सोमवार, 25 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

पुंसवन-व्रतकी विधि

एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम् । 
नीत्वाथोपचरेत् साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि ॥ २१ ॥
श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत् । 
पयःश्रृतेन जुहुयात् चरुणा सह सर्पिषा । 
पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः ॥ २२ ॥ 
आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः । 
प्रणम्य शिरसा भक्त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया ॥ २३ ॥
आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः । 
दद्यात्पत्‍न्यै चरोः शेषं सुप्रजास्त्वं सुसौभगम् ॥ २४ ॥
एतच्चरित्वा विधिवद्व्रतं विभोः 
     अभीप्सितार्थं लभते पुमानिह । 
स्त्री त्वेतदास्थाय लभेत सौभगं 
     श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम् ॥ २५ ॥
कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं 
     वरं त्ववीरा हतकिल्बिषां गतिम् । 
मृतप्रजा जीवसुता धनेश्वरी 
     सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम् ॥ २६ ॥
विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते 
     य आमयावीन्द्रियकल्यदेहम् । 
एतत्पठन्नभ्युदये च कर्मणि 
     अनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम् ॥ २७ ॥
तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान् 
     होमावसाने हुतभुक् श्रीः हरिश्च । 
राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं 
     दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते ॥ २८ ॥

साध्वी स्त्री इस विधि से बारह महीनों तक—पूरे सालभर इस व्रत का आचरण करके मार्गशीर्ष की अमावस्या को उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे ॥ २१ ॥ उस दिन प्रात:काल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्‌ का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञ की विधि से घृतमिश्रित खीर की अग्नि में बारह आहुति दे ॥ २२ ॥ इसके बाद जब ब्राह्मण प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दें तो बड़े आदरसे सिर झुकाकर उन्हें स्वीकार करे। भक्तिभाव से माथा टेककर उनके चरणों में प्रणाम करे और उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे ॥ २३ ॥ पहले आचार्य को भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्री को सत्पुत्र और सौभाग्य-दान करनेवाला होता है ॥ २४ ॥
परीक्षित्‌ ! भगवान्‌के इस पुंसवन-व्रतका जो मनुष्य विधिपूर्वक अुनष्ठान करता है, उसे यहीं उसकी मनचाही वस्तु मिल जाती है। स्त्री इस व्रतका पालन करके सौभाग्य, सम्पत्ति, सन्तान, यश और गृह प्राप्त करती है तथा उसका पति चिरायु हो जाता है ॥ २५ ॥ इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्री को सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपा को श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रत के प्रभाव से रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य माङ्गलिक श्राद्धकर्मोंमें  इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं ॥ २६-२७ ॥ वे सन्तुष्ट होकर हवन के समाप्त होने पर व्रती की समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं । ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञों के एकमात्र भोक्ता भगवान्‌ लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रती की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। परीक्षित्‌! मैंने तुम्हें मरुद्गण की आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दिति के श्रेष्ठ पुंसवन-व्रत का वर्णन भी सुना दिया ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुंसवनव्रतकथनं नाम एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ 

॥ इति षष्ठ स्कन्ध समाप्त ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 💐🌼🌾💐जय श्रीहरि: !!🙏
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    राधे राधे जय श्रीकृष्ण

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

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