॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
पंचम स्कन्ध – बाईसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)
भिन्न-भिन्न ग्रहोंकी स्थिति और गतिका वर्णन
उशनसा बुधो व्याख्यातस्तत उपरिष्टाद् द्विलक्षयोजनतो बुधः सोमसुत उपलभ्यमानः प्रायेण शुभकृद्यदार्काद् व्यतिरिच्येत तदा- तिवाताभ्रप्रायानावृष्ट्यादिभयमाशंसते ॥ १३ ॥
अत ऊर्ध्वमङ्गारकोऽपि योजनलक्षद्वितय उपलभ्यमानस्त्रिभिस्त्रिभिः पक्षैरेकैकशो राशी - न्द्वादशानुभुङ्क्ते यदि न वक्रेणाभिवर्तते प्रायेणा - शुभग्रहोऽघशंसः ॥ १४ ॥
तत उपरिष्टाद् द्विलक्षयोजनान्तरगतो भगवान् बृहस्पतिरेकैकस्मिन् राशौ परिवत्सरं परिवत्सरं चरति यदि न वक्रः स्यात्प्रायेणानुकूलो ब्राह्मण - कुलस्य ॥ १५ ॥
तत उपरिष्टाद्योजनलक्षद्वयात्प्रतीयमानः शनै श्चर एकैकस्मिन् राशौ त्रिंशन्मासान् विलम्बमानः सर्वानेवानुपर्येति तावद्भिरनुवत्सरैः प्रायेण हि सर्वेषामशान्तिकरः ॥ १६ ॥
तत उत्तरस्मादृषय एकादशलक्षयोजनान्तर उपलभ्यन्ते य एव लोकानां शमनुभावयन्तो भगवतो विष्णोर्यत्परमं पदं प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति ॥ १७ ॥
शुक्रकी गतिके साथ-साथ बुधकी भी व्याख्या हो गयी—शुक्रके अनुसार ही बुधकी गति भी समझ लेनी चाहिये। यह चन्द्रमाका पुत्र शुक्रसे दो लाख योजन ऊपर है। यह प्राय: मङ्गलकारी ही है; किन्तु जब सूर्यकी गतिका उल्लङ्घन करके चलता है, तब बहुत अधिक आँधी, बादल और सूखेके भयकी सूचना देता है ॥ १३ ॥ इससे दो लाख योजन ऊपर मङ्गल है। वह यदि वक्रगतिसे न चले तो, एक-एक राशिको तीन-तीन पक्षमें भोगता हुआ बारहों राशियोंको पार करता है। यह अशुभ ग्रह है और प्राय: अमङ्गलका सूचक है ॥ १४ ॥ इसके ऊपर दो लाख योजनकी दूरीपर भगवान् बृहस्पतिजी हैं। ये यदि वक्रगतिसे न चलें, तो एक-एक राशिको एक-एक वर्षमें भोगते हैं। ये प्राय: ब्राह्मणकुलके लिये अनुकूल रहते हैं ॥ १५ ॥
बृहस्पतिसे दो लाख योजन ऊपर शनैश्चर दिखायी देते हैं। ये तीस-तीस महीनेतक एक-एक राशिमें रहते हैं। अत: इन्हें सब राशियोंको पार करनेमें तीस वर्ष लग जाते हैं। ये प्राय: सभीके लिये अशान्तिकारक हैं ॥ १६ ॥ इनके ऊपर ग्यारह लाख योजनकी दूरीपर कश्यपादि सप्तर्षि दिखायी देते हैं। ये सब लोकोंकी मङ्गल-कामना करते हुए भगवान् विष्णुके परम पद ध्रुवलोककी प्रदक्षिणा किया करते हैं ॥ १७ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ज्योतिश्चक्रवर्णने द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
🌺💐🌺ॐश्रीपरमात्मने नमः
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