गुरुवार, 14 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सत्रहवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

चित्रकेतु को पार्वतीजी का शाप

वासुदेवे भगवति भक्तिं उद्वहतां नृणाम् । 
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां न हि कश्चिद्व्यपाश्रयः ॥ ३१ ॥
नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ 
     न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः । 
विदाम यस्येहितमंशकांशका 
     न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः ॥ ३२ ॥
न ह्यस्यास्ति प्रियः कश्चित् नाप्रियः स्वः परोऽपि वा । 
आत्मत्वात् सर्वभूतानां सर्वभूतप्रियो हरिः ॥ ३३ ॥
तस्य चायं महाभागः चित्रकेतुः प्रियोऽनुगः । 
सर्वत्र समदृक् शान्तो ह्यहं चैवाच्युतप्रियः ॥ ३४ ॥
तस्मान्न विस्मयः कार्यः पुरुषेषु महात्मसु । 
महापुरुषभक्तेषु शान्तेषु समदर्शिषु ॥ ३५ ॥

जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान्‌ वासुदेव के चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत् में  ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें ॥ ३१ ॥ मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े-बड़े देवता—कोई भी भगवान्‌की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते। ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे-से-नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं ? ॥ ३२ ॥ भगवान्‌को न कोई प्रिय है और न अप्रिय। उनका न कोई अपना है और न पराया। वे सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये सभी प्राणियोंके प्रियतम हैं ॥ ३३ ॥ प्रिये ! यह परम भाग्यवान् चित्रकेतु उन्हींका प्रिय अनुचर, शान्त एवं समदर्शी है और मैं भी भगवान्‌ श्रीहरिका ही प्रिय हूँ ॥ ३४ ॥ इसलिये तुम्हें भगवान्‌ के प्यारे भक्त, शान्त, समदर्शी, महात्मा पुरुषोंके सम्बन्धमें किसी प्रकारका आश्चर्य नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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