मंगलवार, 5 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१०)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

परमाणुपरममहतोः 
     त्वमाद्यन्तान्तरवर्ती त्रयविधुरः । 
आदावन्तेऽपि च सत्त्वानां 
     यद्ध्रुवं तदेवान्तरालेऽपि ॥ ३६ ॥
क्षित्यादिभिरेष किलावृतः 
     सप्तभिर्दशगुणोत्तरैरण्डकोशः । 
यत्र पतत्यणुकल्पः 
     सहाण्डकोटिकोटिभिस्तदनन्तः ॥ ३७ ॥

नन्हें-से-नन्हें परमाणु से लेकर बड़े- से-बड़े महत्तत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओं के आदि, अन्त और मध्यमें आप ही विराजमान हैं तथा स्वयं आप आदि, अन्त और मध्य से  रहित हैं । क्योंकि किसी भी पदार्थ के आदि और अन्तमें जो वस्तु रहती है, वही मध्य में भी रहती है ॥ ३६ ॥ यह ब्रह्माण्डकोष, जो पृथ्वी आदि एक-से-एक दसगुने सात आवरणों से घिरा हुआ है, अपने ही समान दूसरे करोड़ों ब्रह्माण्डों के सहित आप में एक परमाणुके समान घूमता रहता है और फिर भी उसे आपकी सीमा का पता नहीं है। इसलिये आप अनन्त हैं ॥ ३७ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💖🥀ॐ श्रीपरमात्मने नमः
    ॐ अच्युताय नमः 🙏
    ॐ अनंताय नमः 🙏
    ॐ गोविंदाय नमः 🙏

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२) चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन जितमजि...