शनिवार, 18 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

वृत्रासुरका वध

श्रीशुक उवाच - 
इति ब्रुवाणावन्योन्यं धर्मजिज्ञासया नृप । 
युयुधाते महावीर्यौ इन्द्रवृत्रौ युधाम्पती ॥ २३ ॥
आविध्य परिघं वृत्रः कार्ष्णायसमरिन्दमः । 
इन्द्राय प्राहिणोद् घोरं वामहस्तेन मारिष ॥ २४ ॥
स तु वृत्रस्य परिघं करं च करभोपमम् । 
चिच्छेद युगपद् देवो वज्रेण शतपर्वणा ॥ २५ ॥
दोर्भ्यां उत्कृत्तमूलाभ्यां बभौ रक्तस्रवोऽसुरः । 
छिन्नपक्षो यथा गोत्रः खाद् भ्रष्टो वज्रिणा हतः ॥ २६ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! इस प्रकार योद्धाओंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी देवराज इन्द्र और वृत्रासुर धर्मका तत्त्व जाननेकी अभिलाषासे एक-दूसरेके साथ बातचीत करते हुए आपसमें युद्ध करने लगे ॥ २३ ॥ राजन् ! अब शत्रुसूदन वृत्रासुरने बायें हाथसे फौलादका बना हुआ एक बहुत भयावना परिघ उठाकर आकाश में घुमाया और उससे इन्द्रपर प्रहार किया ॥ २४ ॥ किन्तु देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वह परिघ तथा हाथीकी सूँडके समान लंबी भुजा अपने सौ गाँठोंवाले वज्रसे एक साथ ही काट गिरायी ॥ २५ ॥ जड़से दोनों भुजाओंके कट जानेपर वृत्रासुरके बायें और दायें दोनों कंधोंसे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय वह ऐसा जान पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रकी चोटसे पंख कट जानेपर कोई पर्वत ही आकाशसे गिरा हो ॥ २६ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

वृत्रासुरका वध

श्रीशुक उवाच - 
इन्द्रो वृत्रवचः श्रुत्वा गतालीकमपूजयत् । 
गृहीतवज्रः प्रहसन् तमाह गतविस्मयः ॥ १८ ॥

इन्द्र उवाच - 
अहो दानव सिद्धोऽसि यस्य ते मतिरीदृशी । 
भक्तः सर्वात्मनात्मानं सुहृदं जगदीश्वरम् ॥ १९ ॥
भवानतार्षीन्मायां वै वैष्णवीं जनमोहिनीम् । 
यद् विहायासुरं भावं महापुरुषतां गतः ॥ २० ॥
खल्विदं महदाश्चर्यं यद्रजःप्रकृतेस्तव । 
वासुदेवे भगवति सत्त्वात्मनि दृढा मतिः ॥ २१ ॥
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ निःश्रेयसेश्वरे । 
विक्रीडतोऽमृताम्भोधौ किं क्षुद्रैः खातकोदकैः ॥ २२ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्‌ ! वृत्रासुरके ये सत्य एवं निष्कपट वचन सुनकर इन्द्रने उनका आदर किया और अपना वज्र उठा लिया। इसके बाद बिना किसी प्रकारका आश्चर्य किये मुसकराते हुए वे कहने लगे— ॥ १८ ॥
देवराज इन्द्रने कहा—अहो दानवराज ! सचमुच तुम सिद्ध पुरुष हो। तभी तो तुम्हारा धैर्य, निश्चय और भगवद्भाव इतना विलक्षण है। तुमने समस्त प्राणियोंके सुहृद् आत्मस्वरूप जगदीश्वरकी अनन्य भावसे भक्ति की है ॥ १९ ॥ अवश्य ही तुम लोगोंको मोहित करनेवाली भगवान्‌की मायाको पार कर गये हो। तभी तो तुम असुरोचित भाव छोडक़र महापुरुष हो गये हो ॥ २० ॥ अवश्य ही यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि तुम रजोगुणी प्रकृतिके हो, तो भी विशुद्ध सत्त्वस्वरूप भगवान्‌ वासुदेवमें तुम्हारी बुद्धि दृढ़तासे लगी हुई है ॥ २१ ॥ जो परम कल्याणके स्वामी भगवान्‌ श्रीहरिके चरणोंमें प्रेममय भक्तिभाव रखता है, उसे जगत्के भोगोंकी क्या आवश्यकता है। जो अमृतके समुद्रमें विहार कर रहा है, उसे क्षुद्र गड्ढोंके जलसे प्रयोजन ही क्या हो सकता है ॥ २२ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

