शनिवार, 21 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥



श्रीमद्भागवतमहापुराण

नवम स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)



भगवान्‌ श्रीराम की शेष लीलाओं का वर्णन


श्रीशुक उवाच ।

भगवान् आत्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकैः ।

सर्वदेवमयं देवं ईजे आचार्यवान् मखैः ॥ १ ॥

होत्रेऽददाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः ।

अध्वर्यवे प्रतीचीं वा उत्तरां सामगाय सः ॥ २ ॥

आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा ।

मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः ॥ ३ ॥

इत्ययं तदलङ्‌कार वासोभ्यामवशेषितः ।

तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमङ्‌गल्या अवशेषिता ॥ ४ ॥

ते तु ब्राह्मणदेवस्य वात्सल्यं वीक्ष्य संस्तुतम् ।

प्रीताः क्लिन्नधियस्तस्मै प्रत्यर्प्येदं बभाषिरे ॥ ५ ॥

अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्वर ।

यन्नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा ॥ ६ ॥

नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे ।

उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताङ्‌घ्रये ॥ ७ ॥



श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! भगवान्‌ श्रीराम ने गुरु वसिष्ठजी को अपना आचार्य बनाकर उत्तम सामग्रियों से युक्त यज्ञोंके द्वारा अपने-आप ही अपने सर्वदेवस्वरूप स्वयंप्रकाश आत्माका यजन किया ॥ १ ॥ उन्होंने होता को पूर्व दिशा, ब्रह्माको दक्षिण, अध्वर्यु को पश्चिम और उद्गाता को उत्तर दिशा दे दी ॥ २ ॥ उनके बीच में जितनी भूमि बच रही थी, वह उन्होंने आचार्य को दे दी। उनका यह निश्चय था कि सम्पूर्ण भूमण्डल का एकमात्र अधिकारी नि:स्पृह ब्राह्मण ही है ॥ ३ ॥ इस प्रकार सारे भूमण्डल का दान करके उन्होंने अपने शरीरके वस्त्र और अलंकार ही अपने पास रखे। इसी प्रकार महारानी सीताजी के पास भी केवल माङ्गलिक वस्त्र और आभूषण ही बच रहे ॥ ४ ॥ जब आचार्य आदि ब्राह्मणोंने देखा कि भगवान्‌ श्रीराम तो ब्राह्मणोंको ही अपना इष्टदेव मानते हैं, उनके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति अनन्त स्नेह है, तब उनका हृदय प्रेमसे द्रवित हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर सारी पृथ्वी भगवान्‌ को लौटा दी और कहा ॥ ५ ॥ प्रभो ! आप सब लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप तो हमारे हृदयके भीतर रहकर अपनी ज्योति से अज्ञानान्धकार का नाश कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें भला, आपने हमें क्या नहीं दे रखा है ॥ ६ ॥ आपका ज्ञान अनन्त है। पवित्र कीर्तिवाले पुरुषोंमें आप सर्वश्रेष्ठ हैं। उन महात्माओंको, जो किसीको किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाते, आपने अपने चरणकमल दे रखे हैं। ऐसा होने पर भी आप ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानते हैं। भगवन् ! आपके इस रामरूप को हम नमस्कार करते हैं॥ ७ ॥



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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

