॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट११)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
विषयतृषो नरपशवो
य उपासते विभूतीर्न परं त्वाम् ।
तेषामाशिष ईश तदनु
विनश्यन्ति यथा राजकुलम् ॥ ३८ ॥
कामधियस्त्वयि रचिता
न परम रोहन्ति यथा करम्भबीजानि ।
ज्ञानात्मन्यगुणमये
गुणगणतोऽस्य द्वन्द्वजालानि ॥ ३९ ॥
जो नरपशु केवल विषयभोग ही चाहते हैं, वे आपका भजन न करके आपके विभूतिस्वरूप इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। प्रभो ! जैसे राजकुलका नाश होनेके पश्चात् उसके अनुयायियोंकी जीविका भी जाती रहती है, वैसे ही क्षुद्र उपास्यदेवोंका नाश होनेपर उनके दिये हुए भोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ परमात्मन् ! आप ज्ञानस्वरूप और निर्गुण हैं। इसलिये आपके प्रति की हुई सकाम भावना भी अन्यान्य कर्मोंके समान जन्म-मृत्युरूप फल देनेवाली नहीं होती, जैसे भुने हुए बीजोंसे अङ्कुर नहीं उगते। क्योंकि जीवको जो सुख-दु:ख आदि द्वन्द्व प्राप्त होते हैं वे सत्त्वादि गुणों से ही होते हैं, निर्गुणसे नहीं ॥ ३९ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
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