॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सातवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)
बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओं का त्याग और विश्वरूप का देवगुरु के रूप में वरण
श्रीबादरायणिरुवाच
तेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्वरूपो महातपाः
पौरोहित्यं वृतश्चक्रे परमेण समाधिना ||३८||
सुरद्विषां श्रियं गुप्तामौशनस्यापि विद्यया
आच्छिद्यादान्महेन्द्राय वैष्णव्या विद्यया विभुः ||३९||
यया गुप्तः सहस्राक्षो जिग्येऽसुरचमूर्विभुः
तां प्राह स महेन्द्राय विश्वरूप उदारधीः ||४०||
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित् ! विश्वरूप बड़े तपस्वी थे। देवताओं से ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगन के साथ उनकी पुरोहिती करने लगे ॥ ३८ ॥ यद्यपि शुक्राचार्य ने अपने नीतिबल से असुरों की सम्पत्ति सुरक्षित कर दी थी, फिर भी समर्थ विश्वरूप ने वैष्णवी विद्या के प्रभाव से उनसे वह सम्पत्ति छीनकर देवराज इन्द्रको दिला दी ॥ ३९ ॥ राजन् ! जिस विद्या से सुरक्षित होकर इन्द्रने असुरों की सेनापर विजय प्राप्त की थी, उसका उदारबुद्धि विश्वरूप ने ही उन्हें उपदेश किया था ॥ ४० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः
शेष आगामी पोस्ट में --
🌹💟🥀ॐश्रीपरमात्मने नमः🙏
जवाब देंहटाएंश्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
हे नाथ नारायण वासुदेव: !!