भ्रात्राभिर्नन्दितः सोऽपि सोत्सवां प्राविशत् पुरीम् ।
प्रविश्य राजभवनं गुरुपत्‍नीः स्वमातरम् ॥ ४६ ॥
गुरून् वयस्यावरजान् पूजितः प्रत्यपूजयत् ।
वैदेही लक्ष्मणश्चैव यथावत् समुपेयतुः ॥ ४७ ॥
पुत्रान् स्वमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोत्थिताः ।
आरोप्याङ्‌केऽभिषिञ्चन्त्यो बाष्पौघैर्विजहुः शुचः ॥ ४८ ॥
जटा निर्मुच्य विधिवत् कुलवृद्धैः समं गुरुः ।
अभ्यषिञ्चद् यथैवेन्द्रं चतुःसिन्धुजलादिभिः ॥ ४९ ॥
एवं कृतशिरःस्नानः सुवासाः स्रग्व्यलंकृतः ।
स्वलंकृतैः सुवासोभिः भ्रातृभिर्भार्यया बभौ ॥ ५० ॥
अग्रहीदासनं भ्रात्रा प्रणिपत्य प्रसादितः ।
प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः ।
जुगोप पितृवद् रामो मेनिरे पितरं च तम् ॥ ५१ ॥
त्रेतायां वर्तमानायां कालः कृतसमोऽभवत् ।
रामे राजनि धर्मज्ञे सर्वभूतसुखावहे ॥ ५२ ॥
वनानि नद्यो गिरयो वर्षाणि द्वीपसिन्धवः ।
सर्वे कामदुघा आसन् प्रजानां भरतर्षभ ॥ ५३ ॥
नाधिव्याधिजराग्लानि दुःखशोकभयक्लमाः ।
मृत्युश्च अनिच्छतां नासीद् रामे राजन्यधोक्षजे ॥ ५४ ॥
एकपत्‍नीव्रतधरो राजर्षिचरितः शुचिः ।
स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत् ॥ ५५ ॥
प्रेम्णानुवृत्त्या शीलेन प्रश्रयावनता सती ।
भिया ह्रिया च भावज्ञा भर्तुः सीताहरन्मनः ॥ ५६ ॥

इस प्रकार भगवान्‌ ने भाइयों का अभिनन्दन स्वीकार करके उनके साथ अयोध्यापुरी में प्रवेश किया। उस समय वह पुरी आनन्दोत्सवसे परिपूर्ण हो रही थी। राजमहलमें प्रवेश करके उन्होंने अपनी माता कौसल्या, अन्य माताओं, गुरुजनों, बराबरके मित्रों और छोटोंका यथायोग्य सम्मान किया तथा उनके द्वारा किया हुआ सम्मान स्वीकार किया। श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीने भी भगवान्‌के साथ-साथ सबके प्रति यथायोग्य व्यवहार किया ॥ ४६-४७ ॥ उस समय जैसे मृतक शरीरमें प्राणोंका सञ्चार हो जाय, वैसे ही माताएँ अपने पुत्रोंके आगमनसे हर्षित हो उठीं। उन्होंने उनको अपनी गोदमें बैठा लिया और अपने आँसुओंसे उनका अभिषेक किया। उस समय उनका सारा शोक मिट गया ॥ ४८ ॥ इसके बाद वसिष्ठजीने दूसरे गुरुजनोंके साथ विधिपूर्वक भगवान्‌ की जटा उतरवायी और बृहस्पतिने जैसे इन्द्रका अभिषेक किया था, वैसे ही चारों समुद्रोंके जल आदिसे उनका अभिषेक किया ॥ ४९ ॥ इस प्रकार सिरसे स्नान करके भगवान्‌ श्रीरामने सुन्दर वस्त्र, पुष्पमालाएँ और अलंकार धारण किये। सभी भाइयों और श्रीजानकीजीने भी सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और अलंकार धारण किये। उनके साथ भगवान्‌ श्रीरामजी अत्यन्त शोभायमान हुए ॥ ५० ॥ भरतजीने उनके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रसन्न किया और उनके आग्रह करनेपर भगवान्‌ श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार किया। इसके बाद वे अपने-अपने धर्ममें तत्पर तथा वर्णाश्रमके आचारको निभानेवाली प्रजाका पिताके समान पालन करने लगे। उनकी प्रजा भी उन्हें अपना पिता ही मानती थी ॥ ५१ ॥ परीक्षित्‌ ! जब समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले परम धर्मज्ञ भगवान्‌ श्रीराम राजा हुए तब था तो त्रेतायुग, परंतु मालूम होता था मानो सत्ययुग ही है ॥ ५२ ॥ परीक्षित्‌ ! उस समय वन, नदी, पर्वत, वर्ष, द्वीप और समुद्रसब-के-सब प्रजाके लिये कामधेनुके समान समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले बन रहे थे ॥ ५३ ॥ इन्द्रियातीत भगवान्‌ श्रीरामके राज्य करते समय किसीको मानसिक चिन्ता या शारीरिक रोग नहीं होते थे। बुढ़ापा, दुर्बलता, दु:ख, शोक, भय और थकावट नाममात्रके लिये भी नहीं थे। यहाँतक कि जो मरना नहीं चाहते थे, उनकी मृत्यु भी नहीं होती थी ॥ ५४ ॥ भगवान्‌ श्रीराम ने एकपत्नी का व्रत धारण कर रखा था, उनके चरित्र अत्यन्त पवित्र एवं राजर्षियोंके-से थे। वे गृहस्थोचित स्वधर्मकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं उस धर्मका आचरण करते थे ॥ ५५ ॥ सतीशिरोमणि सीताजी अपने पतिके हृदयका भाव जानती रहतीं। वे प्रेमसे, सेवासे, शीलसे, अत्यन्त विनय से तथा अपनी बुद्धि और लज्जा आदि गुणों से अपने पति भगवान्‌ श्रीरामजी का चित्त चुराती रहती थीं ॥ ५६ ॥

