॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०५)
यम और यमदूतोंका संवाद
धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं
न वै विदुरृषयो नापि देवाः
न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः
कुतो नु विद्याधरचारणादयः ||१९||
स्वयम्भूर्नारदः शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः
प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ||२०||
द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः
गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ||२१||
एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसां धर्मः परः स्मृतः
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ||२२||
नामोच्चारणमाहात्म्यं हरेः पश्यत पुत्रकाः
अजामिलोऽपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत ||२३||
(यमराज कह रहे हैं) स्वयं भगवान्ने ही धर्मकी मर्यादाका निर्माण किया है। उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही। ऐसी स्थितिमें मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं ॥ १९ ॥ भगवान्के द्वारा निर्मित भागवतधर्म परम शुद्ध और अत्यन्त गोपनीय है। उसे जानना बहुत ही कठिन है। जो उसे जान लेता है, वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। दूतो ! भागवतधर्मका रहस्य हम बारह व्यक्ति ही जानते हैं—ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, भगवान् शङ्कर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वायम्भुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्मपितामह, बलि, शुकदेवजी और मैं (धर्मराज) ॥ २०-२१ ॥ इस जगत्में जीवोंके लिये बस, यही सबसे बड़ा कर्तव्य—परम धर्म—है कि वे नाम-कीर्तन आदि उपायोंसे भगवान्के चरणोंमें भक्तिभाव प्राप्त कर लें ॥ २२ ॥ प्रिय दूतो ! भगवान्के नामोच्चारणकी महिमा तो देखो, अजामिल-जैसा पापी भी एक बार नामोच्चारण करने- मात्र से मृत्युपाश से छुटकारा पा गया ॥ २३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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