॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)
वृत्रासुरका वध
लोकाः सपाला यस्येमे श्वसन्ति विवशा वशे ।
द्विजा इव शिचा बद्धाः स काल इह कारणम् ॥ ८ ॥
ओजः सहो बलं प्राणं अमृतं मृत्युमेव च ।
तमज्ञाय जनो हेतुं आत्मानं मन्यते जडम् ॥ ९ ॥
यथा दारुमयी नारी यथा यंत्रमयो मृगः ।
एवं भूतानि मघवन् नीशतन्त्राणि विद्धि भोः ॥ १० ॥
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तं आत्मा भूतेन्द्रियाशयाः ।
शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहात् ॥ ११ ॥
ये सब लोक और लोकपाल जालमें फँसे हुए पक्षियोंकी भाँति जिसकी अधीनतामें विवश होकर चेष्टा करते हैं, वह काल ही सबकी जय-पराजयका कारण है ॥ ८ ॥ वही काल मनुष्यके मनोबल, इन्द्रियबल, शरीरबल, प्राण, जीवन और मृत्युके रूपमें स्थित है। मनुष्य उसे न जानकर जड शरीर को ही जय-पराजय आदिका कारण समझता है ॥ ९ ॥ इन्द्र ! जैसे काठकी पुतली और यन्त्रका हरिण नचानेवालेके हाथमें होते हैं, वैसे ही तुम समस्त प्राणियोंको भगवान् के अधीन समझो ॥ १० ॥ भगवान् के कृपा-प्रसादके बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्चभूत, इन्द्रियाँ और अन्त:करणचतुष्टय—ये कोई भी इस विश्वकी उत्पत्ति आदि करनेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ११ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
परब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी
जवाब देंहटाएंश्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव: !!