इति श्रीमद्‍भागवते महापुराणे पारमहंस्यां
संहितायां नवमस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

उपगीयमानचरितः शतधृत्यादिभिर्मुदा ।
गोमूत्रयावकं श्रुत्वा भ्रातरं वल्कलाम्बरम् ॥ ३४ ॥
महाकारुणिकोऽतप्यत् जटिलं स्थण्डिलेशयम् ।
भरतः प्राप्तमाकर्ण्य पौरामात्यपुरोहितैः ॥ ३५ ॥
पादुके शिरसि न्यस्य रामं प्रत्युद्यतोऽग्रजम् ।
नन्दिग्रामात् स्वशिबिराद् गीतवादित्रनिःस्वनैः ॥ ३६ ॥
ब्रह्मघोषेण च मुहुः पठद्‌भिः ब्रह्मवादिभिः ।
स्वर्णकक्षपताकाभिः हैमैश्चित्रध्वजै रथैः ॥ ३७ ॥
सदश्वै रुक्मसन्नाहैः भटैः पुरटवर्मभिः ।
श्रेणीभिर्वारमुख्याभिः भृत्यैश्चैव पदानुगैः ॥ ३८ ॥
पारमेष्ठ्यान्युपादाय पण्यान्युच्चावचानि च ।
पादयोर्न्यपतत् प्रेम्णा प्रक्लिन्नहृदयेक्षणः ॥ ३९ ॥
पादुके न्यस्य पुरतः प्राञ्जलिर्बाष्पलोचनः ।
तमाश्लिष्य चिरं दोर्भ्यां स्नापयन् नेत्रजैर्जलैः ॥ ४० ॥
रामो लक्ष्मणसीताभ्यां विप्रेभ्यो येऽर्हसत्तमाः ।
तेभ्यः स्वयं नमश्चक्रे प्रजाभिश्च नमस्कृतः ॥ ४१ ॥
धुन्वन्त उत्तरासङ्‌गान् पतिं वीक्ष्य चिरागतम् ।
उत्तराः कोसला माल्यैः किरन्तो ननृतुर्मुदा ॥ ४२ ॥
पादुके भरतोऽगृह्णात् चामरव्यजनोत्तमे ।
विभीषणः ससुग्रीवः श्वेतच्छत्रं मरुत्सुतः ॥ ४३ ॥
धनुर्निषङ्‌गान् शत्रुघ्नः सीता तीर्थकमण्डलुम् ।
अबिभ्रदङ्‌गदः खड्गं हैमं चर्मर्क्षराण् नृप ॥ ४४ ॥
पुष्पकस्थोऽन्वितः स्त्रीभिः स्तूयमानश्च वन्दिभिः ।
विरेजे भगवान् राजन् ग्रहैश्चन्द्र इवोदितः ॥ ४५ ॥

