शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - दसवां अध्याय..(पोस्ट ०२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०२)

उत्तम का मारा जाना, ध्रुव का यक्षों के साथ युद्ध

ततो निष्क्रम्य बलिन उपदेवमहाभटाः ।
असहन्तः तन्निनादं अभिपेतुरुदायुधाः ॥ ७ ॥
स तान् आपततो वीर उग्रधन्वा महारथः ।
एकैकं युगपत्सर्वान् अहन् बाणैस्त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ८ ॥
ते वै ललाटलग्नैस्तैः इषुभिः सर्व एव हि ।
मत्वा निरस्तमात्मानं आशंसन्कर्म तस्य तत् ॥ ९ ॥
तेऽपि चामुममृष्यन्तः पादस्पर्शमिवोरगाः ।
शरैरविध्यन् युगपद् द्विगुणं प्रचिकीर्षवः ॥ १० ॥
ततः परिघनिस्त्रिंशैः प्रासशूलपरश्वधैः ।
शक्त्यृष्टिभिर्भुशुण्डीभिः चित्रवाजैः शरैरपि ॥ ११ ॥
अभ्यवर्षन् प्रन्प्रकुपिताः सरथं सहसारथिम् ।
इच्छन्तः तत्प्रतीकर्तुं अयुतानां त्रयोदश ॥ १२ ॥
औत्तानपादिः स तदा शस्त्रवर्षेण भूरिणा ।
न एवादृश्यताच्छन्न आसारेण यथा गिरिः ॥ १३ ॥
हाहाकारस्तदैवासीत् सिद्धानां दिवि पश्यताम् ।
हतोऽयं मानवः सूर्यो मग्नः पुण्यजनार्णवे ॥ १४ ॥
नदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे ।
उदतिष्ठद् रथस्तस्य नीहारादिव भास्करः ॥ १५ ॥

(श्रीमैत्रेयजी कह रहे हैं) वीरवर विदुरजी ! महाबलवान् यक्षवीरों को वह शङ्खनाद सहन न हुआ। इसलिये वे तरह- तरहके अस्त्र-शस्त्र लेकर नगरके बाहर निकल आये और ध्रुवपर टूट पड़े ॥ ७ ॥ महारथी ध्रुव प्रचण्ड धनुर्धर थे। उन्होंने एक ही साथ उनमेंसे प्रत्येकको तीन-तीन बाण मारे ॥ ८ ॥ उन सभीने जब अपने-अपने मस्तकोंमें तीन-तीन बाण लगे देखे, तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि हमारी हार अवश्य होगी। वे ध्रुवजीके इस अद्भुत पराक्रमकी प्रशंसा करने लगे ॥ ९ ॥ फिर जैसे सर्प किसीके पैरोंका आघात नहीं सहते, उसी प्रकार ध्रुवके इस पराक्रमको न सहकर उन्होंने भी उनके बाणोंके जवाबमें एक ही साथ उनसे दूने—छ:-छ: बाण छोड़े ॥ १० ॥ यक्षोंकी संख्या तेरह अयुत (१३००००) थी। उन्होंने ध्रुवजीका बदला लेनेके लिये अत्यन्त कुपित होकर रथ और सारथीके सहित उनपर परिघ, खड्ग, प्रास, त्रिशूल, फरसा, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी तथा चित्र-विचित्र पंखदार बाणोंकी वर्षा की ॥ ११-१२ ॥ इस भीषण शस्त्रवर्षासे ध्रुवजी बिलकुल ढक गये। तब लोगोंको उनका दीखना वैसे ही बंद हो गया, जैसे भारी वर्षासे पर्वतका ॥ १३ ॥ उस समय जो सिद्धगण आकाशमें स्थित होकर यह दृश्य देख रहे थे, वे सब हाय-हाय करके कहने लगे—‘आज यक्षसेनारूप समुद्रमें डूबकर यह मानव-सूर्य अस्त हो गया’ ॥ १४ ॥ यक्षलोग अपनी विजयकी घोषणा करते हुए युद्धक्षेत्रमें सिंहकी तरह गरजने लगे। इसी बीचमें ध्रुवजीका रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरेमेंसे सूर्यभगवान्‌ निकल आते हैं ॥ १५ ॥

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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - दसवां अध्याय..(पोस्ट०१)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – दसवाँ अध्याय..(पोस्ट०१)

