मंगलवार, 31 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध नवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्‌ की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना

तासु बुद्बुदफेनाभ्यां दृष्टं तद्धरति क्षिपन् ।
हतपुत्रस्ततस्त्वष्टा जुहावेन्द्राय शत्रवे ॥ ११ ॥
इन्द्रशत्रो विवर्धस्व मा चिरं जहि विद्विषम् ।
अथान्वाहार्यपचनादुत्थितो घोरदर्शनः ॥ १२ ॥
कृतान्त इव लोकानां युगान्तसमये यथा ।
विष्वग्विवर्धमानं तमिषुमात्रं दिने दिने ॥ १३ ॥
दग्धशैलप्रतीकाशं सन्ध्याभ्रानीकवर्चसम् ।
तप्तताम्रशिखाश्मश्रुं मध्याह्नार्कोग्रलोचनम् ॥ १४ ॥
देदीप्यमाने त्रिशिखे शूल आरोप्य रोदसी ।
नृत्यन्तमुन्नदन्तं च चालयन्तं पदा महीम् ॥ १५ ॥
दरीगम्भीरवक्त्रेण पिबता च नभस्तलम् ।
लिहता जिह्वयर्क्षाणि ग्रसता भुवनत्रयम् ॥ १६ ॥
महता रौद्रदंष्ट्रेण जृम्भमाणं मुहुर्मुहुः ।
वित्रस्ता दुद्रुवुर्लोका वीक्ष्य सर्वे दिशो दश ॥ १७ ॥

विश्वरूपकी मृत्युके बाद उनके पिता त्वष्टा ‘हे इन्द्रशत्रो ! तुम्हारी अभिवृद्धि हो और शीघ्र-से- शीघ्र तुम अपने शत्रुको मार डालो’—इस मन्त्र से इन्द्रका शत्रु उत्पन्न करने के लिये हवन करने लगे ॥ ११ ॥ यज्ञ समाप्त होनेपर अन्वाहार्य-पचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि) से एक बड़ा भयावना दैत्य प्रकट हुआ। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो लोकों का नाश करनेके लिये प्रलयकालीन विकराल काल ही प्रकट हुआ हो ॥ १२ ॥ परीक्षित्‌ ! वह प्रतिदिन अपने शरीरके सब ओर बाणके बराबर बढ़ जाया करता था। वह जले हुए पहाड क़े समान काला और बड़े डील-डौल का था। उसके शरीरमेंसे सन्ध्याकालीन बादलोंके समान दीप्ति निकलती रहती थी ॥ १३ ॥ उसके सिरके बाल और दाढ़ी-मूँछ तपे हुए ताँबेके समान लाल रंगके तथा नेत्र दोपहरके सूर्यके समान प्रचण्ड थे ॥ १४ ॥ चमकते हुए तीन नोकोंवाले त्रिशूलको लेकर जब वह नाचने, चिल्लाने और कूदने लगता था, उस समय पृथ्वी काँप उठती थी और ऐसा जान पड़ता था कि उस त्रिशूलपर उसने अन्तरिक्षको उठा रखा है ॥ १५ ॥ वह बार-बार जँभाई लेता था। इससे जब उसका कन्दराके समान गम्भीर मुँह खुल जाता, तब जान पड़ता कि वह सारे आकाशको पी जायगा, जीभसे सारे नक्षत्रोंको चाट जायगा और अपनी विशाल एवं विकराल दाढ़ोंवाले मुँहसे तीनों लोकोंको निगल जायगा। उसके भयावने रूपको देखकर सब लोग डर गये और इधर-उधर भागने लगे ॥ १६-१७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌺💐🌺जय श्रीकृष्ण 🙏
    राधा रमणम् हरे हरे
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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