शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
सप्तम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

गृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन

यश्चित्तविजये यत्तः स्यान्निःसङ्गोऽपरिग्रहः
एको विविक्तशरणो भिक्षुर्भैक्ष्यमिताशनः ॥ ३० ॥
देशे शुचौ समे राजन्संस्थाप्यासनमात्मनः
स्थिरं सुखं समं तस्मिन्नासीतर्ज्वङ्ग ओमिति ॥ ३१ ॥
प्राणापानौ सन्निरुन्ध्यात्पूरकुम्भकरेचकैः
यावन्मनस्त्यजेत्कामान्स्वनासाग्रनिरीक्षणः ॥ ३२ ॥
यतो यतो निःसरति मनः कामहतं भ्रमत्
ततस्तत उपाहृत्य हृदि रुन्ध्याच्छनैर्बुधः ॥ ३३ ॥
एवमभ्यस्यतश्चित्तं कालेनाल्पीयसा यतेः
अनिशं तस्य निर्वाणं यात्यनिन्धनवह्निवत् ॥ ३४ ॥
कामादिभिरनाविद्धं प्रशान्ताखिलवृत्ति यत्
चित्तं ब्रह्मसुखस्पृष्टं नैवोत्तिष्ठेत कर्हिचित् ॥ ३५ ॥

जो पुरुष अपने मनपर विजय प्राप्त करनेके लिये उद्यत हो, वह आसक्ति और परिग्रहका त्याग करके संन्यास ग्रहण करे। एकान्तमें अकेला ही रहे और भिक्षा-वृत्तिसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये स्वल्प और परिमित भोजन करे ॥ ३० ॥ युधिष्ठिर ! पवित्र और समान भूमिपर अपना आसन बिछाये और सीधे स्थिर-भावसे समान और सुखकर आसनसे उसपर बैठकर ॐकारका जप करे ॥ ३१ ॥ जबतक मन संकल्प-विकल्पोंको छोड़ न दे, तबतक नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर पूरक, कुम्भक और रेचकद्वारा प्राण तथा अपानकी गतिको रोके ॥ ३२ ॥ कामकी चोटसे घायल चित्त इधर-उधर चक्कर काटता हुआ जहाँ-जहाँ जाय, विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह वहाँ- वहाँसे उसे लौटा लाये और धीरे-धीरे हृदयमें रोके ॥ ३३ ॥ जब साधक निरन्तर इस प्रकारका अभ्यास करता है, तब र्ईंधनके बिना जैसे अग्रि बुझ जाती है, वैसे ही थोड़े समयमें उसका चित्त शान्त हो जाता है ॥ ३४ ॥ इस प्रकार जब काम-वासनाएँ चोट करना बंद कर देती हैं और समस्त वृत्तियाँ अत्यन्त शान्त हो जाती हैं, तब चित्त ब्रह्मानन्दके संस्पर्शमें मग्र हो जाता है और फिर उसका कभी उत्थान नहीं होता ॥ ३५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💖🥀जय हो द्वारकानाथ योगेश्वर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण गोविंद 🙏
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  सप्तम स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०८) गृहस्थोंके लिये मोक्षधर्मका वर्णन यः प्रव्रज्य गृ...