उत्तम का मारा जाना, ध्रुव का यक्षों के साथ युद्ध

मैत्रेय उवाच -

प्रजापतेर्दुहितरं शिशुमारस्य वै ध्रुवः ।
उपयेमे भ्रमिं नाम तत्सुतौ कल्पवत्सरौ ॥ १ ॥
इलायामपि भार्यायां वायोः पुत्र्यां महाबलः ।
पुत्रं उत्कलनामानं योषिद् रत्नममजीजनत् ॥ २ ॥
उत्तमस्त्वकृतोद्वाहो मृगयायां बलीयसा ।
हतः पुण्यजनेनाद्रौ तन्मातास्य गतिं गता ॥ ३ ॥
ध्रुवो भ्रातृवधं श्रुत्वा कोपामर्षशुचार्पितः ।
जैत्रं स्यन्दनमास्थाय गतः पुण्यजनालयम् ॥ ४ ॥
गत्वोदीचीं दिशं राजा रुद्रानुचरसेविताम् ।
ददर्श हिमवद्द्रोण्यां पुरीं गुह्यकसंकुलाम् ॥ ५ ॥
दध्मौ शङ्‌खं बृहद्बापहुः खं दिशश्चानुनादयन् ।
येनोद्विग्नदृशः क्षत्तः उपदेव्योऽत्रसन्भृशम् ॥ ॥ ६ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी ! ध्रुवने प्रजापति शिशुमारकी पुत्री भ्रमिके साथ विवाह किया, उससे उनके कल्प और वत्सर नामके दो पुत्र हुए ॥ १ ॥ महाबली ध्रुवकी दूसरी स्त्री वायुपुत्री इला थी। उससे उनके उत्कल नामके एक पुत्र और एक कन्यारत्न का जन्म हुआ ॥ २ ॥ उत्तमका अभी विवाह नहीं हुआ था कि एक दिन शिकार खेलते समय उसे हिमालय पर्वतपर एक बलवान् यक्षने मार डाला। उसके साथ उसकी माता भी परलोक सिधार गयी ॥ ३ ॥
ध्रुवने जब भाईके मारे जानेका समाचार सुना तो वे क्रोध, शोक और उद्वेगसे भरकर एक विजयप्रद रथपर सवार हो यक्षोंके देशमें जा पहुँचे ॥ ४ ॥ उन्होंने उत्तर दिशामें जाकर हिमालयकी घाटीमें यक्षोंसे भरी हुई अलकापुरी देखी, उसमें अनेकों भूत-प्रेत-पिशाचादि रुद्रानुचर रहते थे ॥ ५ ॥ विदुरजी ! वहाँ पहुँचकर महाबाहु ध्रुवने अपना शङ्ख बजाया तथा सम्पूर्ण आकाश और दिशाओंको गुँजा दिया। उस शङ्खध्वनिसे यक्ष-पत्नियाँ बहुत ही डर गयीं, उनकी आँखें भयसे कातर हो उठीं ॥ ६ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट १०)

 

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

 


श्रीमद्भागवतमहापुराण

चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

 

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

 

लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः ।

आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत्पुरम् ॥ ५३ ॥

तत्र तत्रोपसङ्‌कॢप्तैः लसन् मकरतोरणैः ।

सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैश्च तद्विधैः ॥ ५४ ॥

चूतपल्लववासःस्रङ्‌ मुक्तादामविलम्बिभिः ।

उपस्कृतं प्रतिद्वारं अपां कुम्भैः सदीपकैः ॥ ५५ ॥

प्राकारैः गोपुरागारैः शातकुम्भपरिच्छदैः ।

सर्वतोऽलङ्‌कृतं श्रीमद् विमानशिखरद्युभिः ॥ ५६ ॥

मृष्टचत्वररथ्याट्ट मार्गं चन्दनचर्चितम् ।

लाजाक्षतैः पुष्पफलैः तण्डुलैर्बलिभिर्युतम् ॥ ५७ ॥

ध्रुवाय पथि दृष्टाय तत्र तत्र पुरस्त्रियः ।

सिद्धार्थाक्षतदध्यम्बु दूर्वापुष्पफलानि च ॥ ५८ ॥

उपजह्रुः प्रयुञ्जाना वात्सल्यादाशिषः सतीः ।

शृण्वन् तद्वल्गुगीतानि प्राविशद्‍भवनं पितुः ॥ ५९ ॥

महामणिव्रातमये स तस्मिन् भवनोत्तमे ।

लालितो नितरां पित्रा न्यवसद् दिवि देववत् ॥ ६० ॥

पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः ।

आसनानि महार्हाणि यत्र रौक्मा उपस्कराः ॥ ६१ ॥

यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।

मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्‍नसंयुताः ॥ ६२ ॥

उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमैः ।

कूजद्विहङ्‌गमिथुनैः गायन्मत्तमधुव्रतैः ॥ ६३ ॥

वाप्यो वैदूर्यसोपानाः पद्मोत्पलकुमुद्वतीः ।

हंसकारण्डवकुलैः जुष्टाश्चक्राह्वसारसैः ॥ ६४ ॥

उत्तानपादो राजर्षिः प्रभावं तनयस्य तम् ।

श्रुत्वा दृष्ट्वाद्‍भुततमं प्रपेदे विस्मयं परम् ॥ ६५ ॥

वीक्ष्योढवयसं तं च प्रकृतीनां च सम्मतम् ।

अनुरक्तप्रजं राजा ध्रुवं चक्रे भुवः पतिम् ॥ ६६ ॥

आत्मानं च प्रवयसं आकलय्य विशाम्पतिः ।

वनं विरक्तः प्रातिष्ठद् विमृशन्नात्मनो गतिम् ॥ ६७ ॥

 