वृत्रासुरका वध

अविद्वानेवमात्मानं मन्यतेऽनीशमीश्वरम् । 
भूतैः सृजति भूतानि ग्रसते तानि तैः स्वयम् ॥ १२ ॥
आयुः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं आशिषः पुरुषस्य याः । 
भवन्त्येव हि तत्काले यथानिच्छोर्विपर्ययाः ॥ १३ ॥
तस्मादकीर्तियशसोः जयापजययोरपि । 
समः स्यात्सुखदुःखाभ्यां मृत्युजीवितयोस्तथा ॥ १४ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः । 
तत्र साक्षिणमात्मानं यो वेद स न बध्यते ॥ १५ ॥
पश्य मां निर्जितं शत्रु वृक्णायुधभुजं मृधे । 
घटमानं यथाशक्ति तव प्राणजिहीर्षया ॥ १६ ॥
प्राणग्लहोऽयं समर इष्वक्षो वाहनासनः । 
अत्र न ज्ञायतेऽमुष्य जयोऽमुष्य पराजयः ॥ १७ ॥

जिसे इस बात का पता नहीं है कि भगवान्‌ ही सब का नियन्त्रण करते हैं, वही इस परतन्त्र जीव को स्वतन्त्र कर्ता-भोक्ता मान बैठता है। वस्तुत: स्वयं भगवान्‌ ही प्राणियों के द्वारा प्राणियों की रचना और उन्हीं के द्वारा उनका संहार करते हैं ॥ १२ ॥ जिस प्रकार इच्छा न होनेपर भी समय विपरीत होने से मनुष्य को मृत्यु और अपयश आदि प्राप्त होते हैं—वैसे ही समयकी अनुकूलता होनेपर इच्छा न होनेपर भी उसे आयु, लक्ष्मी, यश और ऐश्वर्य आदि भोग भी मिल जाते हैं ॥ १३ ॥ इसलिये यश-अपयश, जय-पराजय, सुख-दु:ख, जीवन-मरण—इनमें से किसी एक की इच्छा-अनिच्छा न रखकर सभी परिस्थितियों में समभाव से रहना चाहिये—हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना चाहिये ॥ १४ ॥ सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं; अत: जो पुरुष आत्मा को उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोष से लिप्त नहीं होता ॥ १५ ॥ देवराज इन्द्र ! मुझे भी तो देखो; तुमने मेरा हाथ और शस्त्र काटकर एक प्रकार से मुझे परास्त कर दिया है, फिर भी मैं तुम्हारे प्राण लेने के लिये यथाशक्ति प्रयत्न कर ही रहा हूँ ॥ १६ ॥ यह युद्ध क्या है, एक जूए का खेल । इसमें प्राण की बाजी लगती है, बाणों के पासे डाले जाते हैं और वाहन ही चौसर हैं। इसमें पहले से यह बात नहीं मालूम होती कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा ॥१७ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

वृत्रासुरका वध

लोकाः सपाला यस्येमे श्वसन्ति विवशा वशे । 
द्विजा इव शिचा बद्धाः स काल इह कारणम् ॥ ८ ॥
ओजः सहो बलं प्राणं अमृतं मृत्युमेव च । 
तमज्ञाय जनो हेतुं आत्मानं मन्यते जडम् ॥ ९ ॥
यथा दारुमयी नारी यथा यंत्रमयो मृगः । 
एवं भूतानि मघवन् नीशतन्त्राणि विद्धि भोः ॥ १० ॥
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तं आत्मा भूतेन्द्रियाशयाः । 
शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहात् ॥ ११ ॥

