॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान् की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना
ब्रह्महत्यामञ्जलिना जग्राह यदपीश्वरः ।
संवत्सरान्ते तदघं भूतानां स विशुद्धये ॥ ६ ॥
भूम्यम्बुद्रुमयोषिद्भ्यश्चतुर्धा व्यभजद्धरिः ।
भूमिस्तुरीयं जग्राह खातपूरवरेण वै ॥ ७ ॥
ईरिणं ब्रह्महत्याया रूपं भूमौ प्रदृश्यते ।
तुर्यं छेदविरोहेण वरेण जगृहुर्द्रुमाः ॥ ८ ॥
तेषां निर्यासरूपेण ब्रह्महत्या प्रदृश्यते ।
शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रियः ।। ९॥
रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते ।
द्रव्यभूयोवरेणापस्तुरीयं जगृहुर्मलम् ॥ १० ॥
इन्द्र चाहते तो विश्वरूपके वधसे लगी हुई हत्याको दूर कर सकते थे; परन्तु उन्होंने ऐसा करना उचित न समझा, वरं हाथ जोडक़र उसे स्वीकार कर लिया तथा एक वर्षतक उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं किया। तदनन्तर सब लोगोंके सामने अपनी शुद्धि प्रकट करनेके लिये उन्होंने अपनी ब्रह्महत्याको चार हिस्सोंमें बाँटकर पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों को दे दिया ॥ ६ ॥ परीक्षित् ! पृथ्वी ने बदले में यह वरदान लेकर कि जहाँ कहीं गड्ढा होगा, वह समय पर अपने-आप भर जायगा, इन्द्रकी ब्रह्महत्याका चतुर्थांश स्वीकार कर लिया। वही ब्रह्महत्या पृथ्वीमें कहीं-कहीं ऊसरके रूपमें दिखायी पड़ती है ॥ ७ ॥ दूसरा चतुर्थांश वृक्षोंने लिया। उन्हें यह वर मिला कि उनका कोई हिस्सा कट जानेपर फिर जम जायगा। उनमें अब भी गोंदके रूपमें ब्रह्महत्या दिखायी पड़ती है ॥ ८ ॥ स्त्रियों ने यह वर पाकर कि वे सर्वदा पुरुष का सहवास कर सकें, ब्रह्महत्या का तीसरा चतुर्थांश स्वीकार किया। उनकी ब्रह्महत्या प्रत्येक महीने में रज के रूप से दिखायी पड़ती है ॥ ९ ॥ जलने यह वर पाकर कि खर्च करते रहनेपर भी निर्झर आदिके रूपमें तुम्हारी बढ़ती ही होती रहेगी, ब्रह्महत्या का चौथा चतुर्थांश स्वीकार किया। फेन, बुद्बुद आदि के रूप में वही ब्रह्महत्या दिखायी पड़ती है। अतएव मनुष्य उसे हटाकर जल ग्रहण किया करते हैं ॥ १० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
श्रीराधेकृष्णाभ्याम् नमः
जवाब देंहटाएंराधे राधे जय श्री कृष्ण