभ है। वे भगवान्‌के भक्तजनोंको उनके शत्रुओंसे, मुझसे और अग्रि आदि सब विपत्तियोंसे सर्वथा सुरक्षित रखते हैं ॥ १८ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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