॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)
वृत्रासुरका वध
कृत्वाधरां हनुं भूमौ दैत्यो दिव्युत्तरां हनुम्
नभोगम्भीरवक्त्रेण लेलिहोल्बणजिह्वया ॥ २७ ॥
दंष्ट्राभिः कालकल्पाभिः ग्रसन्निव जगत्त्रयम् ।
अतिमात्रमहाकाय आक्षिपन् तरसा गिरीन् ॥ २८ ॥
गिरिराट् पादचारीव पद्भ्यां निर्जरयन् महीम् ।
जग्रास स समासाद्य वज्रिणं सहवाहनम् ॥ २९ ॥
वृत्रग्रस्तं तमालोक्य सप्रजापतयः सुराः ।
महाप्राणो महावीर्यो महासर्प एव द्विपम् ।
हा कष्टमिति निर्विण्णाः चुक्रुशुः समहर्षयः ॥ ३० ॥
अब पैरों से चलने-फिरनेवाले पर्वतराज के समान अत्यन्त दीर्घकाय वृत्रासुर ने अपनी ठोड़ी को धरती से और ऊपर के होठ को स्वर्ग से लगाया तथा आकाश के समान गहरे मुँह, साँप के समान भयावनी जीभ एवं मृत्युके समान कराल दाढ़ों से मानो त्रिलोकी को निगलता, अपने पैरों की चोट से पृथ्वी को रौंदता और प्रबल वेग से पर्वतों को उलटता- पलटता वह इन्द्र के पास आया और उन्हें उनके वाहन ऐरावत हाथी के सहित इस प्रकार लील गया, जैसे कोई परम पराक्रमी और अत्यन्त बलवान् अजगर हाथी को निगल जाय। प्रजापतियों और महर्षियों के साथ देवताओं ने जब देखा कि वृत्रासुर इन्द्र को निगल गया, तब तो वे अत्यन्त दुखी हो गये तथा ‘हाय-हाय ! बड़ा अनर्थ हो गया।’ यों कहकर विलाप करने लगे ॥ २७—३० ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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