विदुरजी ! इस प्रकार जब सभी लोग ध्रुवके प्रति अपना लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, उसी समय उन्हें भाई उत्तमके सहित हथिनीपर चढ़ाकर महाराज उत्तानपादने बड़े हर्षके साथ राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय सभी लोग उनके भाग्यकी बड़ाई कर रहे थे ॥ ५३ ॥ नगरमें जहाँ-तहाँ मगरके आकारके सुन्दर दरवाजे बनाये गये थे तथा फल-फूलोंके गुच्छोंके सहित केलेके खम्भे और सुपारीके पौधे सजाये गये थे ॥ ५४ ॥ द्वार-द्वारपर दीपकके सहित जलके कलश रखे हुए थेजो आमके पत्तों, वस्त्रों, पुष्पमालाओं तथा मोतीकी लडिय़ोंसे सुसज्जित थे ॥ ५५ ॥ जिन अनेकों परकोटों, फाटकों और महलोंसे नगरी सुशोभित थी, उन सबको सुवर्णकी सामग्रियोंसे सजाया गया था तथा उनके कँगूरे विमानोंके शिखरोंके समान चमक रहे थे ॥ ५६ ॥ नगरके चौक, गलियों, अटारियों और सडक़ोंको झाड़-बुहारकर उनपर चन्दनका छिडक़ाव किया गया था और जहाँ-तहाँ खील, चावल, पुष्प, फल, जौ एवं अन्य माङ्गलिक उपहार-सामग्रियाँ सजी रखी थीं ॥ ५७ ॥ ध्रुवजी राजमार्गसे जा रहे थे। उस समय जहाँ-तहाँ नगरकी शीलवती सुन्दरियाँ उन्हें देखनेको एकत्र हो रही थीं। उन्होंने वात्सल्यभावसे अनेकों शुभाशीर्वाद देते हुए उनपर सफेद सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फलोंकी वर्षा की। इस प्रकार उनके मनोहर गीत सुनते हुए ध्रुवजीने अपने पिताके महलमें प्रवेश किया ॥ ५८-५९ ॥ वह श्रेष्ठ भवन महामूल्य मणियोंकी लडिय़ोंसे सुसज्जित था। उसमें अपने पिताजीके लाड़- प्यारका सुख भोगते हुए वे उसी प्रकार आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे स्वर्गमें देवतालोग रहते हैं ॥ ६० ॥ वहाँ दूधके फेनके समान सफेद और कोमल शय्याएँ, हाथी-दाँतके पलंग, सुनहरी कामदार परदे, बहुमूल्य आसन और बहुत-सा सोनेका सामान था ॥ ६१ ॥ उसकी स्फटिक और महामरकतमणि (पन्ने) की दीवारोंमें रत्नोंकी बनी हुई स्त्रीमूर्तियोंपर रखे हुए मणिमय दीपक जगमगा रहे थे ॥ ६२ ॥ उस महलके चारों ओर अनेक जातिके दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित उद्यान थे, जिनमें नर और मादा पक्षियोंका कलरव तथा मतवाले भौंरोंका गुंजार होता रहता था ॥ ६३ ॥ उन बगीचोंमें वैदूर्यमणि (पुखराज) की सीढिय़ोंसे सुशोभित बावलियाँ थींजिनमें लाल, नीले और सफेद रंगके कमल खिले रहते थे तथा हंस, कारण्डव, चकवा एवं सारस आदि पक्षी क्रीडा करते रहते थे ॥ ६४ ॥

राजर्षि उत्तानपाद ने अपने पुत्र के अति अद्भुत प्रभाव की बात देवर्षि नारद से पहले ही सुन रखी थी; अब उसे प्रत्यक्ष वैसा ही देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ६५ ॥ फिर यह देखकर कि अब ध्रुव तरुण अवस्थाको प्राप्त हो गये हैं, अमात्यवर्ग उन्हें आदरकी दृष्टिसे देखते हैं तथा प्रजाका भी उनपर अनुराग है, उन्होंने उन्हें निखिल भूमण्डलके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ६६ ॥ और आप वृद्धावस्था आयी जानकर आत्मस्वरूपका चिन्तन करते हुए संसारसे विरक्त होकर वनको चल दिये ॥ ६७ ॥

 

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ध्रुवराज्याभिषेक वर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

 

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मंगलवार, 30 सितंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

