रविवार, 3 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते । 
मृण्मयेष्विव मृज्जातिः तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥
यन्न स्पृशन्ति न विदुः मनोबुद्धीन्द्रियासवः । 
अन्तर्बहिश्च विततं व्योमवत् तन्नतोऽस्म्यहम् ॥ २३ ॥
देहेन्द्रियप्राणमनोधियोऽमी 
     यदंशविद्धाः प्रचरन्ति कर्मसु । 
नैवान्यदा लौहमिवाप्रतप्तं 
     स्थानेषु तद्द्रष्ट्रपदेशमेति ॥ २४ ॥
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय 
महाविभूतिपतये सकलसात्वत परिवृढनिकर 
करकमल कुड्मलोपलालित 
चरणारविन्दयुगल परमपरमेष्ठिन् नमस्ते ॥ २५ ॥ 

यह कार्य-कारणरूप जगत् जिनसे उत्पन्न होता है, जिनमें स्थित है और जिनमें लीन होता है तथा जो मिट्टीकी वस्तुओं में व्याप्त मृत्तिका के समान सबमें ओत-प्रोत हैं—उन परब्रह्मस्वरूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २२ ॥ यद्यपि आप आकाशके समान बाहर-भीतर एकरस व्याप्त हैं, तथापि आपको मन, बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी ज्ञानशक्तिसे नहीं जान सकतीं और प्राण तथा कर्मेन्द्रियाँ अपनी क्रियारूप शक्तिसे स्पर्श भी नहीं कर सकतीं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ २३ ॥ शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्थाओंमें आपके चैतन्यांशसे युक्त होकर ही अपना-अपना काम करते हैं तथा सुषुप्ति और मूर्छा की अवस्थाओंमें आपके चैतन्यांशसे युक्त न होनेके कारण अपना-अपना काम करनेमें असमर्थ हो जाते हैं—ठीक वैसे ही जैसे लोहा अग्रिसे तप्त होनेपर जला सकता है, अन्यथा नहीं। जिसे ‘द्रष्टा’ कहते हैं, वह भी आपका ही एक नाम है; जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें आप उसे स्वीकार कर लेते हैं। वास्तवमें आपसे पृथक् उनका कोई अस्तित्व नहीं है ॥ २४ ॥ ॐकारस्वरूप महाप्रभावशाली महाविभूतिपति भगवान्‌ महापुरुषको नमस्कार है। श्रेष्ठ भक्तोंका समुदाय अपने करकमलोंकी कलियोंसे आपके युगल चरणकमलोंकी सेवामें संलग्न रहता है। प्रभो ! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ’ ॥ २५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


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