॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
पंचम स्कन्ध – उन्नीसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)
किम्पुरुष और भारतवर्षका वर्णन
इदं हि योगेश्वर योगनैपुणं हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत्
यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो भक्त्या दधीतोज्झितदुष्कलेवरः ||१३||
यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन्
शङ्केत विद्वान्कुकलेवरात्ययाद्यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ||१४||
तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां त्वन्माययाहंममतामधोक्षज
भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावमिति ||१५||
योगेश्वर ! हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माजीने योगसाधनकी सबसे बड़ी कुशलता यही बतलायी है कि मनुष्य अन्तकालमें देहाभिमानको छोडक़र भक्तिपूर्वक आपके प्राकृत गुणरहित स्वरूपमें अपना मन लगावे ॥ १३ ॥ लौकिक और पारलौकिक भोगोंके लालची मूढ पुरुष जैसे पुत्र, स्त्री और धनकी चिन्ता करके मौतसे डरते हैं—उसी प्रकार यदि विद्वान को भी इस निन्दनीय शरीरके छूटनेका भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्तिके लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है ॥ १४ ॥ अत: अधोक्षज ! आप हमें अपना स्वाभाविक प्रेमरूप भक्तियोग प्रदान कीजिये, जिससे कि प्रभो ! इस निन्दनीय शरीरमें आपकी मायाके कारण बद्धमूल हुई दुर्भेद्य अहंता-ममताको हम तुरन्त काट डालें’ ॥ १५ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹🩷🥀जय श्रीहरि: !!🙏
जवाब देंहटाएंश्रीराधेकृष्णाभ्याम् नमः
हरि:शरणम् !! हरि:शरणम् !!
हरि:शरणम् !!