इधर तो ब्रह्मा आदि बड़े आनन्द से भगवान्‌ की लीलाओं का गान कर रहे थे और उधर जब भगवान्‌ को यह मालूम हुआ कि भरतजी केवल गोमूत्र में पकाया हुआ जौका दलिया खाते हैं, वल्कल पहनते हैं और पृथ्वीपर डाभ बिछाकर सोते हैं एवं उन्होंने जटाएँ बढ़ा रखी हैं, तब वे बहुत दुखी हुए। उनकी दशाका स्मरण कर परम करुणाशील भगवान्‌ का हृदय भर आया। जब भरतको मालूम हुआ कि मेरे बड़े भाई भगवान्‌ श्रीरामजी आ रहे हैं, तब वे पुरवासी, मन्त्री और पुरोहितोंको साथ लेकर एवं भगवान्‌ की पादुकाएँ सिरपर रखकर उनकी अगवानीके लिये चले। जब भरतजी अपने रहनेके स्थान नन्दिग्राम से चले, तब लोग उनके साथ-साथ मङ्गलगान करते, बाजे बजाते चलने लगे। वेदवादी ब्राह्मण बार-बार वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे और उसकी ध्वनि चारों ओर गूँजने लगी। सुनहरी कामदार पताकाएँ फहराने लगीं। सोनेसे मढ़े हुए तथा रंग-बिरंगी ध्वजाओंसे सजे हुए रथ, सुनहले साजसे सजाये हुए सुन्दर घोड़े तथा सोनेके कवच पहने हुए सैनिक उनके साथ-साथ चलने लगे। सेठ-साहूकार, श्रेष्ठ वाराङ्गनाएँ, पैदल चलनेवाले सेवक और महाराजाओंके योग्य छोटी-बड़ी सभी वस्तुएँ उनके साथ चल रही थीं। भगवान्‌को देखते ही प्रेमके उद्रेकसे भरतजीका हृदय गद्गद हो गया, नेत्रोंमें आँसू छलक आये, वे भगवान्‌के चरणोंपर गिर पड़े ॥ ३४३९ ॥ उन्होंने प्रभुके सामने उनकी पादुकाएँ रख दीं और हाथ जोडक़र खड़े हो गये। नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहती जा रही थी। भगवान्‌ने अपने दोनों हाथोंसे पकडक़र बहुत देरतक भरतजीको हृदयसे लगाये रखा। भगवान्‌के नेत्रजलसे भरतजीका स्नान हो गया ॥ ४० ॥ इसके बाद सीताजी और लक्ष्मणजीके साथ भगवान्‌ श्रीरामजीने ब्राह्मण और पूजनीय गुरुजनों को नमस्कार किया तथा सारी प्रजा ने बड़े प्रेमसे सिर झुकाकर भगवान्‌ के चरणों में प्रणाम किया ॥ ४१ ॥ उस समय उत्तरकोसल देश की रहनेवाली समस्त प्रजा अपने स्वामी भगवान्‌ को बहुत दिनों के बाद आये देख अपने दुपट्टे हिला-हिलाकर पुष्पों की वर्षा करती हुई आनन्द से नाचने लगी ॥ ४२ ॥ भरतजी ने भगवान्‌ की पादुकाएँ लीं, विभीषणने श्रेष्ठ चँवर, सुग्रीव ने पंखा और श्रीहनूमान् जी ने श्वेत छत्र ग्रहण किया ॥ ४३ ॥ परीक्षित्‌ ! शत्रुघ्न जी ने धनुष और तरकस, सीताजी ने तीर्थों के जल से भरा कमण्डलु, अंगद ने सोने का खड्ग और जाम्बवान् ने  ढाल ले ली ॥ ४४ ॥ इन लोगों के साथ भगवान्‌ पुष्पक विमानपर विराजमान हो गये, चारों तरफ यथास्थान स्त्रियाँ बैठ गयीं, वन्दीजन स्तुति करने लगे। उस समय पुष्पक विमान पर भगवान्‌ श्रीराम की ऐसी शोभा हुई, मानो ग्रहों के साथ चन्द्रमा उदय हो रहे हों॥४५॥

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गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

