शनिवार, 15 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

गृहस्थसम्बन्धी सदाचार

युधिष्ठिर उवाच - 
गृहस्थ एतां पदवीं विधिना येन चाञ्जसा । 
याति देवऋषे ब्रूहि मादृशो गृहमूढधीः ॥ १ ॥ 

श्रीनारद उवाच - 
गृहेष्ववस्थितो राजन् क्रियाः कुर्वन्यथोचिताः । 
वासुदेवार्पणं साक्षाद् उपासीत महामुनीन् ॥ २ ॥ 
श्रृण्वन्भगवतोऽभीक्ष्णं अवतारकथामृतम् । 
श्रद्दधानो यथाकालं उपशान्तजनावृतः ॥ ३ ॥ 
सत्सङ्‌गाच्छनकैः सङ्‌गं आत्मजायात्मजादिषु । 
विमुञ्चेन् मुच्यमानेषु स्वयं स्वप्नवदुत्थितः ॥ ४ ॥ 
यावद् अर्थमुपासीनो देहे गेहे च पण्डितः । 
विरक्तो रक्तवत् तत्र नृलोके नरतां न्यसेत् ॥ ५ ॥ 
ज्ञातयः पितरौ पुत्रा भ्रातरः सुहृदोऽपरे । 
यद् वदन्ति यदिच्छन्ति चानुमोदेत निर्ममः ॥ ६ ॥ 

राजा युधिष्ठिरने पूछा—देवर्षि नारदजी ! मेरे जैसा गृहासक्त गृहस्थ बिना विशेष परिश्रमके इस पदको किस साधनसे प्राप्त कर सकता है, आप कृपा करके मुझे बतलाइये ॥ १ ॥
नारदजीने कहा—युधिष्ठिर ! मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहे और गृहस्थ-धर्मके अनुसार सब काम करे, परंतु उन्हें भगवान्‌के प्रति समर्पित कर दे और बड़े-बड़े संत-महात्माओंकी सेवा भी करे ॥ २ ॥ अवकाशके अनुसार विरक्त पुरुषोंमें निवास करे और बार-बार श्रद्धापूर्वक भगवान्‌के अवतारोंकी लीला-सुधाका पान करता रहे ॥ ३ ॥ जैसे स्वप्न टूट जानेपर मनुष्य स्वप्नके सम्बन्धियोंसे आसक्त नहीं रहता—वैसे ही ज्यों-ज्यों सत्सङ्गके द्वारा बुद्धि शुद्ध हो, त्यों-ही-त्यों शरीर, स्त्री, पुत्र, धन आदिकी आसक्ति स्वयं छोड़ता चले। क्योंकि एक-न-एक दिन ये छूटनेवाले ही हैं ॥ ४ ॥ बुद्धिमान् पुरुषको आवश्यकताके अनुसार ही घर और शरीरकी सेवा करनी चाहिये, अधिक नहीं। भीतरसे विरक्त रहे और बाहरसे रागीके समान लोगोंमें साधारण मनुष्यों-जैसा ही व्यवहार कर ले ॥ ५ ॥ माता-पिता, भाई-बन्धु, पुत्र-मित्र, जातिवाले और दूसरे जो कुछ कहें अथवा जो कुछ चाहें, भीतर से ममता न रखकर उनका अनुमोदन कर दे ॥ ६ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. श्रीमद् भागवत महापुराण को सहस्त्रों सहस्त्रों कोटिश: नमन वंदन🙏💟 राधा रमणम् हरे हरे !!🙏

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४) गृहस्थसम्बन्धी सदाचार कुर्याद् आपरपक्षीयं मासि प्रौ...