गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश

श्रीअङ्‌गिरा उवाच - 

अहं ते पुत्रकामस्य पुत्रदोऽस्म्यङ्‌गिरा नृप । 
एष ब्रह्मसुतः साक्षात् नारदो भगवान् ऋषिः ॥ १७ ॥
इत्थं त्वां पुत्रशोकेन मग्नं तमसि दुस्तरे । 
अतदर्हमनुस्मृत्य महापुरुषगोचरम् ॥ १८ ॥
अनुग्रहाय भवतः प्राप्तौ आवां इह प्रभो । 
ब्रह्मण्यो भगवद्‍भक्तो नावसीदितुमर्हसि ॥ १९ ॥
तदैव ते परं ज्ञानं ददामि गृहमागतः । 
ज्ञात्वान्याभिनिवेशं ते पुत्रमेव ददावहम् ॥ २० ॥
अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । 
एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २१ ॥
शब्दादयश्च विषयाः चला राज्यविभूतयः । 
मही राज्यं बलं कोशो भृत्यामात्याः सुहृज्जनाः ॥ २२ ॥

महर्षि अङ्गिराने कहा—राजन् ! जिस समय तुम पुत्रके लिये बहुत लालायित थे, तब मैंने ही तुम्हें पुत्र दिया था। मैं अङ्गिरा हूँ। ये जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, स्वयं ब्रह्माजीके पुत्र सर्वसमर्थ देवर्षि नारद हैं ॥ १७ ॥ जब हमलोगोंने देखा कि तुम पुत्रशोकके कारण बहुत ही घने अज्ञानान्धकारमें डूब रहे हो, तब सोचा कि तुम भगवान्‌के भक्त हो, शोक करनेयोग्य नहीं हो। अत: तुमपर अनुग्रह करनेके लिये ही हम दोनों यहाँ आये हैं। राजन् ! सच्ची बात तो यह है कि जो भगवान्‌ और ब्राह्मणोंका भक्त है, उसे किसी अवस्थामें शोक नहीं करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम ज्ञानका उपदेश देता; परंतु मैंने देखा कि अभी तो तुम्हारे हृदयमें पुत्रकी उत्कट लालसा है, इसलिये उस समय तुम्हें ज्ञान न देकर मैंने पुत्र ही दिया ॥ २० ॥ अब तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो कि पुत्रवानोंको कितना दु:ख होता है। यही बात स्त्री, घर, धन, विविध प्रकार के ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ, शब्द-रूप-रस आदि विषय, राज्यवैभव, पृथ्वी, राज्य, सेना, खजाना, सेवक, अमात्य, सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सब के लिये है; क्योंकि ये सब-के-सब अनित्य हैं ॥ २१-२२ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – पंद्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५) चित्रकेतु को अङ्गिरा और नारदजी का उपदेश सर्वेऽपि श...