यस्य प्रसन्नो भगवान् गुणैर्मैत्र्यादिभिर्हरिः ।
तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम् ॥ ४७ ॥
उत्तमश्च ध्रुवश्चोभौ अन्योन्यं प्रेमविह्वलौ ।
अङ्‌गसङ्‌गाद् उत्पुलकौ अस्रौघं मुहुरूहतुः ॥ ४८ ॥
सुनीतिरस्य जननी प्राणेभ्योऽपि प्रियं सुतम् ।
उपगुह्य जहावाधिं तदङ्‌गस्पर्शनिर्वृता ॥ ४९ ॥
पयः स्तनाभ्यां सुस्राव नेत्रजैः सलिलैः शिवैः ।
तदाभिषिच्यमानाभ्यां वीर वीरसुवो मुहुः ॥ ५० ॥
तां शशंसुर्जना राज्ञीं दिष्ट्या ते पुत्र आर्तिहा ।
प्रतिलब्धश्चिरं नष्टो रक्षिता मण्डलं भुवः ॥ ५१ ॥
अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान् प्रणतार्तिहा ।
यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्युः सुदुर्जयम् ॥ ५२ ॥

जिस प्रकार जल स्वयं ही नीचेकी ओर बहने लगता है—उसी प्रकार मैत्री आदि गुणोंके कारण जिसपर श्रीभगवान्‌ प्रसन्न हो जाते हैं, उसके आगे सभी जीव झुक जाते हैं ॥ ४७ ॥ इधर उत्तम और ध्रुव दोनों ही प्रेमसे विह्वल होकर मिले। एक-दूसरे के अङ्गों का स्पर्श पाकर उन दोनों के ही शरीर में रोमाञ्च हो आया तथा नेत्रों से बार-बार आसुओंकी धारा बहने लगी ॥ ४८ ॥ ध्रुवकी माता सुनीति अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको गले लगाकर सारा सन्ताप भूल गयी। उसके सुकुमार अङ्गोंके स्पर्शसे उसे बड़ा ही आनन्द प्राप्त हुआ ॥ ४९ ॥ वीरवर विदुरजी ! वीरमाता सुनीतिके स्तन उसके नेत्रोंसे झरते हुए मङ्गलमय आनन्दाश्रुओंसे भीग गये और उनसे बार-बार दूध बहने लगा ॥ ५० ॥ उस समय पुरवासी लोग उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे, ‘महारानी जी ! आपका लाल बहुत दिनोंसे खोया हुआ था; सौभाग्यवश अब वह लौट आया, यह हम सबका दु:ख दूर करनेवाला है। बहुत दिनोंतक भूमण्डलकी रक्षा करेगा ॥ ५१ ॥ आपने अवश्य ही शरणागतभयभञ्जन श्रीहरिकी उपासना की है। उनका निरन्तर ध्यान करनेवाले धीर पुरुष परम दुर्जय मृत्युको भी जीत लेते हैं’ ॥ ५२ ॥

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श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०८)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०८)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

