॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध – पाँचवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)
श्रीनारदजी के उपदेश से दक्षपुत्रों की विरक्ति तथा नारदजी को दक्षका शाप
श्रीशुक उवाच
तन्निशम्याथ हर्यश्वा औत्पत्तिकमनीषया
वाचः कूटं तु देवर्षेः स्वयं विममृशुर्धिया ||१०||
भूः क्षेत्रं जीवसंज्ञं यदनादि निजबन्धनम्
अदृष्ट्वा तस्य निर्वाणं किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||११||
एक एवेश्वरस्तुर्यो भगवान्स्वाश्रयः परः
तमदृष्ट्वाभवं पुंसः किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१२||
पुमान्नैवैति यद्गत्वा बिलस्वर्गं गतो यथा
प्रत्यग्धामाविद इह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१३||
नानारूपात्मनो बुद्धिः स्वैरिणीव गुणान्विता
तन्निष्ठामगतस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ||१४||
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! हर्यश्व जन्मसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे देवर्षि नारदकी यह पहेली, ये गूढ़ वचन सुनकर अपनी बुद्धिसे स्वयं ही विचार करने लगे— ॥ १० ॥ ‘(देवर्षि नारदका कहना तो सच है) यह लिङ्गशरीर ही, जिसे साधारणत: जीव कहते हैं, पृथ्वी है और यही आत्माका अनादि बन्धन है। इसका अन्त (विनाश) देखे बिना मोक्षके अनुपयोगी कर्मोंमें लगे रहनेसे क्या लाभ है? ॥ ११ ॥ सचमुच ईश्वर एक ही है। वह जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और उनके अभिमानियों से भिन्न, उनका साक्षी तुरीय है। वही सबका आश्रय है, परंतु उसका आश्रय कोई नहीं है। वही भगवान् हैं। उस प्रकृति आदिसे अतीत, नित्यमुक्त परमात्माको देखे बिना भगवान्के प्रति असमर्पित कर्मोंसे जीवको क्या लाभ है? ॥ १२ ॥ जैसे मनुष्य बिलरूप पातालमें प्रवेश करके वहाँसे नहीं लौट पाता—वैसे ही जीव जिसको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं लौटता, जो स्वयं अन्तज्र्योति:स्वरूप है, उस परमात्माको जाने बिना विनाशवान् स्वर्ग आदि फल देनेवाले कर्मोंको करनेसे क्या लाभ है? ॥ १३ ॥ यह अपनी बुद्धि ही बहुरूपिणी और सत्त्व, रज आदि गुणोंको धारण करनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीके समान है। इस जीवनमें इसका अन्त जाने बिना— विवेक प्राप्त किये बिना अशान्तिको अधिकाधिक बढ़ानेवाले कर्म करनेका प्रयोजन ही क्या है ? ॥ १४ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🪷🌿🥀🪷ॐश्रीपरमात्मने
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