रविवार, 24 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

पुंसवन-व्रतकी विधि

युवां तु विश्वस्य विभू जगतः कारणं परम् । 
इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ॥ ११ ॥
तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेव पुरुषः परः । 
त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान् ॥ १२ ॥
गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान् । 
त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशयाः । 
नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वं अपाश्रयः ॥ १३ ॥ 
यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ । 
तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १४ ॥

‘हे लक्ष्मी-नारायण ! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत् के  अन्तिम कारण हैं—आपका और कोई कारण नहीं है। भगवन् ! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं। ये ही स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं। इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है ॥ ११ ॥ प्रभो ! आपही इन महामायाके अधीश्वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं। आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ-क्रिया। आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्न करनेवाली क्रिया ॥ १२ ॥ माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्त:करण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं ॥ १३ ॥ प्रभो ! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्वर हैं। अत: मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’ ॥ १४ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀जय श्री हरि: !! 🙏
    श्रीलक्ष्मी नारायण नमो नमः
    नारायण नारायण नारायण नारायण

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