॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय..(पोस्ट०९)
चित्रकेतु का वैराग्य तथा सङ्कर्षणदेव के दर्शन
चित्रकेतुरुवाच -
अजित जितः सममतिभिः
साधुभिर्भवान् जितात्मभिर्भवता ।
विजितास्तेऽपि च भजतां
अकामात्मनां य आत्मदोऽतिकरुणः ॥ ३४ ॥
तव विभवः खलु भगवन्
जगदुदयस्थितिलयादीनि ।
मृषा स्पर्धन्ति पृथगभिमत्या ॥ ३५ ॥
चित्रकेतु ने कहा—अजित ! जितेन्द्रिय एवं समदर्शी साधुओं ने आपको जीत लिया है। आपने भी अपने सौन्दर्य, माधुर्य, कारुण्य आदि गुणोंसे उनको अपने वशमें कर लिया है। अहो, आप धन्य हैं ! क्योंकि जो निष्कामभाव से आपका भजन करते हैं, उन्हें आप करुणापरवश होकर अपने- आपको भी दे डालते हैं ॥ ३४ ॥ भगवन् ! जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय आपके लीला- विलास हैं। विश्वनिर्माता ब्रह्मा आदि आपके अंशके भी अंश हैं। फिर भी वे पृथक्-पृथक् अपनेको जगत्कर्ता मानकर झूठमूठ एक-दूसरे से स्पर्धा करते हैं ॥ ३५ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से
🌹💖🥀 श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे
जवाब देंहटाएंहे नाथ नारायण वासुदेव: !!
नारायण नारायण हरि: !! हरि: !!