गुरुवार, 19 मार्च 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – छठा अध्याय..(पोस्ट०६)

दक्षप्रजापति की साठ कन्याओं के वंश का विवरण

अरिष्टायास्तु गन्धर्वाः काष्ठाया द्विशफेतराः
सुता दनोरेकषष्टिस्तेषां प्राधानिकाञ्शृणु ||२९||
द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसुः
अयोमुखः शङ्कुशिराः स्वर्भानुः कपिलोऽरुणः ||३०||
पुलोमा वृषपर्वा च एकचक्रोऽनुतापनः
धूम्रकेशो विरूपाक्षो विप्रचित्तिश्च दुर्जयः ||३१||
स्वर्भानोः सुप्रभां कन्यामुवाह नमुचिः किल
वृषपर्वणस्तु शर्मिष्ठां ययातिर्नाहुषो बली ||३२||
वैश्वानरसुतायाश्च चतस्रश्चारुदर्शनाः
उपदानवी हयशिरा पुलोमा कालका तथा ||३३||
उपदानवीं हिरण्याक्षः क्रतुर्हयशिरां नृप
पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु कः ||३४||
उपयेमेऽथ भगवान्कश्यपो ब्रह्मचोदितः
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिनः ||३५||
तयोः षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितुः पिता
जघान स्वर्गतो राजन्नेक इन्द्र प्रियङ्करः ||३६||
विप्रचित्तिः सिंहिकायां शतं चैकमजीजनत्
राहुज्येष्ठं केतुशतं ग्रहत्वं य उपागताः ||३७||

अरिष्टासे गन्धर्व और काष्ठासे घोड़े आदि एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। दनुके इकसठ पुत्र हुए। उनमें प्रधान-प्रधानके नाम सुनो ॥ २९ ॥ द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शङ्कुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति और दुर्जय ॥ ३०-३१ ॥ स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभासे नमुचिने और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठासे महाबली नहुषनन्दन ययातिने विवाह किया ॥ ३२ ॥ दनुके पुत्र वैश्वानरकी चार सुन्दरी कन्याएँ थीं। इनके नाम थे—उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा और कालका ॥ ३३ ॥ इनमेंसे उपदानवीके साथ हिरण्याक्षका और हयशिराके साथ क्रतुका विवाह हुआ। ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रजापति भगवान्‌ कश्यपने ही वैश्वानरकी शेष दो पुत्रियों—पुलोमा और कालका के साथ विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नामके साठ हजार रणवीर दानव हुए। इन्हीं का दूसरा नाम निवातकवच था। ये यज्ञकर्ममें विघ्र डालते थे, इसलिये परीक्षित्‌ ! तुम्हारे दादा अर्जुनने अकेले ही उन्हें इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये मार डाला। यह उन दिनों की बात है, जब अर्जुन स्वर्ग में गये हुए थे ॥ ३४—३६ ॥ विप्रचित्ति की पत्नी सिंहिका के गर्भ से एक सौ एक पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे बड़ा था राहु, जिसकी गणना ग्रहों में हो गयी। शेष सौ पुत्रों का नाम केतु था ॥ ३७ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💐🌹🥀💐जय श्रीहरि: !!
    जय हो श्री राधा रमण बिहारी जी
    नारायण नारायण नारायण नारायण

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२) चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन जितमजि...