रविवार, 16 जून 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०२)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

देवोद्यानश्रिया जुष्टं अध्यास्ते स्म त्रिपिष्टपम् ।
महेन्द्रभवनं साक्षात् निर्मितं विश्वकर्मणा ।
त्रैलोक्यलक्ष्म्यायतनं अध्युवासाखिलर्द्धिमत् ॥ ८ ॥
यत्र विद्रुमसोपाना महामारकता भुवः ।
यत्र स्फाटिककुड्यानि वैदूर्यस्तम्भपङ्‌क्तयः ॥ ९ ॥
यत्र चित्रवितानानि पद्मरागासनानि च ।
पयःफेननिभाः शय्या मुक्तादामपरिच्छदाः ॥ १० ॥
कूजद्‌भिर्नूपुरैर्देव्यः शब्दयन्त्य इतस्ततः ।
रत्‍नस्थलीषु पश्यन्ति सुदतीः सुन्दरं मुखम् ॥ ११ ॥
तस्मिन्महेन्द्रभवने महाबलो
     महामना निर्जितलोक एकराट् ।
रेमेऽभिवन्द्याङ्‌घ्रियुगः सुरादिभिः
     प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥
तमङ्‌ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना
     विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः ।
उपासतोपायनपाणिभिर्विना
     त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥
जगुर्महेन्द्रासनमोजसा स्थितं
     विश्वावसुस्तुम्बुरुरस्मदादयः ।
गन्धर्वसिद्धा ऋषयोऽस्तुवन्मुहुः
     विद्याधरा अप्सरसश्च पाण्डव ॥ १४ ॥

अब वह (हिरण्यकशिपु) नन्दनवन आदि दिव्य उद्यानों के सौन्दर्य से युक्त स्वर्ग में ही रहने लगा था। स्वयं विश्वकर्मा का बनाया हुआ इन्द्र का भवन ही उसका निवासस्थान था। उस भवन में तीनों लोकों का सौन्दर्य मूर्तिमान् होकर निवास करता था। वह सब प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न था ॥ ८ ॥ उस महल में मूँगे की सीढिय़ाँ, पन्ने की गचें, स्फटिकमणि की दीवारें, वैदूर्यमणिके खंभे और माणिक की कुर्सियाँ थीं। रंग-बिरंगे चँदोवे तथा दूध के फेन के समान शय्याएँ, जिनपर मोतियों की झालरें लगी हुई थीं, शोभायमान हो रही थीं ॥ ९-१० ॥ सर्वाङ्गसुन्दरी अप्सराएँ अपने नूपुरों से रुन-झुन ध्वनि करती हुई रत्नमय भूमि पर इधर-उधर टहला करती थीं और कहीं-कहीं उसमें अपना सुन्दर मुख देखने लगती थीं ॥ ११ ॥ उस महेन्द्रके महलमें महाबली और महामनस्वी हिरण्यकशिपु सब लोकोंको जीतकर, सबका एकच्छत्र सम्राट् बनकर बड़ी स्वतन्त्रतासे विहार करने लगा। उसका शासन इतना कठोर था कि उससे भयभीत होकर देव-दानव उसके चरणोंकी वन्दना करते रहते थे ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर ! वह उत्कट गन्धवाली मदिरा पीकर मतवाला रहा करता था। उसकी आँखें लाल-लाल और चढ़ी हुई रहतीं। उस समय तपस्या, योग, शारीरिक और मानसिक बलका वह भंडार था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेवके सिवा और सभी देवता अपने हाथों में  भेंट ले-लेकर उसकी सेवामें लगे रहते ॥ १३ ॥ जब वह अपने पुरुषार्थ से इन्द्रासनपर बैठ गया, तब युधिष्ठिर ! विश्वावसु, तुम्बुरु तथा हम सभी लोग उसके सामने गान करते थे। गन्धर्व, सिद्ध, ऋषिगण, विद्याधर और अप्सराएँ बार-बार उसकी स्तुति करती थीं ॥ १४ ॥

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गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से



श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – चौथा अध्याय..(पोस्ट०१)

हिरण्यकशिपु के अत्याचार और प्रह्लाद के गुणों का वर्णन

नारद उवाच -
एवं वृतः शतधृतिः हिरण्यकशिपोरथ ।
प्रादात् तत् तपसा प्रीतो वरान् तस्य सुदुर्लभान् ॥ १ ॥

ब्रह्मोवाच -
ताते मे दुर्लभाः पुंसां यान् वृणीषे वरान् मम ।
तथापि वितराम्यङ्‌ग वरान् यदपि दुर्लभान् ॥ २ ॥
ततो जगाम भगवान् अमोघानुग्रहो विभुः ।
पूजितोऽसुरवर्येण स्तूयमानः प्रजेश्वरैः ॥ ३ ॥
एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद् हेममयं वपुः ।
भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥
स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्च त्रीन्महासुरः ।
देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान् ॥ ५ ॥
सिद्धचारणविद्याध्रान् ऋषीन् पितृपतीन् मनून् ।
यक्षरक्षःपिशाचेशान् प्रेतभूतपतीनथ ॥ ६ ॥
सर्वसत्त्वपतीन्जित्वा वशमानीय विश्वजित् ।
जहार लोकपालानां स्थानानि सह तेजसा ॥ ७ ॥

