बुधवार, 28 जनवरी 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध बाईसवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
पंचम स्कन्ध – बाईसवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

भिन्न-भिन्न ग्रहोंकी स्थिति और गतिका वर्णन

तत उपरिष्टात्त्रिलक्षयोजनतो नक्षत्राणि मेरुं दक्षिणेनैव कालायन ईश्वरयोजितानि सहाभि- जिताष्टाविंशतिः ॥ ११ ॥ 
तत उपरिष्टादुशना द्विलक्षयोजनत उपलभ्यते पुरतः पश्चात्सहैव वार्कस्य शैघ्र्यमान्द्यसाम्याभि- र्गतिभिरर्कवच्चरति लोकानां नित्यदानुकूल एव प्रायेण वर्षयंश्चारेणानुमीयते स वृष्टिविष्टम्भ- ग्रहोपशमनः ॥ १२ ॥ 

चन्द्रमासे तीन लाख योजन ऊपर अभिजित्के सहित अट्ठाईस नक्षत्र हैं। भगवान्‌ने इन्हें कालचक्रमें नियुक्त कर रखा है, अत: ये मेरुको दायीं ओर रखकर घूमते रहते हैं ॥ ११ ॥ इनसे दो लाख योजन ऊपर शुक्र दिखायी देता है। यह सूर्यकी शीघ्र, मन्द और समान गतियोंके अनुसार उन्हींके समान कभी आगे, कभी पीछे और कभी साथ-साथ रहकर चलता है। यह वर्षा करानेवाला ग्रह है, इसलिये लोकोंको प्राय: सर्वदा ही अनुकूल रहता है। इसकी गतिसे ऐसा अनुमान होता है कि यह वर्षा रोकनेवाले ग्रहोंको शान्त कर देता है ॥ १२ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌺💐🌺ॐश्रीपरमात्मने नमः
    नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!
    जय श्रीकृष्ण गोविंद 🙏

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श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध चौबीसवां अध्याय..(पोस्ट०७)

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