॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)
वृत्रासुर का पूर्वचरित्र
श्रीसूत उवाच –
परीक्षितोऽथ संप्रश्नं भगवान् बादरायणिः ।
निशम्य श्रद्दधानस्य प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८ ॥
श्रीशुक उवाच –
श्रृणुषु अवहितो राजन् इतिहासं इमं यथा ।
श्रुतं द्वैपायनमुखात् नारदाद् देवलादपि ॥ ९ ॥
आसीद् राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप ।
चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत् कामधुङ्मही ॥ १० ॥
तस्य भार्यासहस्राणां सहस्राणि दशाभवन् ।
सान्तानिकश्चापि नृपो न लेभे तासु सन्ततिम् ॥ ११ ॥
सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो ! भगवान् शुकदेवजीने परम श्रद्धालु राजर्षि परीक्षित्का यह श्रेष्ठ प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन करते हुए यह बात कही ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित् ! तुम सावधान होकर यह इतिहास सुनो। मैंने इसे अपने पिता व्यासजी, देवर्षि नारद और महर्षि देवलके मुँहसे भी विधिपूर्वक सुना है ॥ ९ ॥ प्राचीन कालकी बात है, शूरसेन देशमें चक्रवर्ती सम्राट् महाराज चित्रकेतु राज्य करते थे। उनके राज्यमें पृथ्वी स्वयं ही प्रजाकी इच्छाके अनुसार अन्न-रस दे दिया करती थी ॥ १० ॥ उनके एक करोड़ रानियाँ थीं और ये स्वयं सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ भी थे। परंतु उन्हें उनमेंसे किसीके भी गर्भसे कोई सन्तान न हुई ॥ ११ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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