मंगलवार, 5 मई 2026

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट,०९)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)

चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन

चित्रकेतुरुवाच - 

अजित जितः सममतिभिः 
     साधुभिर्भवान् जितात्मभिर्भवता । 
विजितास्तेऽपि च भजतां 
     अकामात्मनां य आत्मदोऽतिकरुणः ॥ ३४ ॥
तव विभवः खलु भगवन् 
     जगदुदयस्थितिलयादीनि । 
विश्वसृजस्तेंऽशांशास्तत्र 
     मृषा स्पर्धन्ति पृथगभिमत्या ॥ ३५ ॥

चित्रकेतु ने कहा—अजित ! जितेन्द्रिय एवं समदर्शी साधुओं ने आपको जीत लिया है। आपने भी अपने सौन्दर्य, माधुर्य, कारुण्य आदि गुणोंसे उनको अपने वशमें कर लिया है। अहो, आप धन्य हैं ! क्योंकि जो निष्कामभाव से आपका भजन करते हैं, उन्हें आप करुणापरवश होकर अपने- आपको भी दे डालते हैं ॥ ३४ ॥ भगवन् ! जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय आपके लीला- विलास हैं। विश्वनिर्माता ब्रह्मा आदि आपके अंशके भी अंश हैं। फिर भी वे पृथक्-पृथक् अपनेको जगत्कर्ता मानकर झूठमूठ एक-दूसरे से स्पर्धा करते हैं ॥ ३५ ॥ 

शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण  (विशिष्टसंस्करण)  पुस्तककोड 1535 से


1 टिप्पणी:

  1. 🌹💖🥀 श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
    हे नाथ नारायण वासुदेव: !!
    नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!

    जवाब देंहटाएं

श्रीमद्भागवतमहापुराण षष्ठ स्कन्ध - सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२)

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराण  षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट१२) चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन जितमजि...