श्रीशुक उवाच ।
स्वानां विभीषणश्चक्रे कोसलेन्द्रानुमोदितः ।
पितृमेधविधानेन यदुक्तं सांपरायिकम् ॥ २९ ॥
ततो ददर्श भगवान् अशोकवनिकाश्रमे ।
क्षामां स्वविरहव्याधिं शिंशपामूलमास्थिताम् ॥ ३० ॥
रामः प्रियतमां भार्यां दीनां वीक्ष्यान्वकंपत ।
आत्मसंदर्शनाह्लाद विकसन् मुखपंकजाम् ॥ ३१ ॥
आरोप्यारुरुहे यानं भ्रातृभ्यां हनुमद्युतः ।
विभीषणाय भगवान् दत्त्वा रक्षोगणेशताम् ॥ ३२ ॥
लंकामायुश्च कल्पान्तं ययौ चीर्णव्रतः पुरीम् ।
अवकीर्यमाणः कुसुमैः लोकपालार्पितैः पथि ॥ ३३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैंपरीक्षित्‌ ! कोसलाधीश भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे विभीषण ने अपने स्वजन-सम्बन्धियों का पितृयज्ञ की विधि से शास्त्रके अनुसार अन्त्येष्टिकर्म किया ॥ २९ ॥ इसके बाद भगवान्‌ श्रीराम ने अशोकवाटिका के आश्रममें अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुई श्रीसीताजी को देखा। वे उन्हींके विरहकी व्याधिसे पीडि़त एवं अत्यन्त दुर्बल हो रही थीं ॥ ३० ॥ अपनी प्राणप्रिया अर्धाङ्गिनी श्रीसीताजी को अत्यन्त दीन-अवस्थामें देखकर श्रीरामका हृदय प्रेम और कृपासे भर आया। इधर भगवान्‌ का दर्शन पाकर सीताजीका हृदय प्रेम और आनन्दसे परिपूर्ण हो गया, उनका मुखकमल खिल उठा ॥ ३१ ॥ भगवान्‌ ने विभीषण को राक्षसोंका स्वामित्व, लङ्कापुरीका राज्य और एक कल्पकी आयु दी और इसके बाद पहले सीताजीको विमानपर बैठाकर अपने दोनों भाई लक्ष्मण तथा सुग्रीव एवं सेवक हनूमान् जी के साथ स्वयं भी विमानपर सवार हुए। इस प्रकार चौदह वर्षका व्रत पूरा हो जानेपर उन्होंने अपने नगरकी यात्रा की। उस समय मार्गमें ब्रह्मा आदि लोकपालगण उनपर बड़े प्रेमसे पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ३२-३३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

ततो निष्क्रम्य लंकाया यातुधान्यः सहस्रशः ।
मन्दोदर्या समं तस्मिन् प्ररुदन्त्य उपाद्रवन् ॥ २४ ॥
स्वान् स्वान् बन्धून् परिष्वज्य लक्ष्मणेषुभिरर्दितान् ।
रुरुदुः सुस्वरं दीना घ्नन्त्य आत्मानमात्मना ॥ २५ ॥
हा हताः स्म वयं नाथ लोकरावण रावण ।
कं यायाच्छरणं लंका त्वद्विहीना परार्दिता ॥ २६ ॥
न वै वेद महाभाग भवान् कामवशं गतः ।
तेजोऽनुभावं सीताया येन नीतो दशामिमाम् ॥ २७ ॥
कृतैषा विधवा लंका वयं च कुलनन्दन ।
देहः कृतोऽन्नं गृध्राणां आत्मा नरकहेतवे ॥ २८ ॥