ये सब लोक और लोकपाल जालमें फँसे हुए पक्षियोंकी भाँति जिसकी अधीनतामें विवश होकर चेष्टा करते हैं, वह काल ही सबकी जय-पराजयका कारण है ॥ ८ ॥ वही काल मनुष्यके मनोबल, इन्द्रियबल, शरीरबल, प्राण, जीवन और मृत्युके रूपमें स्थित है। मनुष्य उसे न जानकर जड शरीर को ही जय-पराजय आदिका कारण समझता है ॥ ९ ॥ इन्द्र ! जैसे काठकी पुतली और यन्त्रका हरिण नचानेवालेके हाथमें होते हैं, वैसे ही तुम समस्त प्राणियोंको भगवान्‌ के अधीन समझो ॥ १० ॥ भगवान्‌ के कृपा-प्रसादके बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्चभूत, इन्द्रियाँ और अन्त:करणचतुष्टय—ये कोई भी इस विश्वकी उत्पत्ति आदि करनेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ११ ॥ 

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

वृत्रासुरका वध

वृत्रस्य कर्मातिमहाद्‍भुतं तत् 
     सुरासुराश्चारणसिद्धसङ्‌घाः । 
अपूजयंस्तत् पुरुहूतसङ्‌कटं 
     निरीक्ष्य हा हेति विचुक्रुशुर्भृशम् ॥ ५ ॥
इन्द्रो न वज्रं जगृहे विलज्जितः 
     च्युतं स्वहस्तादरिसन्निधौ पुनः । 
तमाह वृत्रो हर आत्तवज्रो 
     जहि स्वशत्रुं न विषादकालः ॥ ६ ॥
युयुत्सतां कुत्रचिदाततायिनां 
     जयः सदैकत्र न वै परात्मनाम् । 
विनैकमुत्पत्तिलयस्थितीश्वरं 
     सर्वज्ञमाद्यं पुरुषं सनातनम् ॥ ७ ॥

वृत्रासुरके इस अत्यन्त अलौकिक कार्यको देखकर देवता, असुर, चारण, सिद्धगण आदि सभी प्रशंसा करने लगे। परन्तु इन्द्रका सङ्कट देखकर वे ही लोग बार-बार ‘हाय-हाय !’ कहकर चिल्लाने लगे ॥ ५ ॥ परीक्षित्‌ ! वह वज्र इन्द्रके हाथसे छूटकर वृत्रासुरके पास ही जा पड़ा था। इसलिये लज्जित होकर इन्द्रने उसे फिर नहीं उठाया। तब वृत्रासुरने कहा—‘इन्द्र ! तुम वज्र उठाकर अपने शत्रुको मार डालो। यह विषाद करनेका समय नहीं है ॥ ६ ॥ (देखो—) सर्वज्ञ, सनातन, आदिपुरुष भगवान्‌ ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेमें समर्थ हैं। उनके अतिरिक्त देहाभिमानी और युद्धके लिये उत्सुक आततायियोंको सर्वदा जय ही नहीं मिलती। वे कभी जीतते हैं तो कभी हारते हैं ॥ ७ ॥ 

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श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध , बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – बारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

