गुरुवार, 2 जुलाई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

प्रह्लादजी द्वारा माता के गर्भ में प्राप्त हुए 
नारद जी के उपदेश का वर्णन

हरिः सर्वेषु भूतेषु भगवानास्त ईश्वरः
इति भूतानि मनसा कामैस्तैः साधु मानयेत् ||३२||
एवं निर्जितषड्वर्गैः क्रियते भक्तिरीश्वरे
वासुदेवे भगवति यया संलभ्यते रतिः ||३३||

सर्वशक्तिमान् भगवान्‌ श्रीहरि समस्त प्राणियों में विराजमान हैं—ऐसी भावना से यथाशक्ति सभी प्राणियों की इच्छा पूर्ण करे और हृदय से उनका सम्मान करे ॥ ३२ ॥ काम,क्रोध,लोभ, मोह,मद और मत्सर—इन छ: शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जो लोग इस प्रकार भगवान्‌ की साधन-भक्ति का अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उस भक्तिके द्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम की प्राप्ति हो जाती है ॥ ३३ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💟🥀 जय श्रीहरि: !! 🙏
    श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

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