॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – आठवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
नारायणकवच का उपदेश
श्रीविश्वरूप उवाच
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ||४||
नारायणपरं वर्म सन्नह्येद्भय आगते
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ||५||
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादॐकारादीनि विन्यसेत्
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ||६||
करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया
प्रणवादियकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ||७||
न्यसेद्धृदय ॐकारं विकारमनु मूर्धनि
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया न्यसेत् ||८||
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ||९||
सविसर्गं फडन्तं तत्सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्
ॐ विष्णवे नम इति ||१०||
विश्वरूप ने कहा—देवराज इन्द्र ! भयका अवसर उपस्थित होने पर नारायणकवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी विधि यह है कि पहले हाथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथमें कुशकी पवित्री धारण करके उत्तर मुँह बैठ जाय। इसके बाद कवचधारणपर्यन्त और कुछ न बोलनेका निश्चय करके पवित्रतासे ‘ॐ नमो नारायणाय’ और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इन मन्त्रोंके द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास तथा अङ्गुष्ठादि-करन्यास करे। पहले ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर मन्त्रके ॐ आदि आठ अक्षरोंका क्रमश: पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्ष:स्थल, मुख और सिरमें न्यास करे। अथवा पूर्वोक्त मन्त्रके मकारसे लेकर ॐकारपर्यन्त आठ अक्षरोंका सिरसे आरम्भ करके उन्हीं आठ अङ्गों में विपरीत क्रमसे न्यास करे ॥ ४—६ ॥ तदनन्तर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस द्वादशाक्षर मन्त्रके ॐ आदि बारह अक्षरोंका दायीं तर्जनीसे बायीं तर्जनीतक दोनों हाथकी आठ अँगुलियों और दोनों अँगूठोंकी दो-दो गाँठोंमें न्यास करे ॥ ७ ॥ फिर ‘ॐ विष्णवे नम:’ इस मन्त्रके पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदयमें ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र में, ‘ष्’ का भौंहोंके बीचमें, ‘ण’ का चोटीमें, ‘वे’ का दोनों नेत्रोंमें और ‘न’ का शरीरकी सब गाँठोंमें न्यास करे। तदनन्तर ‘ॐ म: अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे। इस प्रकार न्यास करनेसे इस विधिको जाननेवाला पुरुष मन्त्रस्वरूप हो जाता है ॥ ८—१० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀ॐश्री परमात्मने नमः
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