॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – चौदहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)
मनु आदिके पृथक्-पृथक् कर्मोंका निरूपण
ज्ञानं चानुयुगं ब्रूते हरिः सिद्धस्वरूपधृक् ।
ऋषिरूपधरः कर्म योगं योगेशरूपधृक् ॥ ८ ॥
सर्गं प्रजेशरूपेण दस्यून् हन्यात् स्वराड्वपुः ।
कालरूपेण सर्वेषां अभावाय पृथग्गुणः ॥ ९ ॥
स्तूयमानो जनैरेभिः मायया नामरूपया ।
विमोहितात्मभिर्नाना दर्शनैर्न च दृश्यते ॥ १० ॥
एतत्कल्पविकल्पस्य प्रमाणं परिकीर्तितम् ।
यत्र मन्वन्तराण्याहुः चतुर्दश पुराविदः ॥ ११ ॥
भगवान् युग-युगमें सनक आदि सिद्धोंका रूप धारण करके
ज्ञानका,
याज्ञवल्क्य आदि ऋषियोंका रूप धारण करके कर्मका और
दत्तात्रेय आदि योगेश्वरोंके रूपमें योगका उपदेश करते हैं ॥ ८ ॥ वे मरीचि आदि
प्रजापतियोंके रूपमें सृष्टिका विस्तार करते हैं, सम्राट्के रूपमें लुटेरोंका वध करते हैं और शीत, उष्ण आदि विभिन्न गुणोंको धारण करके कालरूपसे सबको संहारकी ओर ले जाते हैं ॥ ९
॥ नाम और रूपकी मायासे प्राणियोंकी बुद्धि विमूढ़ हो रही है। इसलिये वे अनेक
प्रकारके दर्शनशास्त्रोंके द्वारा महिमा तो भगवान्की ही गाते हैं, परंतु उनके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान पाते ॥ १० ॥
परीक्षित् ! इस प्रकार मैंने तुम्हें महाकल्प और अवान्तर
कल्पका परिमाण सुना दिया। पुराणतत्त्व के विद्वानों ने प्रत्येक अवान्तर कल्प में
चौदह मन्वन्तर बतलाये हैं ॥ ११ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
अष्टमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
जवाब देंहटाएंJay shree Krishna
जवाब देंहटाएं🌹💖🥀जय श्री हरि: 🙏🙏
जवाब देंहटाएंॐ नमो भगवते वासुदेवाय
नारायण नारायण नारायण नारायण