गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

वृत्रासुर का पूर्वचरित्र

श्रीसूत उवाच – 

परीक्षितोऽथ संप्रश्नं भगवान् बादरायणिः । 
निशम्य श्रद्दधानस्य प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८ ॥

श्रीशुक उवाच – 

श्रृणुषु अवहितो राजन् इतिहासं इमं यथा । 
श्रुतं द्वैपायनमुखात् नारदाद् देवलादपि ॥ ९ ॥
आसीद् राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप । 
चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत् कामधुङ्‌मही ॥ १० ॥
तस्य भार्यासहस्राणां सहस्राणि दशाभवन् । 
सान्तानिकश्चापि नृपो न लेभे तासु सन्ततिम् ॥ ११ ॥

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो ! भगवान्‌ शुकदेवजीने परम श्रद्धालु राजर्षि परीक्षित्‌का यह श्रेष्ठ प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन करते हुए यह बात कही ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्‌ ! तुम सावधान होकर यह इतिहास सुनो। मैंने इसे अपने पिता व्यासजी, देवर्षि नारद और महर्षि देवलके मुँहसे भी विधिपूर्वक सुना है ॥ ९ ॥ प्राचीन कालकी बात है, शूरसेन देशमें चक्रवर्ती सम्राट् महाराज चित्रकेतु राज्य करते थे। उनके राज्यमें पृथ्वी स्वयं ही प्रजाकी इच्छाके अनुसार अन्न-रस दे दिया करती थी ॥ १० ॥ उनके एक करोड़ रानियाँ थीं और ये स्वयं सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ भी थे। परंतु उन्हें उनमेंसे किसीके भी गर्भसे कोई सन्तान न हुई ॥ ११ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) वृत्रासुर का पूर्वचरित्र रूपौदार्यवयोजन्म विद्यैश्वर...