मैत्रेय उवाच -
न वै मुकुन्दस्य पदारविन्दयो
     रजोजुषस्तात भवादृशा जनाः ।
वाञ्छन्ति तद्दास्यमृतेऽर्थमात्मनो
     यदृच्छया लब्धमनःसमृद्धयः ॥ ३६ ॥
आकर्ण्यात्मजमायान्तं सम्परेत्य यथाऽऽगतम् ।
राजा न श्रद्दधे भद्रं अभद्रस्य कुतो मम ॥ ३७ ॥
श्रद्धाय वाक्यं देवर्षेः हर्षवेगेन धर्षितः ।
वार्ताहर्तुरतिप्रीतो हारं प्रादान्महाधनम् ॥ ३८ ॥
सदश्वं रथमारुह्य कार्तस्वरपरिष्कृतम् ।
ब्राह्मणैः कुलवृद्धैश्च पर्यस्तोऽमात्यबन्धुभिः ॥ ३९ ॥
शङ्‌खदुन्दुभिनादेन ब्रह्मघोषेण वेणुभिः ।
निश्चक्राम पुरात् तूर्णं आत्मजाभीक्षणोत्सुकः ॥ ४० ॥
सुनीतिः सुरुचिश्चास्य महिष्यौ रुक्मभूषिते ।
आरुह्य शिबिकां सार्धं उत्तमेनाभिजग्मतुः ॥ ४१ ॥
तं दृष्ट्वोपवनाभ्याश आयान्तं तरसा रथात् ।
अवरुह्य नृपस्तूर्णं आसाद्य प्रेमविह्वलः ॥ ४२ ॥
परिरेभेऽङ्‌गजं दोर्भ्यां दीर्घोत्कण्ठमनाः श्वसन् ।
विष्वक्सेनाङ्‌घ्रिसंस्पर्श हताशेषाघबन्धनम् ॥ ४३ ॥
अथाजिघ्रन् मुहुर्मूर्ध्नि शीतैर्नयनवारिभिः ।
स्नापयामास तनयं जातोद्दाममनोरथः ॥ ४४ ॥
अभिवन्द्य पितुः पादौ आशीर्भिश्चाभिमन्त्रितः ।
ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः ॥ ४५ ॥
सुरुचिस्तं समुत्थाप्य पादावनतमर्भकम् ।
परिष्वज्याह जीवेति बाष्पगद्गतदया गिरा ॥ ४६ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—तात ! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्दपादारविन्द-मकरन्दके ही मधुकर हैं—जो निरन्तर प्रभुकी चरण-रजका ही सेवन करते हैं और जिनका मन अपने-आप आयी हुई सभी परिस्थितियोंमें सन्तुष्ट रहता है, वे भगवान्‌से उनकी सेवाके सिवा अपने लिये और कोई भी पदार्थ नहीं माँगते ॥ ३६ ॥
इधर जब राजा उत्तानपादने सुना कि उनका पुत्र ध्रुव घर लौट रहा है, तो उन्हें इस बातपर वैसे ही विश्वास नहीं हुआ जैसे कोई किसीके यमलोकसे लौटनेकी बातपर विश्वास न करे। उन्होंने यह सोचा कि ‘मुझ अभागे का ऐसा भाग्य कहाँ’ ॥ ३७ ॥ परन्तु फिर उन्हें देवर्षि नारदकी बात याद आ गयी। इससे उनका इस बातमें विश्वास हुआ और वे आनन्दके वेगसे अधीर हो उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह समाचार लानेवालेको एक बहुमूल्य हार दिया ॥ ३८ ॥ राजा उत्तानपादने पुत्रका मुख देखनेके लिये उत्सुक होकर बहुत-से ब्राह्मण, कुल के बड़े-बूढ़े, मन्त्री और बन्धुजनोंको साथ लिया तथा एक बढिय़ा घोड़ोंवाले सुवर्णजटित रथपर सवार होकर वे झटपट नगरके बाहर आये। उनके आगे-आगे वेदध्वनि होती जाती थी तथा शङ्ख, दुन्दुभि एवं वंशी आदि अनेकों माङ्गलिक बाजे बजते जाते थे ॥ ३९-४० ॥ उनकी दोनों रानियाँ सुनीति और सुरुचि भी सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो राजकुमार उत्तमके साथ पालकियोंपर चढक़र चल रही थीं ॥ ४१ ॥ ध्रुवजी उपवनके पास आ पहुँचे, उन्हें देखते ही महाराज उत्तानपाद तुरंत रथसे उतर पड़े। पुत्रको देखनेके लिये वे बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित हो रहे थे। उन्होंने झटपट आगे बढक़र प्रेमातुर हो, लंबीलंबी साँसें लेते हुए, ध्रुवको भुजाओं में भर लिया। अब ये पहलेके ध्रुव नहीं थे, प्रभुके परमपुनीत पादपद्मों का स्पर्श होनेसे इनके समस्त पाप-बन्धन कट गये थे ॥ ४२-४३ ॥ राजा उत्तानपादकी एक बहुत बड़ी कामना पूर्ण हो गयी। उन्होंने बार-बार पुत्रका सिर सूँघा और आनन्द तथा प्रेमके कारण निकलनेवाले ठंडे-ठंडे [*] आँसुओंसे उन्हें नहला दिया ॥ ४४ ॥
तदनन्तर सज्जनोंमें अग्रगण्य ध्रुवजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर, कुशल-प्रश्रादिसे सम्मानित हो दोनों माताओंको प्रणाम किया ॥ ४५ ॥ छोटी माता सुरुचिने अपने चरणोंपर झुके हुए बालक ध्रुवको उठाकर हृदयसे लगा लिया और अश्रुगद्गद वाणीसे ‘चिरञ्जीवी रहो’ ऐसा आशीर्वाद दिया ॥ ४६ ॥ 
......................................................
[*] आनन्द या प्रेमके कारण आँसू आते हैं वे ठंडे हुआ करते हैं और शोकके आँसू गरम होते हैं।

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सोमवार, 29 सितंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०७)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०७)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

विदुर उवाच -
सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरेः
     मायाविनस्तत् चरणार्चनार्जितम् ।
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना
     कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित् ॥ २८ ॥

मैत्रेय उवाच -
मातुः सपत्न्याव वाग्बाणैः हृदि विद्धस्तु तान् स्मरन् ।
नैच्छन्मुक्तिपतेर्मुक्तिं तस्मात् तापमुपेयिवान् ॥ २९ ॥

