॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)
पुंसवन-व्रतकी विधि
श्रीराजोवाच -
व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम् ।
तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णुः प्रसीदति ॥ १ ॥
श्रीशुक उवाच -
शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्भर्तुरनुज्ञया ।
आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः ॥ २ ॥
निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणान् अनुमन्त्र्य च ।
स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालङ्कृताम्बरे ।
पूजयेत् प्रातराशात् प्राग् भगवन्तं श्रिया सह ॥ ३ ॥
अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोऽस्तु ते ।
महाविभूतिपतये नमः सकलसिद्धये ॥ ४ ॥
यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिमौजसा ।
जुष्ट ईश गुणैः सर्वैः ततोऽसि भगवान् प्रभुः ॥ ५ ॥
विष्णुपत्नि महामाये महापुरुषलक्षणे ।
प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन् आपने अभी-अभी पुंसवन-व्रतका वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान् विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित् ! यह पुंसवन-व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे ॥ २ ॥ पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले। फिर प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले। प्रात:काल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी पूजा करे ॥ ३ ॥ (इस प्रकार प्रार्थना करे—) ‘प्रभो ! आप पूर्णकाम हैं। अतएव आपको किसीसे भी कुछ लेना-देना नहीं है। आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकलसिद्धिस्वरूप हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ ४ ॥ मेरे आराध्यदेव ! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्वर्यों से नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान् कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ५ ॥ माता लक्ष्मीजी ! आप भगवान् की अर्धाङ्गिनी और महामायास्वरूपिणी हैं। भगवान्के सारे गुण आपमें निवास करते हैं। महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं आपको नमस्कार करती हूँ’ ॥ ६ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀जय श्री हरि: !! 🙏
जवाब देंहटाएंश्रीलक्ष्मी नारायण नमो नमः
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवम् हरि: !!