॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)
विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान् की प्रेरणासे देवताओं का दधीचि ऋषिके पास जाना
श्रीदेवा ऊचुः
नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।
नमस्ते ह्यस्तचक्राय नमः सुपुरुहूतये ॥ ३१ ॥
यत्ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।
नार्वाचीनो विसर्गस्य धातर्वेदितुमर्हति ॥ ३२ ॥
देवताओं ने कहा—भगवन् ! यज्ञमें स्वर्गादि देने की शक्ति तथा उनके फल की सीमा निश्चित करनेवाले काल भी आप ही हैं। यज्ञमें विघ्न डालने वाले दैत्यों को आप चक्र से छिन्न-भिन्न कर डालते हैं। इसलिये आपके नामों की कोई सीमा नहीं है। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं ॥ ३१ ॥ विधात: ! सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंके अनुसार जो उत्तम, मध्यम और निकृष्ट गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनके नियामक आप ही हैं। आपके परमपद का वास्तविक स्वरूप इस कार्यरूप जगत् का कोई आधुनिक प्राणी नहीं जान सकता ॥ ३२ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💖🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः🙏
जवाब देंहटाएंश्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव: !!