तदनन्तर हजारों राक्षसियाँ मन्दोदरीके साथ रोती हुर्ई लङ्कासे निकल पड़ीं और रणभूमिमें आयीं ॥ २४ ॥ उन्होंने देखा कि उनके स्वजन-सम्बन्धी लक्ष्मणजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर पड़े हुए हैं। वे अपने हाथों अपनी छाती पीट-पीटकर और अपने सगे-सम्बन्धियोंको हृदयसे लगा- लगाकर ऊँचे स्वरसे विलाप करने लगीं ॥ २५ ॥ हाय-हाय ! स्वामी ! आज हम सब बेमौत मारी गयीं। एक दिन वह था, जब आपके भयसे समस्त लोकोंमें त्राहि-त्राहि मच जाती थी। आज वह दिन आ पहुँचा कि आपके न रहनेसे हमारे शत्रु लङ्काकी दुर्दशा कर रहे हैं और यह प्रश्न उठ रहा है कि अब लङ्का किसके अधीन रहेगी ॥ २६ ॥ आप सब प्रकारसे सम्पन्न थे, किसी भी बातकी कमी न थी। परंतु आप कामके वश हो गये और यह नहीं सोचा कि सीताजी कितनी तेजस्विनी हैं और उनका कितना प्रभाव है। आपकी यही भूल आपकी इस दुर्दशाका कारण बन गयी ॥ २७ ॥ कभी आपके कामोंसे हम सब और समस्त राक्षसवंश आनन्दित होता था और आज हम सब तथा यह सारी लङ्का नगरी विधवा हो गयी। आपका वह शरीर, जिसके लिये आपने सब कुछ कर डाला, आज गीधोंका आहार बन रहा है और अपने आत्मा को आपने नरक का अधिकारी बना डाला। यह सब आपकी ही नासमझी और कामुकताका फल है ॥ २८ ॥

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बुधवार, 18 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

रक्षःपतिः स्वबलनष्टिमवेक्ष्य रुष्ट ।
आरुह्य यानकमथाभिससार रामम् ॥
स्वःस्यन्दने द्युमति मातलिनोपनीते ।
विभ्राजमानमहनन्निशितैः क्षुरप्रैः ॥ २१ ॥
रामस्तमाह पुरुषादपुरीष यन्नः ।
कान्तासमक्षमसतापहृता श्ववत् ते ॥
त्यक्तत्रपस्य फलमद्य जुगुप्सितस्य ।
यच्छामि काल इव कर्तुरलंघ्यवीर्यः ॥ २२ ॥
एवं क्षिपन्धनुषि संधितमुत्ससर्ज ।
बाणं स वज्रमिव तद्‌हृदयं बिभेद ॥
सोऽसृग् वमन् दशमुखैर्न्यपतद् विमानाद् ।
हाहेति जल्पति जने सुकृतीव रिक्तः ॥ २३ ॥

जब राक्षसराज रावणने देखा कि मेरी सेनाका तो नाश हुआ जा रहा है, तब वह क्रोध में भरकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो भगवान्‌ श्रीरामके सामने आया। उस समय इन्द्रका सारथि मातलि बड़ा ही तेजस्वी दिव्य रथ लेकर आया और उसपर भगवान्‌ श्रीरामजी विराजमान हुए। रावण अपने तीखे बाणों से उनपर प्रहार करने लगा ॥ २१ ॥ भगवान्‌ श्रीरामजी ने रावण से कहा—‘नीच राक्षस ! तुम कुत्तेकी तरह हमारी अनुपस्थितिमें हमारी प्राणप्रिया पत्नीको हर लाये। तुमने दुष्टताकी हद कर दी ! तुम्हारे-जैसा निर्लज्ज तथा निन्दनीय और कौन होगा। जैसे कालको कोई टाल नहीं सकताकर्तापनके अभिमानीको वह फल दिये बिना रह नहीं सकता, वैसे ही आज मैं तुम्हें तुम्हारी करनीका फल चखाता हूँ॥ २२ ॥ इस प्रकार रावणको फटकारते हुए भगवान्‌ श्रीरामने अपने धनुषपर चढ़ाया हुआ बाण उसपर छोड़ा। उस बाणने वज्रके समान उसके हृदयको विदीर्ण कर दिया। वह अपने दसों मुखोंसे खून उगलता हुआ विमानसे गिर पड़ाठीक वैसे ही, जैसे पुण्यात्मालोग भोग समाप्त होनेपर स्वर्गसे गिर पड़ते हैं। उस समय उसके पुरजन-परिजन हाय-हायकरके चिल्लाने लगे ॥ २३ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

