रविवार, 3 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि । 
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्‌कर्षणाय च ॥ १८ ॥
नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये । 
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ॥ १९ ॥
आत्मानन्दानुभूत्यैव न्यस्तशक्त्यूर्मये नमः । 
हृषीकेशाय महते नमस्ते विश्वमूर्तये ॥ २० ॥
वचस्युपरतेऽप्राप्य य एको मनसा सह । 
अनामरूपश्चिन्मात्रः सोऽव्यान्नः सदसत्परः ॥ २१ ॥

(देवर्षि नारदने यों उपदेश किया—) ‘ॐकारस्वरूप भगवन् ! आप वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और सङ्कर्षणके रूपमें क्रमश: चित्त, बुद्धि, मन और अहंकारके अधिष्ठाता हैं। मैं आपके इस चतुर्व्यूहरूप का बार-बार नमस्कारपूर्वक ध्यान करता हूँ ॥ १८ ॥ आप विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हैं। आपकी मूर्ति परमानन्दमयी है। आप अपने स्वरूपभूत आनन्दमें ही मग्र और परम शान्त हैं। द्वैतदृष्टि आपको छूतक नहीं सकती। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १९ ॥ अपने स्वरूपभूत आनन्दकी अनुभूतिसे ही आपने मायाजनित राग-द्वेष आदि दोषोंका तिरस्कार कर रखा है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सबकी समस्त इन्द्रियोंके प्रेरक, परम महान् और विराट्स्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ २० ॥ मनसहित वाणी आपतक न पहुँचकर बीच से ही लौट आती है। उसके उपरत हो जानेपर जो अद्वितीय, नाम-रूपरहित, चेतनमात्र और कार्य-कारण से परे की वस्तु रह जाती है—वह हमारी रक्षा करे ॥ २१ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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