सोमवार, 11 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

श्रीपार्वति उवाच - 

अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः । 
अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत् ॥ ११ ॥
न वेद धर्मं किल पद्मयोनिः 
     न ब्रह्मपुत्रा भृगुनारदाद्याः । 
न वै कुमारः कपिलो मनुश्च 
     ये नो निषेधन्त्यतिवर्तिनं हरम् ॥ १२ ॥
एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं 
     जगद्‍गुरुं मङ्‌गलमङ्‌गलं स्वयम् । 
यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन् 
     प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड्यः ॥ १३ ॥
नायमर्हति वैकुण्ठ पादमूलोपसर्पणम् । 
सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम् ॥ १४ ॥
अतः पापीयसीं योनिं आसुरीं याहि दुर्मते । 
यथेह भूयो महतां न कर्ता पुत्र किल्बिषम् ॥ १५ ॥

पार्वतीजी बोलीं—अहो ! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या ? ॥ ११ ॥ जान पड़ता है कि ब्रह्माजी, भृगु, नारद आदि उनके पुत्र, सनकादि परमर्षि, कपिलदेव और मनु आदि बड़े-बड़े महापुरुष धर्मका रहस्य नहीं जानते। तभी तो वे धर्ममर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाले भगवान्‌ शिव को इस कामसे नहीं रोकते ॥ १२ ॥ ब्रह्मा आदि समस्त महापुरुष जिनके चरणकमलों का ध्यान करते रहते हैं, उन्हीं मङ्गलों को मङ्गल बनाने वाले साक्षात् जगद्गुरु भगवान्‌ का और उनके अनुयायी महात्माओं का इस अधम क्षत्रिय ने तिरस्कार किया है और शासन करनेकी चेष्टा की है। इसलिये यह ढीठ सर्वथा दण्डका पात्र है ॥ १३ ॥ इसे अपने बड़प्पनका घमंड है। यह मूर्ख भगवान्‌ श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं ॥ १४ ॥ [चित्रकेतु को सम्बोधन कर] अत: दुर्मते ! तुम पापमय असुरयोनिमें जाओ। ऐसा होनेसे बेटा ! तुम फिर कभी किसी महापुरुषका अपराध नहीं कर सकोगे ॥ १५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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