सोमवार, 17 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

गृहस्थसम्बन्धी सदाचार

अथ देशान् प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेय आवहान् । 
स वै पुण्यतमो देशः सत्पात्रं यत्र लभ्यते ॥ २७ ॥ 
बिम्बं भगवतो यत्र सर्वमेतच्चराचरम् । 
यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम् ॥ २८ ॥ 
यत्र यत्र हरेरर्चा स देशः श्रेयसां पदम् । 
यत्र गंगादयो नद्यः पुराणेषु च विश्रुताः ॥ २९ ॥ 
सरांसि पुष्करादीनि क्षेत्राण्यर्हाश्रितान्युत । 
कुरुक्षेत्रं गयशिरः प्रयागः पुलहाश्रमः ॥ ३० ॥ 
नैमिषं फाल्गुनं सेतुः प्रभासोऽथ कुशस्थली । 
वाराणसी मधुपुरी पम्पा बिन्दुसरस्तथा ॥ ३१ ॥ 
नारायणाश्रमो नन्दा सीतारामाश्रमादयः । 
सर्वे कुलाचला राजन् महेन्द्रमलयादयः ॥ ३२ ॥ 
एते पुण्यतमा देशा हरेरर्चाश्रिताश्च ये । 
एतान्देशान् निषेवेत श्रेयस्कामो ह्यभीक्ष्णशः । 
धर्मो ह्यत्रेहितः पुंसां सहस्राधिफलोदयः ॥ ३३ ॥ 

युधिष्ठिर ! अब मैं उन स्थानोंका वर्णन करता हूँ, जो धर्म आदि श्रेयकी प्राप्ति करानेवाले हैं। सबसे पवित्र देश वह है, जिसमें सत्पात्र मिलते हों ॥ २७ ॥ जिनमें यह सारा चर और अचर जगत् स्थित है, उन भगवान्‌की प्रतिमा जिस देशमें हो, जहाँ तप, विद्या एवं दया आदि गुणोंसे युक्त ब्राह्मणोंके परिवार निवास करते हों तथा जहाँ-जहाँ भगवान्‌की पूजा होती हो और पुराणोंमें प्रसिद्ध गङ्गा आदि नदियाँ हों, वे सभी स्थान परम कल्याणकारी हैं ॥ २८-२९ ॥ पुष्कर आदि सरोवर, सिद्ध पुरुषोंके द्वारा सेवित क्षेत्र, कुरुक्षेत्र, गया, प्रयाग, पुलहाश्रम (शालग्रामक्षेत्र) नैमिषारण्य, फाल्गुनक्षेत्र, सेतुबन्ध, प्रभास, द्वारका, काशी, मथुरा, पम्पासर, बिन्दुसरोवर, बदरिकाश्रम, अलकनन्दा, भगवान्‌ सीतारामजीके आश्रम—अयोध्या-चित्रकूटादि, महेन्द्र और मलय आदि समस्त कुलपर्वत और जहाँ-जहाँ भगवान्‌के अर्चावतार हैं—वे सब-के-सब देश अत्यन्त पवित्र हैं। कल्याणकामी पुरुषको बार-बार इन देशोंका सेवन करना चाहिये। इन स्थानोंपर जो पुण्यकर्म किये जाते हैं, मनुष्योंको उनका हजारगुना फल मिलता है ॥ ३०—३३ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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