रविवार, 12 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण

जातस्य मृत्युर्ध्रुव एव सर्वतः 
     प्रतिक्रिया यस्य न चेह कॢप्ता । 
लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं 
     को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥ ३२ ॥
द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौ 
     यद्‍ब्रह्मसन्धारणया जितासुः । 
कलेवरं योगरतो विजह्याद् 
     यदग्रणीर्वीरशयेऽनिवृत्तः ॥ ३३ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि जो पैदा हुआ है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना पड़ेगा। इस जगत्में विधाता ने मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं बताया है । ऐसी स्थिति में यदि मृत्युके द्वारा स्वर्गादि लोक और सुयश भी मिल रहा हो तो ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उस उत्तम मृत्यु को न अपनायेगा ॥ ३२ ॥ संसार में दो प्रकार की मृत्यु परम दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गयी है—एक तो योगी पुरुष का अपने प्राणों को वश में करके ब्रह्मचिन्तन के द्वारा शरीर का परित्याग और दूसरा युद्धभूमिमें सेनाके आगे रहकर बिना पीठ दिखाये जूझ मरना (तुमलोग भला, ऐसा शुभ अवसर क्यों खो रहे हो)’ ॥ ३३ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम दशमोऽध्या‍यः ॥ १० ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌺💟🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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