वृत्रासुरका वध

श्रीऋषिरुवाच - 

एवं जिहासुर्नृप देहमाजौ 
     मृत्युं वरं विजयान्मन्यमानः । 
शूलं प्रगृह्याभ्यपतत् सुरेन्द्रं 
     यथा महापुरुषं कैटभोऽप्सु ॥ १ ॥
ततो युगान्ताग्निकठोरजिह्वं 
     आविध्य शूलं तरसासुरेन्द्रः । 
क्षिप्त्वा महेन्द्राय विनद्य वीरो 
     हतोऽसि पापेति रुषा जगाद ॥ २ ॥
ख आपतत् तद् विचलद् ग्रहोल्कवद् 
     निरीक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमजातविक्लवः । 
वज्रेण वज्री शतपर्वणाच्छिनद् 
     भुजं च तस्योरगराजभोगम् ॥ ३ ॥
छिन्नैकबाहुः परिघेण वृत्रः 
     संरब्ध आसाद्य गृहीतवज्रम् । 
हनौ तताडेन्द्रमथामरेभं 
     वज्रं च हस्तान् न्यपतन् मघोनः ॥ ४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन् ! वृत्रासुर रणभूमिमें अपना शरीर छोडऩा चाहता था, क्योंकि उसके विचारसे इन्द्रपर विजय प्राप्त करके स्वर्ग पानेकी अपेक्षा मरकर भगवान्‌को प्राप्त करना श्रेष्ठ था। इसलिये जैसे प्रलयकालीन जलमें कैटभासुर भगवान्‌ विष्णुपर चोट करनेके लिये दौड़ा था, वैसे ही वह भी त्रिशूल उठाकर इन्द्रपर टूट पड़ा ॥ १ ॥ वीर वृत्रासुरने प्रलयकालीन अग्रिकी लपटोंके समान तीखी नोकोंवाले त्रिशूलको घुमाकर बड़े वेगसे इन्द्रपर चलाया और अत्यन्त क्रोधसे सिंहनाद करके बोला—‘पापी इन्द्र ! अब तू बच नहीं सकता’ ॥ २ ॥ इन्द्रने यह देखकर कि वह भयङ्कर त्रिशूल ग्रह और उल्काके समान चक्कर काटता हुआ आकाशमें आ रहा है, किसी प्रकारकी अधीरता नहीं प्रकट की और उस त्रिशूलके साथ ही वासुकि नागके समान वृत्रासुरकी विशाल भुजा अपने सौ गाँठोंवाले वज्रसे काट डाली ॥ ३ ॥ एक बाँह कट जानेपर वृत्रासुरको बहुत क्रोध हुआ। उसने वज्रधारी इन्द्रके पास जाकर उनकी ठोड़ीमें और गजराज ऐरावतपर परिघ से ऐसा प्रहार किया कि उनके हाथसे वह वज्र गिर पड़ा ॥ ४ ॥

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बुधवार, 15 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

अहं हरे तव पादैकमूल 
     दासानुदासो भवितास्मि भूयः । 
मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते 
     गृणीत वाक्कर्म करोतु कायः ॥ २४ ॥
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं 
     न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । 
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा 
     समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्‌क्षे ॥ २५ ॥
अजातपक्षा इव मातरं खगाः 
     स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः । 
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा 
     मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥ २६ ॥
ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं 
     संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः । 
त्वन्माययात्मात्मजदारगेहे
     ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात् ॥ २७ ॥

(भगवान्‌ को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए वृत्रासुरने प्रार्थना की—) ‘प्रभो ! आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्यभावसे आपके चरणकमलोंके आश्रित सेवकोंकी सेवा करनेका अवसर मुझे अगले जन्ममें भी प्राप्त हो। प्राणवल्लभ ! मेरा मन आपके मङ्गलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हींका गान करे और शरीर आपकी सेवामें ही संलग्न रहे ॥ २४ ॥ सर्वसौभाग्यनिधे ! मैं आप को छोडक़र स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकछत्र राज्य, योगकी सिद्धियाँ—यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं चाहता ॥ २५ ॥ जैसे पक्षियों के पंखहीन बच्चे अपनी माकी बाट जोहते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी मा का दूध पीने के लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम से मिलने के लिये उत्कण्ठित रहती है—वैसे ही कमलनयन ! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है ॥ २६ ॥ प्रभो ! मैं मुक्ति नहीं चाहता। मेरे कर्मों के फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकना पड़े, इसकी परवा नहीं। परन्तु मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, जिस-जिस योनि में जन्मूँ, वहाँ-वहाँ भगवान्‌ के प्यारे भक्तजनों से मेरी प्रेम-मैत्री बनी रहे। स्वामिन् ! मैं केवल यही चाहता हूँ कि जो लोग आपकी माया से देह-गेह और स्त्री-पुत्र आदि में आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा कभी किसी प्रकार का भी सम्बन्ध न हो’ ॥ २७ ॥

