गुरुवार, 14 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण अष्टम स्कन्ध – तेईसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
अष्टम स्कन्ध – तेईसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

बलि का बन्धन से छूटकर सुतल लोक को जाना

श्रीशुक्र उवाच -
कुतस्तत्कर्मवैषम्यं यस्य कर्मेश्वरो भवान् ।
यज्ञेशो यज्ञपुरुषः सर्वभावेन पूजितः ॥ १५ ॥
मंत्रतः तंत्रतः छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः ।
सर्वं करोति निश्छिद्रं अनुसंकीर्तनं तव ॥ १६ ॥
तथापि वदतो भूमन् करिष्याम्यनुशासनम् ।
एतच्छ्रेयः परं पुंसां यत् तवाज्ञा अनुपालनम् ॥ १७ ॥

श्रीशुक उवाच -
अभिनन्द्य हरेराज्ञां उशना भगवानिति ।
यज्ञच्छिद्रं समाधत्त बलेर्विप्रर्षिभिः सह ॥ १८ ॥
एवं बलेर्महीं राजम् भिक्षित्वा वामनो हरिः ।
ददौ भ्रात्रे महेन्द्राय त्रिदिवं यत्परैर्हृतम् ॥ १९ ॥
प्रजापतिपतिर्ब्रह्मा देवर्षिपितृभूमिपैः ।
दक्षभृग्वङ्‌गिरोमुख्यैः कुमारेण भवेन च ॥ २० ॥
कश्यपस्यादितेः प्रीत्यै सर्वभूतभवाय च ।
लोकानां लोकपालानां अकरोद् वामनं पतिम् ॥ २१ ॥

शुक्राचार्य जी ने कहाभगवन् ! जिसने अपना समस्त कर्म समर्पित करके सब प्रकार से यज्ञेश्वर यज्ञपुरुष आपकी पूजा की हैउसके कर्म में कोई त्रुटि, कोई विषमता कैसे रह सकती है ? ॥ १५ ॥ क्योंकि मन्त्रोंकी , अनुष्ठान-पद्धति की, देश, काल, पात्र और वस्तु की सारी भूलें आपके नामसंकीर्तनमात्रसे सुधर जाती हैं; आपका नाम सारी त्रुटियोंको पूर्ण कर देता है ॥ १६ ॥ तथापि अनन्त ! जब आप स्वयं कह रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञाका अवश्य पालन करूँगा। मनुष्यके लिये सबसे बड़ा कल्याणका साधन यही है कि वह आपकी आज्ञाका पालन करे ॥ १७ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैंभगवान्‌ शुक्राचार्य ने भगवान्‌ श्रीहरिकी यह आज्ञा स्वीकार करके दूसरे ब्रहमर्षियोंके साथ, बलिके यज्ञमें जो कमी रह गयी थी, उसे पूर्ण किया ॥ १८ ॥ परीक्षित्‌ ! इस प्रकार वामनभगवान्‌ ने बलि से पृथ्वी की भिक्षा माँगकर अपने बड़े भाई इन्द्रको स्वर्गका राज्य दिया, जिसे उनके शत्रुओंने छीन लिया था ॥ १९ ॥ इसके बाद प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्माजी ने देवर्षि, पितर, मनु, दक्ष, भृगु, अङ्गिरा, सनत्कुमार और शङ्करजी के साथ कश्यप एवं अदितिकी प्रसन्नताके लिये तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अभ्युदयके लिये समस्त लोक और लोकपालों के स्वामी के पदपर वामन भगवान्‌ का अभिषेक कर दिया ॥ २०-२१ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से




3 टिप्‍पणियां:

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति अन्येऽनु ये ...