रविवार, 19 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

वृत्रासुरका वध

निगीर्णोऽप्यसुरेन्द्रेण न ममारोदरं गतः । 
महापुरुषसन्नद्धो योगमायाबलेन च ॥ ३१ ॥
भित्त्वा वज्रेण तत्कुक्षिं निष्क्रम्य बलभिद् विभुः । 
उच्चकर्त शिरः शत्रोः गिरिश्रृङ्‌गमिवौजसा ॥ ३२ ॥
वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः 
     कृन्तन् समन्तात् परिवर्तमानः । 
न्यपातयत् तावदहर्गणेन 
     यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥ ३३ ॥
तदा च खे दुन्दुभयो विनेदुः 
     गन्धर्वसिद्धाः समहर्षिसङ्‌घाः । 
वार्त्रघ्नलिङ्‌गैस्तमभिष्टुवाना 
     मन्त्रैर्मुदा कुसुमैरभ्यवर्षन् ॥ ३४ ॥
वृत्रस्य देहान् निष्क्रान्तं आत्मज्योतिररिन्दम । 
पश्यतां सर्वदेवानां अलोकं समपद्यत ॥ ३५ ॥

बल दैत्य का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने महापुरुष-विद्या (नारायणकवच) से अपने को सुरक्षित कर रखा था और उनके पास योगमाया का बल था ही। इसलिये वृत्रासुर के निगल लेने पर—उसके पेट में पहुँचकर भी वे मरे नहीं ॥३१॥ उन्होंने अपने वज्र से उसकी कोख फाड़ डाली और उसके पेट से निकलकर बड़े वेग से उसका पर्वत-शिखर के समान उँचा सिर काट डाला ॥३२॥ सूर्यादि ग्रहों की उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गति में जितना समय लगता है, उतने दिनों में अर्थात् एक वर्ष में वृत्रवध का योग उपस्थित होनेपर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्र ने उसकी गरदन को सब ओर से काटकर भूमिपर गिरा दिया ॥३३॥उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। महर्षियों के साथ गन्धर्व, सिद्ध आदि वृत्रघाती इन्द्र का पराक्रम सूचित करनेवाले मन्त्रों से उनकी स्तुति करके बड़े आनन्द के साथ उनपर पुष्पों की वर्षा करने लगे ॥ ३४ ॥ शत्रुदमन परीक्षित्‌ ! उस समय वृत्रासुर के शरीर से उसकी आत्मज्योति बाहर निकली और इन्द्र आदि सब लोगों के देखते-देखते सर्वलोकातीत भगवान्‌ के स्वरूप में लीन हो गयी ॥ ३५ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे वृत्रोवधो नाम द्वादशोऽध्या‍यः ॥ १२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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