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां 
षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम एकादशोऽध्या‍यः ॥ ११ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा 
     हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः । 
तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो 
     यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ॥ २० ॥
अहं समाधाय मनो यथाऽऽह 
     नः सङ्‌कर्षणस्तच्चरणारविन्दे । 
त्वद्वज्ररंहोलुलितग्राम्यपाशो 
     गतिं मुनेर्याम्यपविद्धलोकः ॥ २१ ॥
पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानां 
     याः सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम् । 
न राति यद् द्वेष उद्वेग आधिः 
     मदः कलिर्व्यसनं सम्प्रयासः ॥ २२ ॥
त्रैवर्गिकायासविघातमस्मत् 
     पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र । 
ततोऽनुमेयो भगवत्प्रसादो 
     यो दुर्लभोऽकिञ्चनगोचरोऽन्यैः ॥ २३ ॥

इन्द्र ! तेरा यह वज्र श्रीहरि के तेज और दधीचि ऋषि की तपस्या से शक्तिमान् हो रहा है। विष्णुभगवान्‌ ने मुझे मारने के लिये तुझे आज्ञा भी दी है। इसलिये अब तू उसी वज्रसे मुझे मार डाल। क्योंकि जिस पक्षमें भगवान्‌ श्रीहरि हैं, उधर ही विजय, लक्ष्मी और सारे गुण निवास करते हैं ॥ २० ॥ देवराज ! भगवान्‌ सङ्कर्षणके आज्ञानुसार मैं अपने मनको उनके चरणकमलों में लीन कर दूँगा। तेरे वज्रका वेग मुझे नहीं, मेरे विषयभोगरूप फंदे को काट डालेगा और मैं शरीर त्यागकर मुनिजनोचित गति प्राप्त करूँगा ॥ २१ ॥ जो पुरुष भगवान्‌ से अनन्य प्रेम करते हैं—उनके निजजन हैं—उन्हें वे स्वर्ग, पृथ्वी अथवा रसातल की सम्पत्तियाँ नहीं देते। क्योंकि उनसे परमानन्द की उपलब्धि तो होती ही नहीं; उल्टे द्वेष, उद्वेग, अभिमान, मानसिक पीड़ा, कलह, दु:ख और परिश्रम ही हाथ लगते हैं ॥ २२ ॥ इन्द्र ! हमारे स्वामी अपने भक्तके अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी प्रयासको व्यर्थ कर दिया करते हैं और सच पूछो तो इसीसे भगवान्‌ की कृपाका अनुमान होता है। क्योंकि उनका ऐसा कृपा-प्रसाद अकिञ्चन भक्तोंके लिये ही अनुभवगम्य है, दूसरोंके लिये तो अत्यन्त दुर्लभ ही है ॥ २३ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

अन्येऽनु ये त्वेह नृशंसमज्ञा 
     ये ह्युद्यतास्त्राः प्रहरन्ति मह्यम् । 
तैर्भूतनाथान् सगणान् निशात 
     त्रिशूलनिर्भिन्नगलैर्यजामि ॥ १७ ॥
अथो हरे मे कुलिशेन वीर 
     हर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह । 
तत्रानृणो भूतबलिं विधाय 
     मनस्विनां पादरजः प्रपत्स्ये ॥ १८ ॥
सुरेश कस्मान्न हिनोषि वज्रं 
     पुरः स्थिते वैरिणि मय्यमोघम् । 
मा संशयिष्ठा न गदेव वज्रः 
     स्यान्निष्फलः कृपणार्थेव याच्ञा ॥ १९ ॥