ध्रुव उवाच –
समाधिना नैकभवेन यत्पदं
     विदुः सनन्दादय ऊर्ध्वरेतसः ।
मासैरहं षड्‌भिरमुष्य पादयोः
     छायामुपेत्यापगतः पृथङ्‌मतिः ॥ ३० ॥
अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत ।
भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे यदन्तवत् ॥ ३१ ॥
मतिर्विदूषिता देवैः पतद्‌भिः असहिष्णुभिः ।
यो नारदवचस्तथ्यं नाग्राहिषमसत्तमः ॥ ३२ ॥
दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् ।
तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३ ॥
मयैतत्प्रार्थितं व्यर्थं चिकित्सेव गतायुषि ।
प्रसाद्य जगदात्मानं तपसा दुष्प्रसादनम् ।
भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः ॥ ३४ ॥
स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान् मानो मे भिक्षितो बत ।
ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः ॥ ३५ ॥

विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन् ! मायापति श्रीहरिका परमपद तो अत्यन्त दुर्लभ है और मिलता भी उनके चरणकमलोंकी उपासनासे ही है। ध्रुवजी भी सारासार का पूर्ण विवेक रखते थे; फिर एक ही जन्ममें उस परमपदको पा लेनेपर भी उन्होंने अपनेको अकृतार्थ क्यों समझा ? ॥ २८ ॥
श्रीमैत्रेयजीने कहा—ध्रुवजीका हृदय अपनी सौतेली माताके वाग्बाणों से बिंध गया था तथा वर माँगनेके समय भी उन्हें उनका स्मरण बना हुआ था; इसीसे उन्होंने मुक्तिदाता श्रीहरिसे मुक्ति नहीं माँगी। अब जब भगवद्दर्शन से वह मनोमालिन्य दूर हो गया तो उन्हें अपनी इस भूलके लिये पश्चात्ताप हुआ ॥ २९ ॥
ध्रुवजी मन-ही-मन कहने लगे—अहो ! सनकादि ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) सिद्ध भी जिन्हें समाधिद्वारा अनेकों जन्मोंमें प्राप्त कर पाते हैं, उन भगवच्चरणों की छायाको मैंने छ: महीने में ही पा लिया, किन्तु चित्तमें दूसरी वासना रहनेके कारण मैं फिर उनसे दूर हो गया ॥ ३० ॥ अहो ! मुझ मन्दभाग्यकी मूर्खता तो देखो, मैंने संसार-पाशको काटनेवाले प्रभुके पादपद्मोंमें पहुँचकर भी उनसे नाशवान् वस्तुकी ही याचना की ॥ ३१ ॥ देवताओंको स्वर्गभोगके पश्चात् फिर नीचे गिरना होता है, इसलिये वे मेरी भगवत्प्राप्तिरूप उच्च स्थितिको सहन नहीं कर सके; अत: उन्होंने ही मेरी बुद्धिको नष्ट कर दिया। तभी तो मुझ दुष्टने नारदजीकी यथार्थ बात भी स्वीकार नहीं की ॥ ३२ ॥ यद्यपि संसारमें आत्माके सिवा दूसरा कोई भी नहीं है; तथापि सोया हुआ मनुष्य जैसे स्वप्नमें अपने ही कल्पना किये हुए व्याघ्रादिसे डरता है, उसी प्रकार मैंने भी भगवान्‌की मायासे मोहित होकर भाईको ही शत्रु मान लिया और व्यर्थ ही द्वेषरूप हार्दिक रोगसे जलने लगा ॥ ३३ ॥ जिन्हें प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन है; उन्हीं विश्वात्मा श्रीहरिको तपस्याद्वारा प्रसन्न करके मैंने जो कुछ माँगा है, वह सब व्यर्थ है; ठीक उसी तरह, जैसे गतायु पुरुषके लिये चिकित्सा व्यर्थ होती है। ओह ! मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले प्रभुसे मैंने संसार ही माँगा ॥ ३४ ॥ मैं बड़ा ही पुण्यहीन हूँ ! जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट्को प्रसन्न करके उससे तुषसहित चावलोंकी कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द प्रदान करनेवाले श्रीहरिसे मूर्खतावश व्यर्थका अभिमान बढ़ानेवाले उच्चपदादि ही माँगे हैं ॥ ३५ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०६)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०६)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

भुक्त्वा चेहाशिषः सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि ॥ २४ ॥
ततो गन्तासि मत्स्थानं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
उपरिष्टादृषिभ्यस्त्वं यतो नावर्तते गतः ॥ २५ ॥

मैत्रेय उवाच –

इत्यर्चितः स भगवान् अतिदिश्यात्मनः पदम् ।
बालस्य पश्यतो धाम स्वं अगाद् गरुडध्वजः ॥ २६ ॥
सोऽपि सङ्‌कल्पजं विष्णोः पादसेवोपसादितम् ।
प्राप्य सङ्‌कल्पनिर्वाणं नातिप्रीतोऽभ्यगात्पुरम् ॥ २७ ॥

