शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

वृत्रासुरका वध

लोकाः सपाला यस्येमे श्वसन्ति विवशा वशे । 
द्विजा इव शिचा बद्धाः स काल इह कारणम् ॥ ८ ॥
ओजः सहो बलं प्राणं अमृतं मृत्युमेव च । 
तमज्ञाय जनो हेतुं आत्मानं मन्यते जडम् ॥ ९ ॥
यथा दारुमयी नारी यथा यंत्रमयो मृगः । 
एवं भूतानि मघवन् नीशतन्त्राणि विद्धि भोः ॥ १० ॥
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तं आत्मा भूतेन्द्रियाशयाः । 
शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहात् ॥ ११ ॥

ये सब लोक और लोकपाल जालमें फँसे हुए पक्षियोंकी भाँति जिसकी अधीनतामें विवश होकर चेष्टा करते हैं, वह काल ही सबकी जय-पराजयका कारण है ॥ ८ ॥ वही काल मनुष्यके मनोबल, इन्द्रियबल, शरीरबल, प्राण, जीवन और मृत्युके रूपमें स्थित है। मनुष्य उसे न जानकर जड शरीर को ही जय-पराजय आदिका कारण समझता है ॥ ९ ॥ इन्द्र ! जैसे काठकी पुतली और यन्त्रका हरिण नचानेवालेके हाथमें होते हैं, वैसे ही तुम समस्त प्राणियोंको भगवान्‌ के अधीन समझो ॥ १० ॥ भगवान्‌ के कृपा-प्रसादके बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्चभूत, इन्द्रियाँ और अन्त:करणचतुष्टय—ये कोई भी इस विश्वकी उत्पत्ति आदि करनेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ११ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. परब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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