ये अज्ञानी देवता तेरे-जैसे नीच और क्रूर के अनुयायी बनकर मुझपर शस्त्रों से प्रहार कर रहे हैं। मैं अपने तीखे त्रिशूल से उनकी गरदन काट डालूँगा और उनके द्वारा गणों के सहित भैरवादि भूतनाथों को बलि चढ़ाऊँगा ॥ १७ ॥ वीर इन्द्र ! यह भी सम्भव है कि तू मेरी सेना को छिन्न-भिन्न करके अपने वज्र से मेरा सिर काट ले। तब तो मैं अपने शरीर की बलि पशु-पक्षियों को समर्पित करके, कर्मबन्धन से मुक्त हो महापुरुषों की चरण-रज का आश्रय ग्रहण करूँगा—जिस लोक में महापुरुष जाते हैं, वहाँ पहुँच जाऊँगा ॥ १८ ॥ देवराज ! मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, तेरा शत्रु हूँ; अब तू मुझ पर अपना अमोघ वज्र क्यों नहीं छोड़ता ? तू यह सन्देह न कर कि जैसे तेरी गदा निष्फल हो गयी, कृपण पुरुष से की हुई याचना के समान यह वज्र भी वैसे ही निष्फल हो जायगा ॥ १९ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

श्रीवृत्र उवाच

दिष्ट्या भवान् मे समवस्थितो रिपुः 
     यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृहा च । 
दिष्ट्यानृणोऽद्याहमसत्तम त्वया 
     मच्छूलनिर्भिन्न दृषद्‌धृदाचिरात् ॥ १४ ॥ 
यो नोऽग्रजस्यात्मविदो द्विजातेः 
     गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य । 
विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्चय् 
     पशोरिवाकरुणः स्वर्गकामः ॥ १५ ॥
ह्रीश्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां 
     स्वकर्मणा पुरुषादैश्च गर्ह्यम् । 
कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्नदेहं 
     अस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्राः ॥ १६ ॥

वृत्रासुर बोला—आज मेरे लिये बड़े सौभाग्य का दिन है कि तुम्हारे-जैसा शत्रु—जिसने विश्वरूप के रूपमें ब्राह्मण, अपने गुरु एवं मेरे भाईकी हत्या की है—मेरे सामने खड़ा है। अरे दुष्ट ! अब शीघ्र-से-शीघ्र मैं तेरे पत्थरके समान कठोर हृदयको अपने शूलसे विदीर्ण करके भाईसे उऋण होऊँगा। अहा ! यह मेरे लिये कैसे आनन्दकी बात होगी ॥ १४ ॥ इन्द्र ! तूने मेरे आत्मवेत्ता और निष्पाप बड़े भाईके, जो ब्राह्मण होनेके साथ ही यज्ञमें दीक्षित और तुम्हारा गुरु था, विश्वास दिलाकर तलवारसे तीनों सिर उतार लिये—ठीक वैसे ही जैसे स्वर्गकामी निर्दय मनुष्य यज्ञमें पशुका सिर काट डालता है ॥ १५ ॥ दया, लज्जा, लक्ष्मी और कीर्ति तुझे छोड़ चुकी है। तूने ऐसे-ऐसे नीच कर्म किये हैं, जिनकी निन्दा मनुष्योंकी तो बात ही क्या—राक्षसतक करते हैं। आज मेरे त्रिशूल से तेरा शरीर टूक-टूक हो जायगा। बड़े कष्ट से तेरी मृत्यु होगी। तेरे-जैसे पापी को आग भी नहीं जलायेगी, तुझे तो गीध नोंच-नोंच कर खायेंगे ॥ १६ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३) वृत्रासुर का पूर्वचरित्र रूपौदार्यवयोजन्म विद्यैश्वर...