(श्रीहरि, ध्रुव से कह रहे हैं) यज्ञ मेरी प्रिय मूर्ति है, तू अनेकों बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करेगा तथा यहाँ उत्तम-उत्तम भोग भोगकर अन्तमें मेरा ही स्मरण करेगा ॥ २४ ॥ इससे तू अन्तमें सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और सप्तर्षियोंसे भी ऊपर मेरे निज धामको जायगा, जहाँ पहुँच जानेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना होता है ॥ २५ ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—बालक ध्रुवसे इस प्रकार पूजित हो और उसे अपना पद प्रदानकर भगवान्‌ श्रीगरुडध्वज उसके देखते-देखते अपने लोक को चले गये ॥ २६ ॥ प्रभु की चरणसेवा से सङ्कल्पित वस्तु प्राप्त हो जानेके कारण यद्यपि ध्रुवजीका सङ्कल्प तो निवृत्त हो गया, किन्तु उनका चित्त विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। फिर वे अपने नगरको लौट गये ॥ २७ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


रविवार, 28 सितंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०५)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०५)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

मैत्रेय उवाच -

अथाभिष्टुत एवं वै सत्सङ्‌कल्पेन धीमता ।
भृत्यानुरक्तो भगवान् प्रतिनन्द्येदमब्रवीत् ॥ १८ ॥

श्रीभगवानुवाच –

वेदाहं ते व्यवसितं हृदि राजन्यबालक ।
तत्प्रयच्छामि भद्रं ते दुरापं अपि सुव्रत ॥ १९ ॥
नान्यैरधिष्ठितं भद्र यद्भ्रा जिष्णु ध्रुवक्षिति ।
यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम् ॥ २० ॥
मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम् ।
धर्मोऽग्निः कश्यपः शुक्रो मुनयो ये वनौकसः ।
चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारकाः ॥ २१ ॥
प्रस्थिते तु वनं पित्रा दत्त्वा गां धर्मसंश्रयः ।
षट्त्रिंशद्‌ वर्षसाहस्रं रक्षिताव्याहतेन्द्रियः ॥ २२ ॥
त्वद्भ्रा तर्युत्तमे नष्टे मृगयायां तु तन्मनाः ।
अन्वेषन्ती वनं माता दावाग्निं सा प्रवेक्ष्यति ॥ २३ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी ! जब शुभ सङ्कल्पवाले मतिमान् ध्रुवजीने इस प्रकार स्तुति की तब भक्तवत्सल भगवान्‌ उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे ॥ १८ ॥
श्रीभगवान्‌ने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजकुमार ! मैं तेरे हृदयका सङ्कल्प जानता हूँ। यद्यपि उस पदका प्राप्त होना बहुत कठिन है, तो भी मैं तुझे वह देता हूँ। तेरा कल्याण हो ॥ १९ ॥
भद्र ! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागणरूप ज्योतिश्चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता रहता है जिस प्रकार मेढीके [*] चारों ओर दँवरीके बैल घूमते रहते हैं। अवान्तर कल्पपर्यन्त रहनेवाले अन्य लोकोंका नाश हो जानेपर भी जो स्थिर रहता है तथा तारागणके सहित धर्म, अग्नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र एवं सप्तर्षिगण जिसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, वह ध्रुवलोक मैं तुझे देता हूँ ॥ २०-२१ ॥ यहाँ भी जब तेरे पिता तुझे राजसिंहासन देकर वनको चले जायँगे; तब तू छत्तीस हजार वर्षतक धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करेगा। तेरी इन्द्रियोंकी शक्ति ज्यों-की-त्यों बनी रहेगी ॥ २२ ॥ आगे चलकर किसी समय तेरा भाई उत्तम शिकार खेलता हुआ मारा जायगा, तब उसकी माता सुरुचि पुत्र-प्रेममें पागल होकर उसे वनमें खोजती हुई दावानलमें प्रवेश कर जायगी ॥ २३ ॥ 

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[*1] कटी हुई फसल धान, गेहूँ आदिको कुचलनेके लिये घुमाये जानेवाले बैल जिस खम्भेमें बँधे रहते हैं, उसका नाम मेढी है।

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श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०४)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०४)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा
     कूटस्थ आदिपुरुषो भगवान् त्र्यधीशः ।
यद्बुनद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या
     द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥ १५ ॥
यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति
     विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् ।
तद्ब्र्ह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्यम्
     आनन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥ १६ ॥
सत्याशिषो हि भगवन् तव पादपद्मम्
     आशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः ।
अप्येवमर्य भगवान्परिपाति दीनान्
     वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥ १७ ॥