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! जब हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से इस प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ वर माँगे, तब उन्होंने उसकी तपस्यासे प्रसन्न होनेके कारण उसे वे वर दे दिये ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा—बेटा ! तुम जो वर मुझसे माँग रहे हो, वे जीवोंके लिये बहुत ही दुर्लभ हैं; परंतु दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें वे सब वर दिये देता हूँ ॥ २ ॥
[नारदजी कहते हैं—]ब्रह्माजीके वरदान कभी झूठे नहीं होते। वे समर्थ एवं भगवद्रूप ही हैं। वरदान मिल जानेके बाद हिरण्यकशिपुने उनकी पूजा की। तत्पश्चात् प्रजापतियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे अपने लोकको चले गये ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीसे वर प्राप्त करनेपर हिरण्यकशिपुका शरीर सुवर्णके समान कान्तिमान् एवं हृष्टपुष्ट हो गया। वह अपने भाईकी मृत्युका स्मरण करके भगवान्‌से द्वेष करने लगा ॥ ४ ॥ उस महादैत्यने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरोंके अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियोंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया। यहाँतक कि उस विश्व-विजयी दैत्यने लोकपालोंकी शक्ति और स्थान भी छीन लिये ॥ ५—७ ॥

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शनिवार, 15 जून 2019

श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०७)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

यदि दास्यस्यभिमतान्वरान्मे वरदोत्तम
भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्मा भून्मम प्रभो ||३५||
नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः
न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ||३६||
व्यसुभिर्वासुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ||३७||
सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथात्मनः
तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ||३८||

(हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की स्तुति कर रहा है)  प्रभो ! आप समस्त वरदाताओं में श्रेष्ठ हैं। यदि आप मुझे अभीष्ट वर देना चाहते हैं, तो ऐसा वर दीजिये कि आपके बनाये हुए किसी भी प्राणी से—चाहे वह मनुष्य हो या पशु, प्राणी हो या अप्राणी, देवता हो या दैत्य अथवा नागादि—किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो। भीतर-बाहर, दिनमें, रात्रिमें, आपके बनाये प्राणियोंके अतिरिक्त और भी किसी जीवसे, अस्त्र-शस्त्रसे, पृथ्वी या आकाशमें—कहीं भी मेरी मृत्यु न हो। युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। मैं समस्त प्राणियोंका एकच्छत्र सम्राट् होऊँ ॥ ३५—३७ ॥ इन्द्रादि समस्त लोकपालोंमें जैसी आपकी महिमा है, वैसी ही मेरी भी हो। तपस्वियों और योगियोंको जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है, वही मुझे भी दीजिये ॥ ३८ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हिरण्यकशिपोर्वरयाचनं नाम तृतीयोऽध्यायः

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श्रीमद्भागवतमहापुराण सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)


॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण
सप्तम स्कन्ध – तीसरा अध्याय..(पोस्ट०६)

हिरण्यकशिपुकी तपस्या और वरप्राप्ति

त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-
मायुर्लवाद्यवयवैः क्षिणोषि
कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महां-
स्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ||३१||
त्वत्तः परं नापरमप्यनेज
देजच्च किञ्चिद्व्यतिरिक्तमस्ति
विद्याः कलास्ते तनवश्च सर्वा
हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्त्रिपृष्ठः ||३२||
व्यक्तं विभो स्थूलमिदं शरीरं
येनेन्द्रि यप्राणमनोगुणांस्त्वम्
भुङ्क्षे स्थितो धामनि पारमेष्ठ्ये
अव्यक्त आत्मा पुरुषः पुराणः ||३३||
अनन्ताव्यक्तरूपेण येनेदमखिलं ततम्
चिदचिच्छक्तियुक्ताय तस्मै भगवते नमः ||३४||

(हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी की स्तुति कर रहा है)  आप ही काल हैं। आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागों के द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं। फिर भी आप निर्विकार हैं। क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवों के जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ॥ ३१ ॥ प्रभो ! कार्य, कारण, चल और अचल ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आप से भिन्न हो। समस्त विद्या और कलाएँ आपके शरीर हैं। आप त्रिगुणमयी माया से अतीत स्वयं ब्रह्म हैं। यह स्वर्णमय ब्रह्माण्ड आपके गर्भ में स्थित है। आप इसे अपनेमें से ही प्रकट करते हैं ॥ ३२ ॥ प्रभो ! यह व्यक्त ब्रह्माण्ड आपका स्थूल शरीर है। इससे आप इन्द्रिय, प्राण और मनके विषयोंका उपभोग करते हैं। किन्तु उस समय भी आप अपने परम ऐश्वर्यमय स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। वस्तुत: आप पुराणपुरुष, स्थूल-सूक्ष्मसे परे ब्रह्मस्वरूप ही हैं ॥ ३३ ॥ आप अपने अनन्त और अव्यक्त स्वरूप से सारे जगत् में व्याप्त हैं । चेतन और अचेतन दोनों ही आपकी शक्तियाँ हैं । भगवन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३४ ॥

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


वैराग्य- संदीपनी (Post 05)

  ।।श्री हरि:।।   श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीकृत   वैराग्य- संदीपनी ( Post 05)   शान्ति-वर्णन   दोहा - रैनि को भूषन इंदु है ...