बद्ध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः ।
सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्‌गैः ॥
सुग्रीवनीलहनुमत् प्रमुखैरनीकैः ।
लङ्‌कां विभीषणदृशाविशदग्रदग्धाम् ॥ १६ ॥
सा वानरेन्द्रबलरुद्धविहारकोष्ठ ।
श्रीद्वारगोपुरसदोवलभीविटङ्‌का ॥
निर्भज्यमानधिषणध्वजहेमकुम्भ ।
श्रृङ्‌गाटका गजकुलैर्ह्रदिनीव घूर्णा ॥ १७ ॥
रक्षःपतिस्तदवलोक्य निकुम्भकुम्भ ।
धूम्राक्ष दुर्मुख सुरान्तनरान्तकादीन् ॥
पुत्रं प्रहस्त मतिकाय विकम्पनादीन् ।
सर्वानुगान् समहिनोदथ कुम्भकर्णम् ॥ १८ ॥
तां यातुधानपृतनामसिशूलचाप ।
प्रासर्ष्टिशक्तिशरतोमर खड्गदुर्गाम् ॥
सुग्रीवलक्ष्मण मरुत्सुतगन्धमाद ।
नीलाङ्‌गदर्क्षपनसादिभिः अन्वितोऽगात् ॥ १९ ॥
तेऽनीकपा रघुपतेरभिपत्य सर्वे ।
द्वन्द्वं वरूथमिभपत्तिरथाश्वयोधैः ॥
जघ्नुर्द्रुमैः गिरिगदेषुभिरङ्‌गदाद्याः ।
सीताभिमर्षहतमङ्‌गल रावणेशान् ॥ २० ॥

भगवान्‌ श्रीरामजी ने अनेकानेक पर्वतोंके शिखरोंसे समुद्रपर पुल बाँधा। जब बड़े-बड़े बन्दर अपने हाथोंसे पर्वत उठा-उठाकर लाते थे, तब उनके वृक्ष और बड़ी-बड़ी चट्टानें थर-थर काँपने लगती थीं। इसके बाद विभीषणकी सलाहसे भगवान्‌ने सुग्रीव, नील, हनूमान् आदि प्रमुख वीरों और वानरीसेना के साथ लङ्का में प्रवेश किया। वह तो श्रीहनूमान्जीके द्वारा पहले ही जलायी जा चुकी थी ॥ १६ ॥ उस समय वानरराजकी सेनाने लङ्काके सैर करने और खेलनेके स्थान, अन्नके गोदाम, खजाने, दरवाजे, फाटक, सभाभवन, छज्जे और पक्षियों के रहने के स्थान तक को घेर लिया। उन्होंने वहाँकी वेदी, ध्वजाएँ, सोनेके कलश और चौराहे तोड़-फोड़ डाले। उस समय लङ्का ऐसी मालूम पड़ रही थी, जैसे झुंड-के-झुंड हाथियोंने किसी नदीको मथ डाला हो ॥ १७ ॥ यह देखकर राक्षसराज रावणने निकुम्भ, कुम्भ, धूम्राक्ष, दुर्मुख, सुरान्तक, नरान्तक, प्रहस्त, अतिकाय, विकम्पन आदि अपने सब अनुचरों, पुत्र मेघनाद और अन्तमें भाई कुम्भकर्णको भी युद्ध करनेके लिये भेजा ॥ १८ ॥ राक्षसोंकी वह विशाल सेना तलवार, त्रिशूल, धनुष, प्रास, ऋष्टि, शक्ति, बाण, भाले, खड्ग आदि शस्त्र-अस्त्रसे सुरक्षित और अत्यन्त दुर्गम थी। भगवान्‌ श्रीरामने सुग्रीव, लक्ष्मण, हनूमान्, गन्ध-मादन, नील, अंगद, जाम्बवान् और पनस आदि वीरोंको अपने साथ लेकर राक्षसोंकी सेनाका सामना किया ॥ १९ ॥ रघुवंशशिरोमणि भगवान्‌ श्रीरामके अंगद आदि सब सेनापति राक्षसोंकी चतुरङ्गिणी सेनाहाथी, रथ, घुड़सवार और पैदलोंके साथ द्वन्द्वयुद्धकी रीतिसे भिड़ गये और राक्षसोंको वृक्ष, पर्वतशिखर, गदा और बाणोंसे मारने लगे। उनका मारा जाना तो स्वाभाविक ही था। क्योंकि वे उसी रावणके अनुचर थे, जिसका मङ्गल श्रीसीताजीको स्पर्श करनेके कारण पहले ही नष्ट हो चुका था ॥ २० ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से





मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण नवम स्कन्ध –दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
नवम स्कन्ध दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

भगवान्‌ श्रीराम की लीलाओं का वर्णन

दग्ध्वाऽऽत्मकृत्यहतकृत्यमहन् कबन्धं ।
सख्यं विधाय कपिभिर्दयितागतिं तैः ॥
बुद्ध्वाथ वालिनि हते प्लवगेन्द्रसैन्यैः ।
वेलामगात् स मनुजोऽजभवार्चिताङ्‌घ्रि ॥ १२ ॥
यद्रोषविभ्रमविवृत्तकटाक्षपात ।
सम्भ्रान्तनक्रमकरो भयगीर्णघोषः ॥
सिन्धुः शिरस्यर्हणं परिगृह्य रूपी ।
पादारविन्दमुपगम्य बभाष एतत् ॥ १३ ॥
न त्वां वयं जडधियो नु विदाम भूमन् ।
कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम् ॥
यत्सत्त्वतः सुरगणा रजसः प्रजेशा ।
मन्योश्च भूतपतयः स भवान्गुणेशः ॥ १४ ॥
कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं ।
त्रैलोक्य रावणमवाप्नुहि वीर पत्‍नीम् ॥
बध्नीहि सेतुमिह ते यशसो वितत्यै ।
गायन्ति दिग्विजयिनो यमुपेत्य भूपाः ॥ १५ ॥

इसके बाद भगवान्‌ ने उस जटायुका दाह-संस्कार किया, जिसके सारे कर्मबन्धन भगवत्सेवारूप कर्मसे पहले ही भस्म हो चुके थे। फिर भगवान्‌ ने कबन्ध का संहार किया और इसके अनन्तर सुग्रीव आदि वानरोंसे मित्रता करके वालिका वध किया, तदनन्तर वानरोंके द्वारा अपनी प्राणप्रिया का पता लगवाया। ब्रह्मा और शङ्कर जिनके चरणोंकी वन्दना करते हैं, वे भगवान्‌ श्रीराम मनुष्यकी-सी लीला करते हुए बंदरोंकी सेनाके साथ समुद्रतटपर पहुँचे ॥ १२ ॥ (वहाँ उपवास और प्रार्थनासे जब समुद्रपर कोई प्रभाव न पड़ा, तब) भगवान्‌ ने क्रोधकी लीला करते हुए अपनी उग्र एवं टेढ़ी नजर समुद्रपर डाली। उसी समय समुद्रके बड़े-बड़े मगर और कच्छ खलबला उठे। डर जानेके कारण समुद्रकी सारी गर्जना शान्त हो गयी। तब समुद्र शरीरधारी बनकर और अपने सिरपर बहुत-सी भेंटें लेकर भगवान्‌ के चरणकमलों की शरणमें आया और इस प्रकार कहने लगा ॥ १३ ॥ अनन्त ! हम मूर्ख हैं; इसलिये आपके वास्तविक स्वरूपको नहीं जानते। जानें भी कैसे ? आप समस्त जगत् के एकमात्र स्वामी, आदिकारण एवं जगत्के समस्त परिवर्तनों में एकरस रहनेवाले हैं। आप समस्त गुणों के स्वामी हैं । इसलिये जब आप सत्त्वगुण को स्वीकार कर लेते हैं तब देवताओं की, रजोगुण को स्वीकार कर लेते हैं तब प्रजापतियों की और तमोगुण को स्वीकार कर लेते हैं तब आप के क्रोध से रुद्रगण की उत्पत्ति होती है ॥ १४ ॥ वीरशिरोमणे ! आप अपनी इच्छा के अनुसार मुझे पार कर जाइये और त्रिलोकी को रुलानेवाले विश्रवा के कुपूत रावण को मारकर अपनी पत्नी को फिर से प्राप्त कीजिये। परंतु आपसे मेरी एक प्रार्थना है। आप यहाँ मुझपर एक पुल बाँध दीजिये। इससे आप के यश का विस्तार होगा और आगे चलकर जब बड़े-बड़े नरपति दिग्विजय करते हुए यहाँ आयेंगे, तब वे आपके यश का गान करेंगे ॥ १५ ॥

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