(ध्रुवजी श्रीहरि की स्तुति कर रहे हैं) प्रभो ! आप अपनी अखण्ड चिन्मयी दृष्टिसे बुद्धिकी सभी अवस्थाओंके साक्षी हैं तथा नित्य- मुक्त शुद्धसत्त्वमय, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप, निर्विकार, आदिपुरुष, षडैश्वर्य-सम्पन्न एवं तीनों गुणोंके अधीश्वर हैं। आप जीवसे सर्वथा भिन्न हैं तथा संसारकी स्थितिके लिये यज्ञाधिष्ठाता विष्णुरूपसे विराजमान हैं ॥ १५ ॥ आपसे ही विद्या-अविद्या आदि विरुद्ध गतियोंवाली अनेकों शक्तियाँ धारावाहिक रूप से निरन्तर प्रकट होती रहती हैं। आप जगत् के कारण, अखण्ड, अनादि, अनन्त, आनन्दमय निर्विकार ब्रह्मस्वरूप हैं। मैं आपकी शरण हूँ ॥ १६ ॥
भगवन् ! आप परमानन्दमूर्ति हैं—जो लोग ऐसा समझकर निष्कामभावसे आपका निरन्तर भजन करते हैं, उनके लिये राज्यादि भोगों की अपेक्षा आपके चरणकमलों की प्राप्ति ही भजन का सच्चा फल है। स्वामिन् ! यद्यपि बात ऐसी ही है, तो भी गौ जैसे अपने तुरंत के जन्में हुए बछड़े को दूध पिलाती और व्याघ्रादि से बचाती रहती है, उसी प्रकार आप भी भक्तोंपर कृपा करनेके लिये निरन्तर विकल रहनेके कारण हम-जैसे सकाम जीवोंकी भी कामना पूर्ण करके उनकी संसार- भयसे रक्षा करते रहते हैं ॥ १७ ॥

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शनिवार, 27 सितंबर 2025

श्रीमद्भागवतमहापुराण चतुर्थ स्कन्ध - नवां अध्याय..(पोस्ट०३)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
चतुर्थ स्कन्ध – नवाँ अध्याय..(पोस्ट०३)

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्‌गो
     भूयादनन्त महतां अमलाशयानाम् ।
येनाञ्जसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं
     नेष्ये भवद्गुनणकथामृतपानमत्तः ॥ ११ ॥
ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं
     ये चान्वदः सुतसुहृद्गृमहवित्तदाराः ।
ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द
     सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्‌गाः ॥ १२ ॥
तिर्यङ्‌नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य
     मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् ।
रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं
     नातः परं परम वेद्मि न यत्र वादः ॥ १३ ॥
कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृह्णन्
     शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्‌के ।
यन्नाभिसिन्धुरुहकाञ्चन लोकपद्म
     गर्भे द्युमान्भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै ॥ १४ ॥

(ध्रुवजी श्रीहरि की स्तुति कर रहे हैं) अनन्त परमात्मन् ! मुझे तो आप उन विशुद्धहृदय महात्मा भक्तोंका सङ्ग दीजिये, जिनका आपमें अविच्छिन्न भक्तिभाव है; उनके सङ्गमें मैं आपके गुणों और लीलाओंकी कथा-सुधाको पी-पीकर उन्मत्त हो जाऊँगा और सहज ही इस अनेक प्रकारके दु:खोंसे पूर्ण भयङ्कर संसारसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा ॥ ११ ॥ कमलनाभ प्रभो ! जिनका चित्त आपके चरणकमलकी सुगन्धमें लुभाया हुआ है, उन महानुभावोंका जो लोग सङ्ग करते हैं—वे अपने इस अत्यन्त प्रिय शरीर और इसके सम्बन्धी पुत्र, मित्र, गृह और स्त्री आदिकी सुधि भी नहीं करते ॥ १२ ॥ अजन्मा परमेश्वर ! मैं तो पशु, वृक्ष, पर्वत, पक्षी, सरीसृप (सर्पादि रेंगनेवाले जन्तु), देवता, दैत्य और मनुष्य आदिसे परिपूर्ण तथा महदादि अनेकों कारणोंसे सम्पादित आपके इस सदसदात्मक स्थूल विश्वरूपको ही जानता हूँ; इससे परे जो आपका परम स्वरूप है, जिसमें वाणीकी गति नहीं है, उसका मुझे पता नहीं है ॥ १३ ॥
भगवन् ! कल्पका अन्त होनेपर योगनिद्रामें स्थित जो परमपुरुष इस सम्पूर्ण विश्वको अपने उदरमें लीन करके शेषजीके साथ उन्हींकी गोदमें शयन करते हैं तथा जिनके नाभि-समुद्रसे प्रकट हुए सर्वलोकमय सुवर्णवर्ण कमलसे परम तेजोमय ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, वे भगवान्‌ आप ही हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


श्रीमद्भागवतमहापुराण पंचम स्कन्ध अठारहवां अध्याय..(पोस्ट०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  पंचम स्कन्ध – अठारहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९) भिन्न-भिन्न वर्षोंका वर्णन करोति विश्वस्थितिसंयमोदय...